New
Hindi Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 14th Oct. 2026, 06:00 PM Hindi Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 23rd Oct. 2026, 11:00 AM English Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 07th Dec. 2026, 5:30PM English Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 03rd Oct. 2026, 11:00 AM Hindi Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 14th Oct. 2026, 06:00 PM Hindi Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 23rd Oct. 2026, 11:00 AM English Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 07th Dec. 2026, 5:30PM English Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 03rd Oct. 2026, 11:00 AM

केमिकल सिग्नेचर से मिलेगी बीमारियों की पहचान में मदद

संदर्भ 

शरीर में होने वाले छोटे-छोटे रासायनिक बदलाव कई बीमारियों की पहचान करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। खासकर अल्जाइमर, पार्किंसन और ऑटोइम्यून एन्सेफलाइटिस जैसी मस्तिष्क एवं तंत्रिका तंत्र से जुड़ी बीमारियों में केमिकल सिग्नेचर और बायोमार्कर के जरिए बीमारी के संभावित कारणों का पता लगाने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इन जांचों के नतीजों को मरीज के लक्षणों और मेडिकल हिस्ट्री के साथ समझना जरूरी है।   

क्या होते हैं केमिकल सिग्नेचर और बायोमार्कर? 

  • किसी व्यक्ति को याददाश्त कमजोर होने की समस्या होती है, तो किसी को दौरे पड़ते हैं या उसके व्यवहार में बदलाव आने लगते हैं। इन लक्षणों के पीछे अल्जाइमर रोग, प्रतिरक्षा प्रणाली से जुड़ा विकार या कोई दूसरी बीमारी हो सकती है। ऐसे में डॉक्टरों के लिए यह पता लगाना जरूरी होता है कि समस्या की असली वजह क्या है। 
  • कई बार बीमारी का कारण शरीर की रासायनिक संरचना में होने वाले सूक्ष्म बदलावों से मिलता है। बीमारियों के कारण कुछ प्रोटीन, अणुओं और अन्य रासायनिक पदार्थों की मात्रा या उनकी गतिविधियों में बदलाव हो सकता है। इन बदलावों का विश्लेषण करके बीमारी से जुड़े संकेत हासिल किए जा सकते हैं।   
  • इन्हीं संकेतों को केमिकल सिग्नेचर यानी रासायनिक हस्ताक्षर या बायोमार्कर कहा जाता है। किसी नमूने में मौजूद अणुओं, तत्वों, समस्थानिकों और रासायनिक उप-उत्पादों के विशिष्ट पैटर्न की पहचान स्पेक्ट्रोमीटर और क्रोमैटोग्राफ जैसे उपकरणों से की जा सकती है। 
  • चेन्नई के वानगरम स्थित अपोलो स्पेशियलिटी हॉस्पिटल्स के कंसल्टेंट न्यूरोलॉजिस्ट श्रीनिवास यू.एम. के अनुसार, रासायनिक हस्ताक्षर शरीर की उंगलियों के निशान की तरह होते हैं। बीमारी के दौरान शरीर में कुछ रसायनों और प्रोटीन का संतुलन बदल सकता है, जो उसकी पहचान करने में मददगार साबित होता है। 

डिमेंशिया और अल्जाइमर की पहचान में बायोमार्कर की भूमिका 

  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, वर्ष 2021 में दुनियाभर में लगभग 5.7 करोड़ लोग डिमेंशिया से पीड़ित थे। इनमें से करीब 60 से 70 प्रतिशत मामले अल्जाइमर रोग के थे। संगठन का अनुमान है कि प्रत्येक वर्ष डिमेंशिया के लगभग एक करोड़ नए मामले सामने आते हैं।  
  • अल्जाइमर रोग में डॉक्टर एमिलॉयड-बीटा और टाउ नामक प्रोटीन में होने वाले बदलावों का अध्ययन करते हैं। इन प्रोटीनों के कुछ विशेष रूपों की पहचान खून और मस्तिष्कमेरु द्रव (सेरेब्रोस्पाइनल फ्लूइड) की जांच से की जा सकती है। यह द्रव मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी के आसपास मौजूद होता है। 
  • इनमें फॉस्फोरिलेटेड टाउ, खासकर पी-टाउ217 (p-tau217), एक महत्वपूर्ण बायोमार्कर है। इसकी जांच से अल्जाइमर रोग से जुड़े बदलावों की पहचान करने में मदद मिल सकती है।  
  • चेन्नई के प्रशांत हॉस्पिटल्स की कंसल्टेंट न्यूरोलॉजिस्ट श्रुति डेगापुडी के अनुसार, ऐसी जांचों से डॉक्टर मरीज के लक्षणों के साथ-साथ बीमारी के संभावित मूल कारण को समझने की कोशिश कर सकते हैं। हालांकि, बायोमार्कर में बदलाव मिलने का यह अर्थ नहीं है कि व्यक्ति को निश्चित रूप से डिमेंशिया होगा।  

