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शॉर्ट न्यूज़

शॉर्ट न्यूज़: 11 जनवरी, 2022


जापान और ऑस्ट्रेलिया के बीच बढ़ता सुरक्षा सहयोग

वैश्विक आर्द्रभूमि रिपोर्ट 2021

ओरका संयंत्र

दिल्ली में 5वें सिख तख़्त को मान्यता

दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर भारत 

पांडुलिपियों का डिजिटलीकरण

मल्टी एजेंसी सेंटर


जापान और ऑस्ट्रेलिया के बीच बढ़ता सुरक्षा सहयोग

चर्चा में क्यों? 

हाल ही में, ऑस्ट्रेलिया और जापान ने एक रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किया है। 

प्रमुख बिंदु 

  • इस समझौते का नाम ‘रेसिप्रोकल असिस्टेंस एग्रीमेंट’ (पारस्परिक सहायता समझौता) है। इससे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती अक्रामकता को नियंत्रित करने का प्रयास माना जा रहा है। 
  • इसके तहत कानूनी बाधाओं को कम करते हुए एक देश के सैनिकों को प्रशिक्षण और अन्य उद्देश्यों के लिये दूसरे देश में अस्थायी तौर पर तैनात करने की अनुमति होगी
  • इस विशेष सामरिक समझौते से साझे मूल्यों, लोकतंत्र एवं मानवाधिकारों के लिये प्रतिबद्धता से दोनों देशों के बीच संबंध अधिक मज़बूत होंगे। 
  • यह अमेरिका के अलावा किसी भी अन्य देश के साथ जापान का पहला द्विपक्षीय रक्षा व सामरिक समझौता है। वर्ष 1960 में जापान ने अमेरिका के साथ ‘स्टेटस ऑफ़ फोर्सेज एग्रीमेंट’ समझौता किया था। इसके तहत जापान ने अमेरिका को स्थायी तौर पर अपने यहाँ सैनिक तैनात करने की अनुमति दी है।

अन्य समझौते

  • ऑस्ट्रेलिया ने परमाणु ऊर्जा संचालित पनडुब्बियों को प्राप्त करने के लिये अमेरिका और ब्रिटेन के साथ ‘औकुस’ त्रिपक्षीय समझौता किया है।
  • उल्लेखनीय है कि जापान और ऑस्ट्रेलिया 'क्वाड' के भी सदस्य हैं। भारत एवं अमेरिका इसके अन्य सदस्य हैं। 

वैश्विक आर्द्रभूमि रिपोर्ट 2021

चर्चा में क्यों?

हाल ही में, रामसर अभिसमय ने ‘वैश्विक आर्द्रभूमि रिपोर्ट 2021’ जारी की।

रिपोर्ट के मुख्य बिंदु

  • आर्द्रभूमियों के कुल क्षेत्रफल में अब तक लगभग 35% की कमी आई है। इसके पतन का मुख्य कारण आर्द्रभूमियों का बड़े पैमाने पर कृषि योग्य भूमि में परिवर्तन है।
  • जलवायु परिवर्तन अब भी आर्द्रभूमियों के लिये सबसे बड़ा जोखिम बना हुआ है। वैश्विक तापमान में हो रही वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने के लिये रामसर अभिसमय को सख्ती से लागू करने की आवश्यकता है।
  • आर्द्रभूमियों की पुनर्बहाली को ‘राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान’ (Nationally Determined Contributions) और राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन एवं आपदा जोखिम से संबंधित योजनाओं में शामिल करने की आवश्यकता है।

