संदर्भ
- दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी विदेशी नागरिक के पास वैध वीजा होना अपने आप में उसे भारत में प्रवेश का पूर्ण या कानूनी रूप से लागू किया जा सकने वाला अधिकार नहीं देता। अदालत ने कहा कि भारत में प्रवेश की अनुमति देना राज्य का अधिकार है और सक्षम अधिकारी राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था तथा अन्य प्रासंगिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए किसी विदेशी नागरिक को प्रवेश देने से इनकार कर सकते हैं।
- न्यायमूर्ति अमित महाजन ने यह टिप्पणी तुर्कमेनिस्तान की एक महिला नागरिक की याचिका पर सुनवाई करते हुए की। याचिकाकर्ता के पास वैध व्यावसायिक वीजा था, इसके बावजूद उसे नई दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर भारत में प्रवेश करने की अनुमति नहीं दी गई।
पति को मिली प्रवेश की अनुमति, पत्नी को लौटना पड़ा
- याचिकाकर्ता 25 मार्च 2026 को अपने पति के साथ एक ही उड़ान से भारत पहुंची थी। उसके पति के पास भी इसी श्रेणी का वीजा था और उन्हें भारत में प्रवेश की अनुमति दे दी गई। हालांकि, याचिकाकर्ता को हवाई अड्डे से ही वापस तुर्कमेनिस्तान लौटना पड़ा।
- इसके बाद महिला ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया। उसने अदालत से भारत में प्रवेश से इनकार करने के कारणों की जानकारी देने वाला लिखित आदेश जारी करने की मांग की। साथ ही उसने अपने वैध व्यावसायिक वीजा के आधार पर भारत में प्रवेश की अनुमति दिए जाने का अनुरोध भी किया।
- हालांकि, अदालत ने 30 सितंबर को उसकी याचिका खारिज कर दी और कहा कि किसी विदेशी नागरिक को भारत में प्रवेश करने का कोई अंतर्निहित या कानूनी रूप से लागू किया जा सकने वाला अधिकार नहीं है।
याचिकाकर्ता की दलील
- याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि उसके पास वैध पासपोर्ट और अश्गाबात स्थित भारतीय दूतावास द्वारा जारी व्यावसायिक वीजा था। उसका कहना था कि इसके बावजूद उसे भारत में प्रवेश से रोक दिया गया और उसे इसका कारण भी नहीं बताया गया।
- उसने अधिकारियों की कार्रवाई को मुख्य रूप से दो आधारों पर चुनौती दी।
- पहला, उसे प्रवेश से इनकार करने के कारणों की जानकारी नहीं दी गई।
- दूसरा, उसके पति को भारत में प्रवेश की अनुमति देना और उसे रोकना संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 21 के तहत समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकारों का उल्लंघन है।
- याचिकाकर्ता का तर्क था कि जब वह और उसका पति एक ही उड़ान से आए थे और दोनों के पास एक ही श्रेणी के वीजा थे, तो उसके साथ अलग व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए था।
केंद्र सरकार का तर्क
- केंद्र सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि किसी विदेशी नागरिक को केवल वैध वीजा जारी होने के आधार पर भारत में प्रवेश का अटल अधिकार नहीं मिल जाता।
- सरकार ने स्पष्ट किया कि वीजा जारी करना और भारत में प्रवेश की अनुमति देना दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। भारत में प्रवेश का अंतिम निर्णय आव्रजन कानूनों और सक्षम अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र के अधीन रहता है।
- अधिकारियों ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता के संबंध में कुछ प्रतिकूल जानकारियां प्राप्त हुई थीं। इन्हें ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था के हित में उसे भारत में प्रवेश नहीं दिया गया।
- अदालत ने सरकार की ओर से सीलबंद लिफाफे में पेश की गई सामग्री का भी परीक्षण किया। इसमें याचिकाकर्ता के व्यक्तिगत विवरण में कुछ विसंगतियों का उल्लेख था। इसके अलावा उसके पास व्यावसायिक कार्ड या निमंत्रण पत्र नहीं था और जिस व्यवसाय या कंपनी से उसके जुड़े होने की बात कही गई थी, उसके संबंध में भी पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं थी। वस्तुतः अदालत ने उसकी पिछली चिकित्सा और व्यावसायिक यात्राओं से जुड़े विवरणों को भी ध्यान में रखा।