पार्किंसन और ऑटोइम्यून एन्सेफलाइटिस में भी उपयोगी

  • शोधकर्ता पार्किंसन रोग से जुड़े अल्फा-सिन्यूक्लिन नामक प्रोटीन का भी अध्ययन कर रहे हैं। इसके अलावा, ऑटोइम्यून एन्सेफलाइटिस में मस्तिष्क के विशेष प्रोटीनों के खिलाफ बनने वाली एंटीबॉडी की जांच उपयोगी हो सकती है।
  • ऑटोइम्यून एन्सेफलाइटिस ऐसी स्थिति है, जिसमें प्रतिरक्षा प्रणाली की प्रतिक्रिया मस्तिष्क को प्रभावित करती है। इससे मरीज को दौरे पड़ सकते हैं, याददाश्त संबंधी समस्याएं हो सकती हैं और उसके व्यवहार में बदलाव आ सकते हैं। शुरुआती लक्षण कभी-कभी मानसिक बीमारी जैसे दिखाई देते हैं, जिससे सही पहचान में देरी हो सकती है। विशिष्ट एंटीबॉडी की पहचान डॉक्टरों को इस स्थिति का पता लगाने और उचित उपचार शुरू करने में मदद देती है।
  • चेन्नई के डॉ. मेहता हॉस्पिटल्स के वरिष्ठ कंसल्टेंट न्यूरोसर्जन आकिब एम. के अनुसार, मस्तिष्क के ट्यूमर की आणविक विशेषताओं की जांच से उसके प्रकार का वर्गीकरण करने और उपचार संबंधी फैसले लेने में मदद मिल सकती है। विशेषज्ञ चिकित्सा में कुछ आणविक जांचों का इस्तेमाल पहले से किया जा रहा है। 
  • शोधकर्ता न्यूरोफिलामेंट लाइट नामक प्रोटीन का भी अध्ययन कर रहे हैं। यह तंत्रिका कोशिकाओं को होने वाली क्षति का संकेत दे सकता है, हालांकि यह जरूरी नहीं कि किसी एक विशेष बीमारी की ही पहचान करे।

ब्लड, मस्तिष्कमेरु द्रव और त्वचा के नमूनों से जांच 

बायोमार्कर की जांच के लिए किस तरह का नमूना लिया जाएगा, यह बीमारी और जांच के उद्देश्य पर निर्भर करता है। 

  • ब्लड: इसका नमूना लेना अपेक्षाकृत आसान होता है और इसमें कुछ विशेष प्रोटीनों के स्तर की जांच की जा सकती है। 
  • मस्तिष्कमेरु द्रव: इससे मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी में चल रही प्रक्रियाओं के बारे में जानकारी मिल सकती है।
  • त्वचा के नमूने: कुछ तंत्रिका संबंधी बीमारियों की पहचान में इनकी संभावित भूमिका पर शोध जारी है।  

इन जांचों का एक प्रमुख लाभ यह है कि शरीर में कुछ बदलाव लक्षण स्पष्ट होने से पहले ही शुरू हो सकते हैं। ऐसे बदलावों की पहचान से बीमारी के मूल कारण का पहले पता लगाने में मदद मिल सकती है। हालांकि, जल्दी पहचान होने से लक्षणों को रोक पाना हमेशा संभव नहीं होता।

बीमारी की पहचान में चुनौतियां 

  • केमिकल सिग्नेचर हमेशा बीमारी की पूरी तस्वीर नहीं बताते। उम्र, किडनी की कार्यक्षमता, दवाओं का प्रयोग और अन्य बीमारियां शरीर में कुछ अणुओं के स्तर को प्रभावित कर सकती हैं। इसके अलावा, बीमारी की अवस्था और नमूना लेने तथा जांच करने के तरीकों से भी नतीजे बदल सकते हैं। 
  • कुछ बायोमार्कर कई बीमारियों में होने वाली कोशिकीय क्षति का संकेत देते हैं। इसलिए, केवल एक जांच के आधार पर किसी विशेष बीमारी की पुष्टि करना हमेशा संभव नहीं होता।
  • डॉक्टर बायोमार्कर के नतीजों के साथ मरीज के लक्षणों, मेडिकल हिस्ट्री और शारीरिक जांच को भी ध्यान में रखते हैं। जरूरत पड़ने पर ब्रेन स्कैन और अन्य जांचें कराई जाती हैं। कुछ मामलों में मिलते-जुलते लक्षणों वाली बीमारियों के बीच अंतर करने के लिए कई बायोमार्कर की जांच करनी पड़ सकती है।
  • भारत में इन जांचों की लागत और उपलब्धता भी चुनौती है। हर अस्पताल में विशेष जांचों की सुविधा नहीं होती, इसलिए मरीजों को बड़े चिकित्सा केंद्रों तक जाना पड़ सकता है। अलग-अलग प्रयोगशालाओं में इस्तेमाल होने वाली जांच विधियों के अंतर से नतीजों की व्याख्या भी प्रभावित हो सकती है।  

बीमारी की जल्द पहचान में मदद 

  • केमिकल सिग्नेचर और बायोमार्कर भविष्य में कई बीमारियों की पहचान को अधिक सटीक बनाने और निदान में लगने वाला समय कम करने में मदद कर सकते हैं। खासकर मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र से जुड़ी बीमारियों में ये डॉक्टरों को लक्षणों के पीछे छिपे संभावित कारणों को समझने का अवसर देते हैं।
  • हालांकि, इनकी उपयोगिता केवल शरीर में बदलावों का पता लगाने तक सीमित नहीं है। यह समझना भी जरूरी है कि बदलाव किस वजह से हुए हैं और वे मरीज के स्वास्थ्य के बारे में क्या बताते हैं। इसलिए, बायोमार्कर की जांच को मरीज की संपूर्ण चिकित्सकीय स्थिति के साथ समझना ही सही निदान और उपचार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। 
« »
  • SUN
  • MON
  • TUE
  • WED
  • THU
  • FRI
  • SAT
Have any Query?

Our support team will be happy to assist you!

OR