आर्द्रभूमि का महत्त्व 

  • अच्छी तरह से प्रबंधित आर्द्रभूमि दुनिया भर में कुल मिलाकर 4 बिलियन लोगों को भोजन, पानी और स्वास्थ्य सुरक्षा प्रदान कर सकती है।
  • पारिस्थितिक तंत्र को बनाए रखने और जूनोटिक रोगों के नियंत्रण के लिये आर्द्रभूमियों को महत्त्वपूर्ण माना जाता है, जिससे भविष्य की महामारियों की रोकथाम की जा सकती है।
  • आर्द्रभूमि को कार्बन सिंक (Carbon Sink) के लिये सबसे प्रभावी भूमि-आधारित पारिस्थितिकी तंत्र माना जाता है। यह 'ब्लू कार्बन' पारिस्थितिक तंत्र, जैसे कि तटीय आर्द्रभूमि, उष्णकटिबंधीय वर्षावन आदि की तुलना में 55 गुना तेजी से ‘कार्बन पृथक्करण’ (Carbon Sequestration) करती है।

ओरका संयंत्र

चर्चा में क्यों?

यूरोपीय देश आइसलैंड में स्थित ओरका संयंत्र विश्व का सबसे बड़ा कार्बन अवशोषक संयंत्र है।

प्रमुख बिंदु

  • यह सीधे वायुमंडल से कार्बन डाईऑक्साइड को अवशोषित कर इसे पत्थर में बदल देता है। इस प्रकार यह वायु से कार्बन डाईऑक्साइड को स्थाई रूप से हटा देता है। 
  • यह वायुमण्डल से कार्बन अवशोषण के लिये पंखों तथा फ़िल्टर का उपयोग करता है। अवशोषण के बाद यह कार्बन डाईऑक्साइड को गर्म करके भूमिगत रूप से संचय करता है जहाँ कुछ समय बाद ये पत्थर में बदल जाते हैं।
  • इसका विकास स्विट्ज़रलैंड के एक स्टार्टअप ‘क्लाइमेट वर्क्स एग्री’ द्वारा आइसलैंड की कार्बन संग्रहण एजेंसी ‘कार्बीक्स’ द्वारा संयुक्त रूप से किया गया है।
  • यह प्रतिवर्ष 4000 टन कार्बन डाईऑक्साइड अवशोषित करने में सक्षम है। इससे वैश्विक तापन में कमी आ सकती है। साथ ही, यह वर्ष 2030 तक सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने के वैश्विक प्रयासों में भी मदद करेगा।
  • हालाँकि, इसके संचालन में अत्यधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है और यह एक महँगी प्रणाली है।

दिल्ली में 5वें सिख तख़्त को मान्यता

चर्चा में क्यों?

हाल ही में, दिल्ली विधानसभा ने दमदमा साहिब को तख़्त के रूप में मान्यता देने के लिये एक संशोधन विधेयक पारित किया है।

नवीनतम संशोधन

  • दिल्ली सरकार ने ‘दिल्ली सिख गुरुद्वारा अधिनियम, 1971’ में संशोधन करके तख़्त दमदमा साहिब को सिखों के पाँचवें तख़्त के रूप में मान्यता दी है।
  • इस संशोधन के माध्यम से दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधन समिति में अन्य 4 तख़्त के प्रमुखों के समान ही तख़्त दमदमा साहिब के प्रमुख को 5वें पदेन सदस्य के रूप में शामिल किया जाएगा।
  • इससे पूर्व वर्ष 1999 में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने दमदमा साहिब को 5वें तख़्त के रूप में मान्यता दी थी।

क्या होते हैं तख़्त?

  • तख़्त का शाब्दिक अर्थ होता है ‘सिंहासन’, यह सिख धर्म का आध्यात्मिक और लौकिक केंद्र होता है। अकाल तख़्त को ‘सिख राष्ट्रवाद’ का पहला प्रतीक माना जाता है।
  • वर्तमान में 5 सिख तख़्त हैं, जिसमें से तीन- अकाल तख़्त, केशगढ़ साहिब तख़्त तथा दमदमा साहिब तख़्त पंजाब में, जबकि हुज़ूर साहिब तख़्त महाराष्ट्र में एवं पटना साहिब तख़्त बिहार में स्थित है।
  • अकाल तख़्त (अमृतसर) को सबसे प्राचीन व सर्वोच्च तख़्त माना जाता है। इसकी स्थापना 6वें सिख गुरु हरगोबिंद सिंह जी ने की थी, जबकि अन्य 4 सिख तख़्त का संबंध गुरुगोबिंद सिंह जी से है।

दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर भारत 

चर्चा में क्यों?

