संदर्भ
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम, 1958 यानी अफस्पा को मणिपुर, नगालैंड और अरुणाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों में 1 अक्टूबर 2026 से अगले छह महीने के लिए बढ़ा दिया है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब पूर्वोत्तर के अलग-अलग राज्यों में अफस्पा का दायरा पिछले कुछ वर्षों में लगातार सीमित किया गया है, जबकि मणिपुर में 2023 में शुरू हुए जातीय संघर्ष के बाद इसकी भूमिका फिर बढ़ी है।
मणिपुर में कहां लागू रहेगा अफस्पा?
- मणिपुर के पूरे राज्य को अफस्पा के तहत “अशांत क्षेत्र” घोषित किया गया है। हालांकि, घाटी के पांच जिलों के 13 पुलिस थाना क्षेत्रों को इससे बाहर रखा गया है। इनमें इंफाल, लैंफेल, सिटी, सिंगजामेई, पाटसोई, वांगोई, पोरोमपाट, हेइंगांग, इरिलबुंग, थौबल, बिष्णुपुर, नामबोल और काकचिंग शामिल हैं।
- मणिपुर में 3 मई 2023 को जातीय संघर्ष शुरू हुआ था। इससे पहले राज्य में अफस्पा का दायरा चरणबद्ध तरीके से कम किया जा रहा था। 2022 और 2023 के बीच मणिपुर घाटी के सभी पुलिस थाना क्षेत्रों से अफस्पा हटा लिया गया था। हालांकि, मई 2023 में हिंसा शुरू होने के बाद सुरक्षा स्थिति में बदलाव आया और कुछ क्षेत्रों में कानून को दोबारा लागू किया गया।
- 14 नवंबर 2024 को गृह मंत्रालय ने छह पुलिस थाना क्षेत्रों में अफस्पा फिर से लागू किया था। इनमें इंफाल पश्चिम के सेकमाई और लमसांग, इंफाल पूर्व का लामलाई, जिरीबाम, बिष्णुपुर का मोइरांग और कांगपोकपी का लीमाखोंग शामिल थे।
- गृह मंत्रालय ने उस समय कहा था कि अफस्पा की जरूरत सुरक्षा बलों को बेहतर समन्वित अभियान चलाने और उग्रवादी संगठनों की गतिविधियों पर नियंत्रण के लिए है।
अफस्पा के बारे में
- अफस्पा को 1958 में ऐसे क्षेत्रों में सशस्त्र बलों को विशेष अधिकार देने के लिए लागू किया गया था, जिन्हें उग्रवाद या गंभीर आंतरिक सुरक्षा समस्याओं के कारण “अशांत” घोषित किया जाता है।
- अधिनियम की धारा 3 के तहत किसी क्षेत्र को अशांत घोषित किए जाने के बाद वहां तैनात सशस्त्र बलों को सामान्य पुलिस की तुलना में अतिरिक्त अधिकार मिलते हैं। निर्धारित शर्तों के तहत वे निषेधाज्ञा का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति के खिलाफ बल का प्रयोग कर सकते हैं, जिसमें घातक बल भी शामिल है। उन्हें बिना वारंट गिरफ्तारी करने और बिना वारंट परिसर में प्रवेश तथा तलाशी लेने का अधिकार भी प्राप्त होता है।
- अफस्पा सुरक्षा बलों को कानूनी संरक्षण भी प्रदान करता है। अधिनियम के तहत किए गए किसी कार्य के संबंध में अभियोजन, मुकदमा या अन्य कानूनी कार्यवाही शुरू करने के लिए केंद्र सरकार की पूर्व मंजूरी आवश्यक होती है। इन्हीं विशेष शक्तियों और कानूनी संरक्षण के कारण अफस्पा लंबे समय से सार्वजनिक और राजनीतिक बहस का विषय रहा है।
अशांत क्षेत्र घोषित करने का अधिकार
- अफस्पा की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि केंद्र और राज्य सरकार दोनों धारा 3 के तहत किसी क्षेत्र को अशांत घोषित कर सकते हैं।
- मणिपुर में लंबे समय तक राज्य सरकार ही इस संबंध में अधिसूचनाएं जारी करती रही थी। हालांकि, मई 2023 की हिंसा के बाद केंद्र की भूमिका अधिक प्रत्यक्ष हुई। नवंबर 2024 में गृह मंत्रालय द्वारा छह पुलिस थाना क्षेत्रों में अफस्पा दोबारा लागू किया जाना इसका उदाहरण था।
- उस समय मणिपुर सरकार ने भी केंद्र के फैसले पर अलग रुख अपनाया था। 15 नवंबर 2024 को तत्कालीन मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह की अध्यक्षता में राज्य मंत्रिमंडल ने केंद्र से इस अधिसूचना की समीक्षा कर इसे “जनहित में” वापस लेने की सिफारिश की थी।
- इसके बाद मणिपुर की राजनीतिक परिस्थितियां बदलीं। 13 फरवरी 2025 को राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया गया, जिसे 4 फरवरी 2026 को हटा दिया गया।
नगालैंड और अरुणाचल प्रदेश में क्यों जारी है अफस्पा?
