संदर्भ
- बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, क्षेत्रीय संघर्षों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर बढ़ते दबाव के बीच, विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अधिक मजबूत और 'सुधारे गए बहुपक्षीयवाद' (Reformed Multilateralism) की जोरदार वकालत की है। उन्होंने न्यूयॉर्क में 81वीं संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के इतर यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा के साथ 'पार्टनर्स फॉर मल्टीलेटरलिज्म, इंटरनेशनल लॉ, पीस एंड प्रॉस्पेरिटी' (P4M) शिखर सम्मेलन की सह-अध्यक्षता करते हुए यह,हम महत्वपूर्ण बातें कहीं।
- यह शिखर सम्मेलन ऐसे समय में आयोजित किया गया जब वैश्विक व्यवस्था रणनीतिक पुनर्संतुलन और भू-राजनीतिक तनावों के दौर से गुजर रही है, जबकि संयुक्त राष्ट्र प्रणाली को सीमित प्रतिनिधित्व और निर्णय लेने की क्षमता को लेकर तीखी आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है।
दबाव में वैश्विक व्यवस्था (Global Order Under Stress)
- विदेश मंत्री जयशंकर ने रेखांकित किया कि तीव्र रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के कारण वैश्विक शक्ति का दीर्घकालिक पुनर्संतुलन अधिक जटिल हो गया है। यदि इन दबावों को अनियंत्रित छोड़ दिया गया, तो यह अंतरराष्ट्रीय सहयोग की मूल भावना को कमजोर कर सकते हैं। यही कारण है कि साझा वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए बहुपक्षीय प्रणाली को और अधिक मजबूती से आगे आना होगा। उन्होंने निम्नलिखित क्षेत्रों में तत्काल वैश्विक सहयोग को आवश्यक बताया:
- शांति और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा
- जलवायु कार्रवाई और जलवायु न्याय
- उभरती हुई प्रौद्योगिकियां
- विकास वित्त पोषण
- आतंकवाद का मुकाबला
- वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं
- आपदा लचीलापन (Disaster Resilience)
- महामारी की तैयारी
4F संकट और आपूर्ति श्रृंखलाओं की सुरक्षा
एस. जयशंकर ने वैश्विक प्रणालियों के समक्ष मौजूद सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक '4F संकट' यानी फ्यूल (ईंधन), फूड (भोजन), फर्टिलाइज़र (उर्वरक) और फाइनेंस (वित्त) की संवेदनशीलता पर प्रकाश डाला। इस संकट से निपटने के लिए उन्होंने निम्नलिखित उपायों की मांग की:
- सुरक्षा उपाय (Guardrails): उभरती हुई प्रौद्योगिकियों और क्षमताओं के लिए स्पष्ट रूपरेखा और नियम तय करना।
- जोखिम कम करना (De-risking): रणनीतिक चोकपॉइंट्स पर अत्यधिक निर्भरता वाले देशों के लिए विविधीकरण अपनाना।
- आपूर्ति श्रृंखला सुरक्षा: महत्वपूर्ण आपूर्ति श्रृंखलाओं में व्यवधानों को रोकने के लिए मजबूत अंतरराष्ट्रीय सहयोग।
- लचीलापन: भू-राजनीतिक झटकों का सामना करने की क्षमता बढ़ाना।
यह दृष्टिकोण भारत के उस व्यापक एजेंडे के अनुरूप है जिसके तहत देश किसी एक भू-राजनीतिक गुट या आपूर्ति स्रोत पर अत्यधिक निर्भरता से बचते हुए अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और लचीली आपूर्ति श्रृंखलाओं को बनाए रखना चाहता है।
सुधारे गए बहुपक्षीयवाद (Reformed Multilateralism) पर भारत का जोर
- भारत ने वैश्विक मंच पर एक ऐसे 'सुधारे गए बहुपक्षीयवाद' की वकालत की है जो निम्नलिखित स्तंभों पर आधारित हो:
- अधिक भागीदारीपूर्ण विचार-विमर्श
- पारदर्शी निर्णय-प्रक्रिया
- समकालीन वैश्विक वास्तविकताओं का वास्तविक प्रतिनिधित्व
- अंतरराष्ट्रीय कानून, नियमों और मानदंडों का पूर्ण सम्मान
- भारत का यह तर्क है कि पिछली सदी की भू-राजनीतिक परिस्थितियों में बनी संस्थाओं को आज की आर्थिक और राजनीतिक शक्ति के वितरण के अनुकूल अधिक प्रतिनिधि बनाया जाना चाहिए। यह मांग विशेष रूप से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधार के संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक है, जहाँ भारत स्थायी सदस्यता का प्रबल दावेदार है।
भारत और विसेग्रार्ड समूह (V4+India) का नया आयाम
- यात्रा के दौरान, स्लोवाकिया ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के लिए भारत की दावेदारी का खुलकर समर्थन किया और भारत को 'ग्लोबल साउथ' का एक महत्वपूर्ण स्तंभ तथा इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की उभरती हुई शक्ति बताया।
- इसके अलावा, विदेश मंत्री ने पहले V4+भारत विदेश मंत्रियों की बैठक में भी हिस्सा लिया। विसेग्रार्ड समूह (V4) में चेक गणराज्य, हंगरी, पोलैंड और स्लोवाकिया शामिल हैं। इस नए कूटनीतिक प्रारूप से मध्य यूरोप के साथ भारत के राजनीतिक, आर्थिक, रक्षा, अंतरिक्ष और लोगों से लोगों के बीच (P2P) संबंधों को एक नया मंच और विस्तार मिला है।
द्विपक्षीय बैठकें और स्वतंत्र विदेश नीति
यूएनजीए यात्रा के दौरान जयशंकर ने फ्रांस, यूक्रेन, हंगरी और मोल्दोवा के विदेश मंत्रियों से द्विपक्षीय चर्चा की:
- फ्रांस के साथ: यूक्रेन व खाड़ी संकट, रणनीतिक सहयोग और यूएनएससी सुधारों पर मंथन हुआ।
- यूक्रेन के साथ: शांति प्रयासों, द्विपक्षीय सहयोग और काला सागर में वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए नौवहन की स्वतंत्रता पर चर्चा की गई।
- ये मुलाकातें यह साबित करती हैं कि भारत तमाम वैश्विक ध्रुवीकरणों के बीच अपने स्वतंत्र विदेश-नीति हितों को साधते हुए सभी प्रमुख हितधारकों के साथ संवाद बनाए रखने में पूरी तरह सक्षम है।
भारत के लिए इसका रणनीतिक महत्व
- रणनीतिक स्वायत्तता: प्रतिस्पर्धी वैश्विक ताकतों के बीच स्वतंत्र फैसले लेना।
- ग्लोबल साउथ की आवाज: विकासशील देशों के अधिकारों और प्रतिनिधित्व की पैरवी करना।
- बहुपक्षीय सुधार: वैश्विक संस्थानों को अधिक पारदर्शी और समावेशी बनाना।
- नियम-आधारित व्यवस्था: अंतरराष्ट्रीय कानूनों और शांतिपूर्ण समाधानों का समर्थन करना।
निष्कर्ष
भारत का यह स्पष्ट संदेश है कि एक प्रभावी वैश्विक शासन प्रणाली केवल तभी संभव है जब वह गुट की राजनीति से ऊपर उठकर जलवायु परिवर्तन, तकनीकी व्यवधान, महामारियों, आतंकवाद और खाद्य-ऊर्जा असुरक्षा जैसी पारराष्ट्रीय चुनौतियों से एकजुट होकर निपट सके।