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एग्रीवोल्टाइक्स: कृषि और सौर ऊर्जा के संगम से बढ़ेगी किसानों की आय

संदर्भ 

भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि की महत्वपूर्ण भूमिका है। देश की लगभग 46.1 प्रतिशत आबादी की आजीविका कृषि पर निर्भर है। वर्ष 2025-26 में कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों का सकल मूल्य वर्धन (GVA) 52.08 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। ऐसे में किसानों की आय बढ़ाने, सिंचाई की लागत घटाने और स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए एग्रीवोल्टाइक्स एक महत्वपूर्ण विकल्प बनकर उभर रहा है। यह तकनीक एक ही भूमि पर खेती और सौर बिजली उत्पादन को संभव बनाती है।  

एग्रीवोल्टाइक्स क्या है और कैसे काम करता है? 

  • एग्रीवोल्टाइक्स को एग्रिसोलर या डुअल-यूज सोलर तकनीक भी कहा जाता है। इसमें सौर पैनलों को इस तरह स्थापित किया जाता है कि उनके नीचे या बीच में फसलों की खेती अथवा पशुपालन जारी रखा जा सके। पारंपरिक सौर परियोजनाओं के विपरीत, इसमें कृषि उत्पादन और बिजली उत्पादन दोनों को महत्व दिया जाता है।

7वां 'एग्रीवोल्टाइक्स विश्व सम्मेलन: 

  • नई दिल्ली में 21-23 अक्टूबर 2026 को आयोजित होने वाला 7वां 'एग्रीवोल्टाइक्स विश्व सम्मेलन' - सौर ऊर्जा और कृषि के एकीकरण को बढ़ावा देने के लिए एक वैश्विक मंच के रूप में कार्य करता है। 
  • इसका विषय "पावरिंग द ग्लोबल साउथ" है। उद्योग, अनुसंधान, नीति और वित्त क्षेत्रों के हितधारकों को एक साथ लाने वाला यह सम्मेलन, एग्रीवोल्टाइक्स में उभरते अवसरों पर केंद्रित है। 
  • इसका उद्देश्य भूमि के कुशल उपयोग को बढ़ावा देना, कृषि की स्थिरता को मजबूत करना और कम कार्बन उत्सर्जन वाली अर्थव्यवस्था की ओर बदलाव में सहयोग देना है। 
  • इस प्रणाली में ऊंचे ढांचे पर सौर पैनल लगाए जाते हैं, जिससे कृषि उपकरणों की आवाजाही और खेती के लिए जगह उपलब्ध हो सकती है। पैनलों से मिलने वाली आंशिक छाया कुछ फसलों को अत्यधिक गर्मी से बचाने और मिट्टी में नमी बनाए रखने में मदद कर सकती है। हालांकि, इसके लाभ फसल, पैनलों के डिजाइन और स्थानीय जलवायु पर निर्भर करते हैं।

भारत में एग्रीवोल्टाइक्स की जरूरत और संभावनाएं 

  • वर्ष 2023-24 के भूमि उपयोग आंकड़ों के अनुसार, भारत का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 306.96 मिलियन हेक्टेयर है, जिसमें लगभग 55 प्रतिशत कृषि भूमि है। देश में शुद्ध बुआई का क्षेत्र 138.99 मिलियन हेक्टेयर और कुल फसल क्षेत्र 217.88 मिलियन हेक्टेयर है। यह विशाल कृषि क्षेत्र सौर ऊर्जा उत्पादन के साथ भूमि के दोहरे उपयोग के अवसर प्रदान करता है।

 भारत एग्रीवोल्टेइक्स गठबंधन 

  • भारतीय राष्ट्रीय सौर ऊर्जा संघ (एनएसईएफआई) द्वारा संचालित भारत एग्रीवोल्टिक्स गठबंधन (आईएए) एक बहु-हितधारक मंच है जो सौर ऊर्जा उत्पादन और कृषि के लिए भूमि के दोहरे उपयोग को बढ़ावा देता है। 
  • वर्ष 2023 में शुरू हुए इस गठबंधन के सदस्यों की संख्या बढ़कर 40 से अधिक हो गई है और यह सरकारी मंत्रालयों और उद्योग जगत के हितधारकों के साथ मिलकर नीतिगत समर्थन, अनुसंधान और जमीनी स्तर पर कार्यान्वयन के माध्यम से एग्रीवोल्टिक्स को आगे बढ़ाने का काम करता है। 
  • यह ज्ञान संसाधनों का विकास करता है, प्रायोगिक परियोजनाओं को बढ़ावा देता है और भूमि उत्पादकता में सुधार, किसानों की आय में विविधता लाने और ग्रामीण ऊर्जा तक पहुंच को मजबूत करने के लिए बडे पैमाने पर व्यावसायिक मॉडलों का समर्थन करता है। 
  • एग्रीवोल्टाइक्स से किसानों को सिंचाई के लिए सौर बिजली मिल सकती है, डीजल पर निर्भरता कम हो सकती है और अतिरिक्त बिजली ग्रिड में बेचकर आय अर्जित करने का अवसर मिल सकता है। उपयुक्त परिस्थितियों में इससे जल संरक्षण और भूमि उपयोग दक्षता में भी सुधार संभव है।  
  • विभिन्न अनुमानों के अनुसार, भारत में एग्रीवोल्टाइक्स की संभावित क्षमता 3,000 से 14,000 गीगावाट तक हो सकती है। जीआईएस आधारित राष्ट्रीय स्क्रीनिंग में एग्री-पीवी के लिए उपयुक्त 47.35 मिलियन हेक्टेयर प्रतिबंधित कृषि भूमि की पहचान की गई है। हालांकि, वास्तविक क्षमता भूमि की उपयुक्तता और तकनीकी-आर्थिक व्यवहार्यता पर निर्भर करेगी।

