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आदित्य-एल1 (Aditya-L1)

चर्चा में क्यों?

हाल ही में वैज्ञानिकों ने भारत के पहले सोलर मिशन, आदित्य-L1 पर लगे विज़िबल एमिशन लाइन कोरोनाग्राफ (VELC) पेलोड से मिले डेटा का इस्तेमाल करके सोलर कोरोना में होने वाली एक्टिविटीज़ की डॉप्लर वेलोसिटी इमेज बनाई हैं। वस्तुतः इन इमेज से सूर्य-पृथ्वी दिशा में कोरोनल मास इजेक्शन (CMEs) के फैलने के बारे में जानकारी मिलने की उम्मीद है, जो अब तक उपलब्ध नहीं थी।   

वैज्ञानिकों का रुझान 

  • इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ एस्ट्रोफिजिक्स (IIA) के साइंटिस्ट, के अनुसार सोलर एक्टिविटी से गर्म प्लाज़्मा निकलता है। वस्तुतः CMEs जैसे शक्तिशाली विस्फोटों के दौरान निकलने वाला विशाल और ऊर्जावान प्लाज़्मा या तो पृथ्वी की दिशा में या सूर्य से किसी भी अन्य दिशा में जा सकता है।

कोरोनल मास इजेक्शन (सीएमई):

  • कोरोनल मास इजेक्शन (सीएमई) सौर प्लाज्मा और चुंबकीय क्षेत्र के विस्फोटक विस्फोट होते हैं जो सूर्य से हजारों किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दूर चले जाते हैं।
  • सीएमई अक्सर (लेकिन हमेशा नहीं) सौर ज्वालाओं से जुड़े होते हैं। 
  • ये विस्फोट तब होते हैं जब बड़े, विशाल कोरोनल लूप या फिलामेंट्स (चुंबकीय क्षेत्रों द्वारा फंसी गैसें, कुछ हद तक लोहे के बुरादे की तरह) किसी तरह से हिलते या विचलित होते हैं। 
  • इससे पूरा लूप सिस्टम अस्थिर हो जाता है, जिससे फंसा हुआ पदार्थ मुक्त होकर बाहर निकल सकता है और अपने साथ कुछ चुंबकीय क्षेत्र को भी खींच ले जाता है।
  • साइंटिस्ट्स ने कहा कि क्योंकि CMEs पृथ्वी के पास की जगह में गड़बड़ी पैदा कर सकते हैं, इसलिए उनके फटने के समय सूरज से फैलने की दिशा का अंदाज़ा लगाना ज़रूरी है।

आदित्य एल1 के बारे में 

  • आदित्य-एल1 भारत का पहला अंतरिक्ष-आधारित सौर वेधशाला मिशन है, जिसका उद्देश्य सूर्य का अध्ययन करना है। यह पृथ्वी से लगभग 15 लाख किलोमीटर दूर स्थित लैग्रेंज बिंदु L1 की ओर अग्रसर है और वहाँ तक पहुँचने में इसे लगभग 125 दिन लगने का अनुमान था।
  • वर्ष 2015 में प्रक्षेपित एस्ट्रोसैट के बाद, आदित्य-एल1 इसरो का दूसरा खगोल विज्ञान वेधशाला-श्रेणी का मिशन है।
  • आदित्य-एल1 की यात्रा अवधि भारत के पूर्ववर्ती मंगल ऑर्बिटर मिशन, मंगलयान की तुलना में काफी कम है।
  • इस मिशन के अंतर्गत अंतरिक्ष यान को सूर्य-पृथ्वी प्रणाली के लैग्रेंज बिंदु L1 के चारों ओर एक प्रभामंडल कक्षा (Halo Orbit) में स्थापित करने की योजना बनाई गई है। यहाँ से यह इन-सीटू (प्रत्यक्ष स्थानीय मापन) तथा सुदूर संवेदन तकनीकों के माध्यम से सूर्य का अध्ययन करेगा। इससे सौर गतिविधियों की गतिशीलता और अंतरग्रहीय माध्यम में उनके प्रसार के प्रभावों को समझने में महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक जानकारी प्राप्त होगी।
  • आदित्य एल1 पेलोड के सूट से कोरोनल हीटिंग, कोरोनल मास इजेक्शन, प्री-फ्लेयर और फ्लेयर गतिविधियों और उनकी विशेषताओं, अंतरिक्ष मौसम की गतिशीलता, कणों और क्षेत्रों के प्रसार आदि की समस्या को समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण जानकारी मिलने की उम्मीद है।

मिशन के प्रमुख वैज्ञानिक उद्देश्य: 

  • सूर्य के क्रोमोस्फीयर और कोरोना की गतिशीलता का अध्ययन करना।
  • कोरोनल तापन, प्लाज्मा भौतिकी और सौर ज्वालाओं की प्रक्रियाओं को समझना।
  • सौर कणों एवं प्लाज्मा के वातावरण का प्रत्यक्ष अवलोकन करना।
  • कोरोनल मास इजेक्शन (CME) की उत्पत्ति, विकास और गतिशीलता का अध्ययन करना।
  • कोरोनल प्लाज्मा के तापमान, वेग और घनत्व का विश्लेषण करना।
  • सौर विस्फोटों से संबंधित विभिन्न प्रक्रियाओं के क्रम की पहचान करना।
  • सौर कोरोना में चुंबकीय क्षेत्र की संरचना एवं तीव्रता का अध्ययन करना।
  • सौर पवन की उत्पत्ति, संरचना और गतिशीलता का अध्ययन कर अंतरिक्ष मौसम को समझना। 
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