आई.एच.एस. मार्किट लिमिटेड की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत वर्ष 2030 तक एशिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा।

प्रमुख बिंदु

  • भारत का सकल घरेलू उत्पाद वर्ष 2021 के 2.7 ट्रिलियन डॉलर से बढ़कर वर्ष 2030 तक 8.4 ट्रिलियन डॉलर हो जाने का अनुमान है।
  • इस प्रकार, वर्ष 2030 तक भारत की जी.डी.पी. जापान से अधिक हो जाएगी, जिससे एशिया-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बाद भारत दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगी।
  • वर्तमान में अमेरिका, चीन, जापान, जर्मनी और यू.के. के बाद भारत विश्व की छठीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, जबकि एशिया में वह तीसरे स्थान पर है।

कारण

  • आर्थिक वृद्धि का महत्त्वपूर्ण कारण तेज़ी से उभरता मध्य वर्ग है जो उपभोक्ता वस्तुओं में अधिक व्यय करेगा। इससे वर्ष 2030 तक देश का उपभोक्ता व्यय दोगुना होने की संभावना है। 
  • साथ ही, तेज़ी से बढ़ते उपभोक्ता बाज़ार के साथ-साथ औद्योगिक क्षेत्र ने भारत को विनिर्माण, बुनियादी ढाँचे और सेवाओं सहित कई क्षेत्रों में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के निवेश का महत्त्वपूर्ण और पसंदीदा क्षेत्र बना दिया है। भारत में डिजिटल परिवर्तन से ई-कॉमर्स के विकास में भी तेज़ी आने की संभावना है। 

पांडुलिपियों का डिजिटलीकरण

चर्चा में क्यों? 

दक्षिण भारत में प्राचीन पांडुलिपियों के संग्रहण केंद्र ‘ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट’ (ORI) में डिजिटलीकरण प्रक्रिया तेज़ कर दी गई है। विदित हो कि इसे दो वर्ष में पूरा करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

प्रमुख बिंदु

  • डिजिटलीकरण की यह प्रक्रिया वर्ष 2015 में ही शुरू हुई थी लेकिन कोविड एवं अन्य कारणों से इसकी गति बाधित हो गई।
  • इस प्रक्रिया के अंतर्गत लगभग 20,000 पांडुलिपियों को डिजिटलीकृत करने के पश्चात् इन्हें चार लाख डिजिटल पृष्ठों में प्रस्तुत किया जाएगा।
  • केंद्र सरकार के राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन ने वर्ष 2007 में तिरुपति ओ.आर.आई. को 'पांडुलिपि संसाधन केंद्र' के रूप में मान्यता दी और आंध्र प्रदेश उच्च शिक्षा विभाग ने 2008 में इसे 'उत्कृष्टता केंद्र' के रूप में स्वीकार किया।
  • यहाँ संरक्षित पांडुलिपियों की विविध श्रेणियों में वेद, वेदांग, उपनिषद, व्याकरण, ज्योतिष, स्मृति, पुराण, दर्शन, पुरातत्व, मूर्तिकला, चित्रकला, खगोल विज्ञान, आयुर्वेद, अर्थशास्त्र (प्रशासन और राज्य शिल्प) और साहित्यिक नाटक शामिल हैं।

पांडुलिपि

  • पांडुलिपियाँ वस्तुतः कागज, छाल, धातु, ताड़ के पत्ते अथवा किसी अन्य सामग्री पर कम से कम 75 वर्ष पहले के हस्त लिखित संयोजन हैं।
  • लिथोग्राफ और मुद्रित खंड पांडुलिपियों के अंतर्गत नहीं आते हैं।
  • पांडुलिपियाँ विभिन्न भाषाओं और लिपियों में पाई जाती हैं। अक्सर एक भाषा विभिन्न लिपियों में लिखी होती है। उदाहरण के लिये, संस्कृत भाषा को उड़िया लिपि, ग्रंथ लिपि, देवनागरी लिपि आदि में लिखा जाता है।
  • पांडुलिपियाँ, घटनाओं अथवा प्रक्रियाओं के संबंध में प्रत्यक्ष सूचना प्रदान करने वाले ऐतिहासिक रिकॉर्ड, जैसे- शिलालेखों, फरमानों, राजस्व अभिलेखों आदि, से भिन्न होती हैं। पांडुलिपियों में सूचनाओं के अतिरिक्त ज्ञान का भी समावेश होता है।

राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन

  • राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन की शुरुआत पर्यटन एवं संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार ने फरवरी 2003 में की थी।
  • राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन का उद्देश्य अतीत को भविष्य से जोड़ने तथा इस देश की स्मृति को उसकी आकांक्षाओं से मिलाने के लिये इन पांडुलिपियों का पता लगाना, उनका प्रलेखन एवं संरक्षण करना और उन्हें उपलब्ध कराना है।
  • भारत में लगभग पाँच मिलियन पांडुलिपियों का संकलन मौज़ूद है जो संभवत: विश्व का सबसे बड़ा संकलन है। इसमें अनेक विषय सम्मिलित हैं, जैसे- पाठ संरचनाएँ व कलात्मक बोध, विभिन्न लिपियाँ एवं भाषाएँ, हस्तलिपियाँ, प्रकाशन, उद्बोधन आदि।
  • यह मिशन संयुक्त रूप से भारत के इतिहास, विरासत और विचार की ‘स्मृति’ हैं।

मल्टी एजेंसी सेंटर

चर्चा में क्यों?

हाल ही में, केंद्र सरकार ने सभी राज्यों से ‘मल्टी एजेंसी सेंटर’ (मैक) के माध्यम से अधिक से अधिक खुफिया जानकारी साझा करने का निर्देश दिया है।

प्रमुख बिंदु 

  • वर्ष 2020 में संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट के अनुसार, मल्टी एजेंसी सेंटर के कामकाज में तब व्यवधान उत्पन्न होता है, जब विभिन्न राज्यों द्वारा इस मंच पर सही समय पर सही जानकारी साझा नहीं की जाती है। 
  • हालाँकि, सेंटर को ज़िला स्तर तक जोड़ने की योजना लगभग एक दशक से चल रही है। लेकिन इसे प्रभावी तरीके से लागू नहीं किया गया था।
  • केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा आई.बी. के साथ चरणबद्ध तरीके से ज़िलों में सहायक ‘मल्टी एजेंसी सेंटर’ की कनेक्टिविटी का विस्तार करने का प्रयास किया जा रहा है।

मल्टी एजेंसी सेंटर

  • मल्टी एजेंसी सेंटर, इंटेलिजेंस ब्यूरो के तहत कार्यरत एक सामान्य आतंकवाद-रोधी ग्रिड है। इसका मुख्यालय नई दिल्ली में है।
  • इसे कारगिल समीक्षा समिति की रिपोर्ट और मंत्रियों के समूह की रिपोर्ट के सुझावों के अनुसार वर्ष 2001 में कारगिल युद्ध के बाद शुरू किया गया था।
  • राज्य कार्यालयों को ‘सहायक मल्टी एजेंसी सेंटर’ के रूप में नामित किया गया है।
  • इसमें रक्षा खुफिया एजेंसी (डी.आई.ए.), रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ), सशस्त्र बल और राज्य पुलिस सहित 28 संगठन शामिल हैं।

कार्य

  • विभिन्न सुरक्षा एजेंसियाँ मल्टी एजेंसी सेंटर पर रीयल टाइम इंटेलिजेंस इनपुट साझा करती हैं।
  • इस केंद्र पर ही इन सभी एजेंसियों की प्रतिदिन बैठक बुलाई जाती है। बैठक में पिछले 24 घंटों की खुफिया जानकारी को साझा करते हुए चर्चा और सहमति से आगे की कार्यनीति तैयार की जाती है।

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