संदर्भ
हाल ही में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता वाली आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीईए) ने विपणन सीजन 2027-28 के लिए सभी अधिदेशित रबी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में वृद्धि को मंजूरी दे दी है।
प्रमुख बिंदु
- सरकार ने रबी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में विपणन सीजन 2027-28 के लिए वृद्धि की है, ताकि किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य मिल सके।
- एमएसपी में सबसे अधिक वृद्धि कुसुम के लिए घोषित की गई है, जो 675 रुपये प्रति क्विंटल है।
- इसके बाद रेपसीड और सरसों के लिए 413 रुपये प्रति क्विंटल की वृद्धि हुई है।
- मसूर, जौ, चना और गेहूं के लिए क्रमशः 390 रुपये प्रति क्विंटल, 136 रुपये प्रति क्विंटल, 83 रुपये प्रति क्विंटल और 25 रुपये प्रति क्विंटल की वृद्धि की गई है।
विपणन सीजन 2027-28 के लिए अधिदेशित रबी फसलों के लिए एमएसपी में वृद्धि का आधार
- विपणन सीजन 2027-28 के लिए अधिदेशित रबी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में वृद्धि केंद्रीय बजट 2018-19 में एमएसपी को अखिल भारतीय भारित औसत उत्पादन लागत के कम से कम 1.5 गुना पर निर्धारित करने की घोषणा के अनुरूप है।
- अखिल भारतीय भारित औसत उत्पादन लागत पर अपेक्षित मार्जिन
- गेहूं के लिए 106 प्रतिशत,
- सरसों और रेपसीड के लिए 96 प्रतिशत;
- मसूर के लिए 92 प्रतिशत;
- चना के लिए 59 प्रतिशत;
- जौ के लिए 58 प्रतिशत; और कुसुम के लिए 50 प्रतिशत है।
- रबी फसलों के इस बढ़े हुए एमएसपी से किसानों को लाभकारी मूल्य सुनिश्चित होगा और फसल विविधीकरण को प्रोत्साहन मिलेगा। वस्तुतः हाल के वर्षों में, सरकार अनाज के अतिरिक्त दलहन और तिलहन जैसी अन्य फसलों के लिए उच्च एमएसपी की पेशकश के जरिये इन्हें बढ़ावा दे रही है।
फसलों की खरीद में वृद्धि
- वित्तीय वर्ष 2014-15 से 2025-26 के दौरान गेहूं की खरीद 3715 लाख मीट्रिक टन तक बढ़ गई है, जबकि 2004-05 से 2013-14 के दौरान यह 2254 लाख मीट्रिक टन थी। इसी प्रकार, 2014-15 से 2025-26 के दौरान रबी की छह फसलों की खरीद 3921 लाख मीट्रिक टन तक बढ़ गई है, जो 2004-05 से 2013-14 के दौरान 2302 लाख मीट्रिक टन थी।
उत्पादक किसानों के भुगतान में वृद्धि
- वर्ष 2014-15 से 2025-26 के दौरान गेहूं उत्पादक किसानों को भुगतान किया गया एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) बढ़कर 7.31 लाख करोड़ रुपये हो गया है, जबकि वर्ष 2004-05 से 2013-14 के दौरान यह 2.56 लाख करोड़ रुपये था।
- इसी प्रकार, वर्ष 2014-15 से 2025-26 के दौरान रबी की छह फसलों के उत्पादक किसानों को भुगतान किया गया एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) बढ़कर 8.36 लाख करोड़ रुपये हो गया है, जबकि वर्ष 2004-05 से 2013-14 के दौरान यह 2.65 लाख करोड़ रुपये था।
न्यूनतम समर्थन मूल्य (Minimum Support Price - MSP) के बारे में
- न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) भारत सरकार द्वारा किया जाने वाला बाजार हस्तक्षेप का एक रूप है, जिसका उद्देश्य कृषि उत्पादकों को कृषि उपज की कीमतों में होने वाली किसी भी तेज गिरावट से सुरक्षा प्रदान करना है।
- सरकार द्वारा कुछ फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा बुवाई के मौसम की शुरुआत में कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (Commission for Agricultural Costs and Prices — CACP) की सिफारिशों के आधार पर की जाती है।
एमएसपी क्या है?
- एमएसपी वह मूल्य है जिसे भारत सरकार किसानों को अत्यधिक उत्पादन वाले वर्षों में कीमतों में होने वाली भारी गिरावट से बचाने के लिए निर्धारित करती है।
- यह किसानों की उपज के लिए सरकार द्वारा दिया जाने वाला गारंटीकृत मूल्य है।
- इसके प्रमुख उद्देश्य किसानों को मजबूरी में कम कीमत पर उपज बेचने (distress sale) से बचाना तथा सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए खाद्यान्न की खरीद करना है।
- यदि बाजार में अधिक उत्पादन और उपज की भरमार के कारण किसी कृषि वस्तु का बाजार मूल्य घोषित एमएसपी से नीचे चला जाता है, तो सरकारी एजेंसियां किसानों द्वारा बिक्री के लिए प्रस्तुत की गई पूरी मात्रा को घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदती हैं।
एमएसपी के अंतर्गत शामिल फसल:
वर्तमान में न्यूनतम समर्थन मूल्य 24 कृषि जिंसों के लिए घोषित किया जाता है, जिनमें शामिल हैं:
- सात अनाज: धान, गेहूं, जौ, ज्वार, बाजरा, मक्का और रागी।
- पांच दलहन: चना, अरहर/तूर, मूंग, उड़द और मसूर।
- आठ तिलहन: मूंगफली, रेपसीड/सरसों, तोरिया, सोयाबीन, सूरजमुखी के बीज, तिल, कुसुम के बीज और नाइजरसीड।
- अन्य फसलें: कोपरा, कच्चा कपास, कच्चा जूट और वर्जीनिया फ्लू-क्योर्ड (VFC) तंबाकू।
एमएसपी की आवश्यकता:
- इन फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य को इस प्रकार प्रोत्साहनकारी स्तर पर निर्धारित किया जाता है कि किसान अपने खेतों में पूंजी निवेश करने, बेहतर कृषि उत्पादन तकनीकों को अपनाने तथा उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रेरित हों, जिससे उनकी शुद्ध आय में वृद्धि हो सके।
- यदि इस प्रकार की गारंटीकृत कीमत उपलब्ध न हो, तो यह चिंता रहती है कि किसान इन फसलों की खेती छोड़कर दूसरी फसलों की ओर रुख कर सकते हैं, जिसके परिणामस्वरूप इन कृषि वस्तुओं की कमी हो सकती है।