उपयुक्त फसलें और संभावित राज्य 

  • एग्रीवोल्टाइक्स के अंतर्गत फलों, सब्जियों, मसालों और औषधीय पौधों की खेती की संभावनाएं हैं। फसल का चयन उसकी धूप की आवश्यकता, पैनलों से मिलने वाली छाया और स्थानीय मिट्टी एवं जलवायु के आधार पर करना जरूरी है।
  • महाराष्ट्र, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश में कृषि भूमि तथा सौर संसाधनों की उपलब्धता के कारण इसकी व्यापक संभावनाएं मानी जाती हैं। अनुमानों के अनुसार, ये राज्य मिलकर भारत की संभावित एग्री-पीवी बिजली उत्पादन क्षमता का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा समेट सकते हैं। ओडिशा, तमिलनाडु, केरल, तेलंगाना, बिहार और पश्चिम बंगाल में भी इसके विकास की संभावनाएं हैं। 

भारत में एग्रीवोल्टाइक्स की वर्तमान स्थिति  

  • अगस्त 2025 तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, भारत में 36 एग्रीवोल्टाइक परियोजनाएं चालू थीं, जिनकी कुल स्थापित क्षमता 37.54 मेगावाट थी। इसके अतिरिक्त, 10 प्रायोगिक परियोजनाएं विकास के चरण में थीं। इन परियोजनाओं में ऊंचे सौर ढांचे, फसलों के बीच पर्याप्त दूरी और सूर्य की दिशा के अनुसार पैनलों की स्थिति बदलने वाली ट्रैकिंग प्रणालियों का इस्तेमाल किया जा रहा है।  

एग्रीवोल्टाइक्स को बढ़ावा देने वाली सरकारी पहल 

  • प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान (पीएम-कुसुम): फरवरी 2019 में शुरू की गई इस योजना का उद्देश्य कृषि पंपों का सौरकरण, विकेंद्रीकृत सौर ऊर्जा उत्पादन और किसानों के लिए स्वच्छ ऊर्जा की उपलब्धता बढ़ाना है। इसमें लगभग 34,422 करोड़ रुपये की केंद्रीय वित्तीय सहायता का प्रावधान बताया गया है। इसके कुछ घटक किसानों को अतिरिक्त बिजली बेचकर आय अर्जित करने का अवसर भी देते हैं।
  • एग्रीवोल्टाइक्स उत्कृष्टता केंद्र: राष्ट्रीय सौर ऊर्जा संस्थान (NISE) ने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) के सहयोग से अनुसंधान, प्रदर्शन और क्षमता निर्माण के लिए उत्कृष्टता केंद्र स्थापित किया है। आईएआरआई में स्थापित 100 किलोवाट की एग्रीवोल्टाइक प्रणाली इसका एक उदाहरण है। 

राज्य स्तरीय पहल: 

  • महाराष्ट्र की मुख्यमंत्री सौर कृषि वाहिनी योजना 2.0 के तहत लगभग 35,000 एकड़ भूमि पर 16,000 मेगावाट क्षमता की सौर परियोजनाएं स्थापित करने की योजना का उल्लेख किया गया है। 
  • गुजरात की किसान सूर्योदय योजना कृषि कार्यों के लिए बिजली की उपलब्धता बढ़ाने पर केंद्रित है, जबकि कर्नाटक की सूर्य रैथा योजना सौर सिंचाई पंपों और अतिरिक्त बिजली से किसानों की आय बढ़ाने को प्रोत्साहित करती है।

प्रमुख चुनौतियां और समाधान 

  • एग्रीवोल्टाइक्स के विस्तार में ऊंचे सौर ढांचों की प्रारंभिक लागत, उपयुक्त फसलों का चयन, कृषि मशीनरी की आवाजाही, किसानों में तकनीकी जानकारी की कमी और ग्रिड से बिजली जोड़ने जैसी चुनौतियां हैं।  
  • अधिक छाया कुछ फसलों की पैदावार घटा सकती है, इसलिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप डिजाइन और वैज्ञानिक परीक्षण जरूरी हैं। 
  • वित्तीय सहायता, किसानों का प्रशिक्षण, स्पष्ट बिजली खरीद व्यवस्था और कृषि वैज्ञानिकों की भागीदारी इन समस्याओं के समाधान में मदद कर सकती है। 

निष्कर्ष 

  • एग्रीवोल्टाइक्स भारत में कृषि और नवीकरणीय ऊर्जा को एकीकृत करने का प्रभावी अवसर प्रस्तुत करता है। इससे किसानों की आय के स्रोत बढ़ाने, सिंचाई की लागत घटाने, भूमि का बेहतर उपयोग करने और स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन को गति देने में मदद मिल सकती है। वैज्ञानिक अनुसंधान, उपयुक्त फसल चयन, सरकारी सहयोग और किसानों की सक्रिय भागीदारी के माध्यम से यह तकनीक भारत की कृषि व्यवस्था को अधिक टिकाऊ, ऊर्जा-कुशल और आर्थिक रूप से मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।   
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