सुरेंद्र कोली को नवंबर 2025 में करीब 20 साल जेल में बिताने के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने बरी कर दिया था। उसके जीवन के कई वर्ष मृत्युदंड की सजा के साये में बीते। 18 सितंबर को वह मृत पाया गया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार है, हालांकि शुरुआती समाचार रिपोर्टों में उसकी मौत को आत्महत्या बताया गया।
निठारी कांड के मामलों में आरोपी बनाए गए कोली ने 2006 में गिरफ्तारी के बाद वर्षों तक न केवल आपराधिक न्याय व्यवस्था का सामना किया, बल्कि सार्वजनिक आरोपों और सामाजिक कलंक का भी बोझ उठाया। उसे ‘निठारी का कसाई’ कहा गया और सार्वजनिक रूप से नरभक्षण तक का आरोपी बताया गया। उसके कथित ‘इकबालिया बयानों’ के आधार पर बनी छवि इतनी मजबूत थी कि सार्वजनिक विमर्श में संदेह और अनिश्चितता के लिए लगभग कोई जगह नहीं बची।
एक के बाद एक बिखरते गए मामले
2009 से 2022 के बीच निचली अदालतों ने कोली को 13 मामलों में दोषी ठहराते हुए मृत्युदंड सुनाया। लेकिन बाद में एक-एक करके ये मामले कमजोर पड़ते गए। अपीलीय अदालतों ने कई मामलों में उसके खिलाफ साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठाए।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कुछ मामलों में जांच को बेहद खराब बताते हुए कहा कि एक गरीब घरेलू नौकर को ‘राक्षसी’ रूप देकर दोषी ठहराना आसान रास्ता बना लिया गया, जबकि मामले के दूसरे गंभीर पहलुओं की पर्याप्त जांच नहीं हुई।
2025 में आखिरी मामले में कोली को बरी करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने भी स्पष्ट किया कि उच्च न्यायालय की ये टिप्पणियां महज अतिशयोक्ति नहीं थीं। अदालत ने उसके खिलाफ दोषसिद्धि के आधार बने साक्ष्यों को अविश्वसनीय और अस्वीकार्य माना तथा उसके अधिकारों के उल्लंघन की ओर भी संकेत किया।
विडंबना यह है कि 2014 में कोली को फांसी दिए जाने की स्थिति लगभग पैदा हो गई थी। सर्वोच्च न्यायालय ने फांसी से महज चार घंटे पहले रोक लगाई और उसकी जान बच गई।
बरी होने के बाद जीवन कहां से शुरू होता है?
कोली का मामला एक बड़ा सवाल छोड़ता है - यदि न्याय व्यवस्था किसी व्यक्ति से गलत तरीके से उसके जीवन के करीब दो दशक छीन ले, तो उसकी रिहाई के बाद उस व्यक्ति के प्रति राज्य और समाज की जिम्मेदारी क्या है?