- नगालैंड में अफस्पा नौ जिलों - दीमापुर, निउलैंड, चुमौकेदिमा, मोन, किफिरे, नोकलाक, फेक, पेरेन और मेलुरी में लागू रहेगा। इसके अलावा कोहिमा, मोकोकचुंग, लोंगलेंग, वोखा और जुन्हेबोटो के 21 पुलिस थाना क्षेत्रों में भी यह जारी रहेगा।
- नगालैंड में अफस्पा का संबंध लंबे समय से चले आ रहे उग्रवाद और नागा राजनीतिक मुद्दे से रहा है। केंद्र सरकार ने नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (इसाक-मुइवा) यानी एनएससीएन-आईएम और नगा नेशनल पॉलिटिकल ग्रुप्स यानी एनएनपीजी के साथ शांति वार्ता की है। शांति प्रक्रिया के अंतिम निष्कर्ष को लेकर बनी अनिश्चितता को भी कुछ क्षेत्रों में अफस्पा जारी रहने के कारणों में गिना गया है।
- अरुणाचल प्रदेश में अफस्पा तिरप, चांगलांग और लोंगडिंग जिलों में जारी रहेगा। इसके अलावा असम से लगे नामसाई जिले के नामसाई, महादेवपुर और चौखाम पुलिस थाना क्षेत्रों में भी यह लागू रहेगा। इन इलाकों में अफस्पा का दायरा मुख्य रूप से उग्रवादी गतिविधियों और अंतरराज्यीय सीमा से जुड़े सुरक्षा मुद्दों को ध्यान में रखकर निर्धारित किया गया है।
पूर्वोत्तर में अफस्पा का दायरा कितना घटा है?
- पिछले कुछ वर्षों में पूर्वोत्तर में अफस्पा का भौगोलिक दायरा काफी कम हुआ है। असम इसका प्रमुख उदाहरण है। 1 अप्रैल 2022 से असम में अफस्पा के दायरे में बड़ी कटौती की गई और अब यह तिनसुकिया, चराईदेव और शिवसागर जिलों तक सीमित है।
- त्रिपुरा ने 2015 में पूरे राज्य से अफस्पा हटा लिया था। मेघालय में 27 वर्षों तक लागू रहने के बाद इसे 1 अप्रैल 2018 से हटा दिया गया।
- अफस्पा का दायरा कम किए जाने को सुरक्षा स्थिति में सुधार, उग्रवादी हिंसा में कमी, उग्रवादियों के आत्मसमर्पण और गिरफ्तारियों से जोड़कर देखा गया है। हालांकि, मणिपुर में 2023 के बाद की परिस्थितियों ने इस क्रम को प्रभावित किया है।
जम्मू-कश्मीर में क्या स्थिति है?
- जम्मू-कश्मीर में पूर्वोत्तर राज्यों से अलग कानून लागू है। वहां जम्मू-कश्मीर सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम, 1990 प्रभावी है।
निष्कर्ष
- इस तरह वर्तमान में अफस्पा का प्रयोग पूरे पूर्वोत्तर में समान रूप से नहीं हो रहा है। इसका दायरा राज्य, जिला और यहां तक कि पुलिस थाना स्तर पर अलग-अलग निर्धारित किया जाता है। मणिपुर में 2023 के बाद बदली सुरक्षा परिस्थितियां और नगालैंड में जारी राजनीतिक-उग्रवादी मुद्दे इस कानून के मौजूदा भौगोलिक दायरे को समझने के लिए महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि प्रदान करते हैं।