हाईकोर्ट का बयान
- न्यायालय ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि किसी विदेशी नागरिक के पास वैध वीजा होना भारत में प्रवेश का पूर्ण और बिना शर्त अधिकार नहीं बनाता।
- न्यायालय के अनुसार, वीजा जारी करना, भारत में प्रवेश की अनुमति देना या प्रवेश से इनकार करना राज्य के संप्रभु अधिकारों से जुड़े विषय हैं। इन मामलों में राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति, सार्वजनिक व्यवस्था और प्रशासनिक विवेक जैसे पहलुओं पर विचार किया जा सकता है।
- न्यायालय ने वीजा हासिल करने की पात्रता और देश में वास्तविक प्रवेश के बीच अंतर को भी रेखांकित किया। यानी किसी व्यक्ति ने वीजा प्राप्त करने की आवश्यक शर्तें पूरी कर ली हों, इसका यह अर्थ नहीं है कि उसे हर परिस्थिति में भारत में प्रवेश की अनुमति मिलना अनिवार्य है।
पति को प्रवेश देने का तर्क मान्य नहीं
- अनुच्छेद 14 के तहत भेदभाव का आरोप लगाते हुए याचिकाकर्ता ने कहा था कि उसके पति को भारत में प्रवेश की अनुमति दी गई, जबकि उसे रोक दिया गया।
- न्यायालय ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि केवल पति को प्रवेश मिलने से यह साबित नहीं होता कि दोनों प्रत्येक मामले में समान परिस्थितियों में थे। अधिकारियों की ओर से विशेष रूप से याचिकाकर्ता के संबंध में प्रतिकूल जानकारियों का उल्लेख किया गया था। इसलिए न्यायालय ने माना कि पति और पत्नी को समान स्थिति में रखकर उनके साथ एक जैसा व्यवहार किया जाना जरूरी नहीं था।
विदेशी नागरिकों से जुड़े कानून में प्रावधान
- मामले में आव्रजन और विदेशी नागरिक अधिनियम, 2025 की कानूनी व्यवस्था महत्वपूर्ण रही। कानून के अनुसार, भारत में प्रवेश करने वाले विदेशी नागरिक के पास वैध पासपोर्ट या यात्रा दस्तावेज और वैध वीजा होना आवश्यक है।
- हालांकि, राष्ट्रीय सुरक्षा, भारत की संप्रभुता और अखंडता, किसी विदेशी राज्य के साथ संबंधों या सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरा होने की स्थिति में किसी विदेशी नागरिक को भारत में प्रवेश या यहां रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
- कानून केंद्र सरकार को विदेशी नागरिकों के भारत में प्रवेश, प्रस्थान और देश में उनकी मौजूदगी को प्रतिबंधित, नियंत्रित या विनियमित करने की शक्ति भी देता है।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने निर्णयों का भी उल्लेख
दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के दो पुराने महत्वपूर्ण निर्णयों का भी हवाला दिया।
- हंस मुलर ऑफ नूरेनबर्ग बनाम सुप्रिंटेंडेंट, प्रेसिडेंसी जेल (1955) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने विदेशी नागरिकों के संबंध में केंद्र सरकार के व्यापक अधिकारों को स्वीकार किया था।
- वहीं, लुईस डी रैडेट बनाम भारत संघ (1991) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि विदेशी नागरिकों को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण प्राप्त है। हालांकि, भारत में निवास करने और बसने का अधिकार अनुच्छेद 19(1)(ई) के तहत केवल भारतीय नागरिकों को प्राप्त है।
निर्णय की महत्ता
- दिल्ली उच्च न्यायालय के इस फैसले से यह स्पष्ट होता है कि वैध वीजा और भारत में प्रवेश की अनुमति दो अलग-अलग कानूनी अवधारणाएं हैं। विदेशी नागरिक के पास वैध वीजा होने के बावजूद आव्रजन अधिकारी राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था और कानून में निर्धारित अन्य आधारों पर प्रवेश से इनकार कर सकते हैं।
- न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि जब कोई विदेशी नागरिक भारत में प्रवेश के कानूनी रूप से लागू किए जा सकने वाले अधिकार को साबित नहीं कर पाता, तो अदालत संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अधिकारियों को उसे भारत में प्रवेश देने का निर्देश नहीं दे सकती।
- इस तरह, दिल्ली हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति दोहराई कि वैध वीजा भारत में प्रवेश की पूर्ण और बिना शर्त गारंटी नहीं है।