समाचार रिपोर्टों के अनुसार, रिहाई के बाद आवास और रोजगार पाने के लिए कोली ने अपना नाम बदल लिया था। इसके पीछे अपने नाम से जुड़े सामाजिक कलंक और लोगों की प्रतिक्रिया का डर एक कारण हो सकता है। यानी अदालत से बरी होने के बावजूद उसे उस समाज में लौटना पड़ा, जिसने पहले ही उसके बारे में एक निश्चित धारणा बना ली थी।
लंबे समय तक जेल में रहने वाले व्यक्ति के लिए सामान्य जीवन में लौटना आसान नहीं होता। जिस दुनिया में वह दो दशक पहले गया था, वह तब तक काफी बदल चुकी होती है। रोजगार, आवास और परिवार से दोबारा जुड़ने के साथ उसे बदलती सामाजिक और तकनीकी दुनिया के साथ भी तालमेल बैठाना पड़ता है।
समस्या केवल कोली की नहीं
गलत दोषसिद्धि का प्रश्न किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है। द स्क्वायर सर्कल क्लिनिक के मृत्युदंड से जुड़े 25 वर्षों के आंकड़ों के विश्लेषण के अनुसार, निचली अदालतों द्वारा सुनाई गई मृत्युदंड की करीब 40 प्रतिशत सजाएं बाद में अपीलीय अदालतों में बरी होने या दोषसिद्धि बदलने की स्थिति तक पहुंचीं।
सर्वोच्च न्यायालय ने कुछ मामलों में गलत दोषसिद्धि के कारण हुए नुकसान को स्वीकार किया है और मुआवजा भी दिया है। 2025 में अदालत ने गलत दोषसिद्धियों से निपटने के लिए विधायी व्यवस्था की आवश्यकता पर भी जोर दिया। लेकिन व्यापक स्तर पर पुनर्वास और पुनर्समावेशन की व्यवस्था अभी भी एक बड़ी चुनौती है।
न्याय के बाद भी न्याय जरूरी
सिर्फ बरी कर देना उस नुकसान की भरपाई नहीं करता जो किसी व्यक्ति ने वर्षों की कैद, सामाजिक कलंक और खोए हुए जीवन के रूप में झेला है। ऐसे लोगों को मनोसामाजिक सहायता, सुरक्षित संक्रमणकालीन आवास, परिवार से दोबारा जुड़ने में मदद, आर्थिक सहायता और रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना जरूरी है।
न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता केवल दोषियों को सजा देने में नहीं, बल्कि अपनी गलतियों को स्वीकार करने और उनके परिणामों की जिम्मेदारी लेने में भी है।
सुरेंद्र कोली ने 13 मामलों में दोषसिद्धि और बाद की रिहाई की प्रक्रिया में अपने जीवन के करीब 20 वर्ष गंवाए। उसकी मौत अब इस सवाल को और गंभीर बना देती है कि गलत तरीके से किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता छीन लेने के बाद न्याय व्यवस्था और समाज उसके जीवन को फिर से खड़ा करने के लिए क्या करते हैं।
यदि इस सवाल पर गंभीर आत्ममंथन नहीं हुआ, तो कोली की कहानी केवल अतीत की त्रासदी बनकर नहीं रहेगी—बल्कि यह हमें उन अनेक लोगों की याद दिलाती रहेगी, जिनके लिए बरी होना उनके न्याय की यात्रा का अंत नहीं, बल्कि एक नई और कठिन शुरुआत है।
आगे की राह
गलत दोषसिद्धि के लिए स्पष्ट कानून: मुआवजा, पुनर्वास और आर्थिक सहायता की तय व्यवस्था हो।
जांच व्यवस्था में जवाबदेही: वैज्ञानिक जांच को प्राथमिकता मिले और गंभीर लापरवाही पर जिम्मेदारी तय हो।
रिहाई के बाद पुनर्वास: आवास, पहचान दस्तावेज, स्वास्थ्य सेवाओं और परिवार से पुनः जुड़ने में सहायता मिले।
मनोसामाजिक सहायता:लंबे समय तक जेल में रहे लोगों के लिए परामर्श और मानसिक-सामाजिक सहयोग उपलब्ध हो।
रोजगार और आजीविका: कौशल प्रशिक्षण, रोजगार, स्वरोजगार और वित्तीय सहायता की विशेष व्यवस्था की जाए।
मीडिया की जिम्मेदारी:आरोप और दोषसिद्धि के बीच अंतर बनाए रखा जाए तथा बरी होने पर सुधारात्मक जानकारी को भी प्रमुखता दी जाए।
आंकड़ों और शोध की व्यवस्था: गलत दोषसिद्धियों के मामलों, कारणों और रिहाई के बाद की चुनौतियों का व्यवस्थित रिकॉर्ड तैयार हो।
न्याय की व्यापक परिभाषा: केवल सजा और बरी होने तक नहीं, बल्कि गलत तरीके से छीनी गई स्वतंत्रता, सम्मान और आजीविका की भरपाई तक न्याय की प्रक्रिया को देखा जाए।