खनन संशोधन को लेकर राज्यों में मतभेद

संदर्भ 

  • भारत जैसे संघीय देश में केन्द्र और राज्यों के बीच अधिकारों व संसाधनों को लेकर मतभेद आम हैं। प्राकृतिक संसाधनों और राजस्व से जुड़ा खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2026 इसी केन्द्र-राज्य तनाव की नई कड़ी है।
  • संशोधित कानून से खनन क्षेत्र में केन्द्र की नियामक शक्तियां बढ़ी हैं और अब खनिज-युक्त भूमि भी इसके दायरे में आएगी। राज्यों के नए खनिज कर लगाने पर भी रोक लगाई गई है, जबकि पहले लगाए गए लेकिन वसूल न किए गए कुछ करों को समाप्त करने का प्रावधान किया गया है। 

संवैधानिक अधिकारों पर प्रश्न   

  • भारत के संविधान में खानों और खनिजों से संबंधित शक्तियों का बंटवारा केन्द्र और राज्यों के बीच किया गया है। राज्य सूची की प्रविष्टि 23 राज्यों को खानों और खनिजों के नियमन की शक्ति देती है, लेकिन यह शक्ति संघ सूची की प्रविष्टि 54 के अधीन है। इसके तहत संसद सार्वजनिक हित में खनन और खनिज विकास के क्षेत्र में केंद्रीय कानून बनाकर राज्यों की नियामक शक्तियों की सीमा तय कर सकती है।  
  • दूसरी ओर, संविधान की राज्य सूची की प्रविष्टि 50 और 49 राज्यों को क्रमशः खनिज अधिकारों और भूमि पर कर लगाने की शक्ति देती हैं। यही संवैधानिक संतुलन अब नए संशोधन के बाद बहस के केंद्र में है।
  • मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 2024 में सर्वोच्च न्यायालय ने खनिजों पर राज्यों के कराधिकार को लेकर महत्वपूर्ण संवैधानिक स्थिति स्पष्ट की थी। न्यायालय ने माना था कि राज्य खनिज अधिकारों पर कर लगा सकते हैं, हालांकि संसद सार्वजनिक हित में इस शक्ति को सीमित कर सकती है। लेकिन खनिज-युक्त भूमि पर कर लगाने की राज्यों की शक्ति को संसद द्वारा प्रविष्टि 54 के आधार पर सीमित नहीं किया जा सकता।
  • इस लिहाज से नए संशोधन को लेकर यह सवाल उठ रहा है कि क्या संसद ने अपने नियामक अधिकार का विस्तार करते हुए राज्यों की संवैधानिक कराधान शक्तियों की सीमा को भी प्रभावित कर दिया है। 

राज्यों के लिए कितना बड़ा है वित्तीय दांव? 

  • यह विवाद केवल संवैधानिक अधिकारों तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध राज्यों की वित्तीय स्थिति से भी है। खनिज-संपन्न राज्यों के लिए खनिजों से मिलने वाला राजस्व सरकारी आय का महत्वपूर्ण स्रोत है। 
  • झारखंड और ओडिशा जैसे राज्यों में खनिजों से संबंधित प्राप्तियां गैर-कर राजस्व का लगभग 80% तक हैं। ऐसे में खनिजों से संबंधित कर या शुल्क लगाने तथा उन्हें बनाए रखने की क्षमता सीमित होने का इन राज्यों की वित्तीय स्थिति पर महत्वपूर्ण असर पड़ सकता है।  
  • दूसरी ओर, तेलंगाना और छत्तीसगढ़ में खनिज राजस्व का हिस्सा अपेक्षाकृत कम है - क्रमशः करीब 11% और 6%। वहीं कर्नाटक, मध्य प्रदेश और राजस्थान में यह हिस्सा क्रमशः 48%, 41% और 39% है। इससे स्पष्ट है कि राज्यों की आर्थिक निर्भरता अलग-अलग है। फिर भी राज्यों की प्रतिक्रिया केवल उनकी खनिज आय पर निर्भर नहीं दिखती। इसके पीछे राजनीतिक समीकरण भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। 

ओडिशा से लेकर तेलंगाना तक अलग-अलग रुख 

  • ओडिशा इसका सबसे दिलचस्प उदाहरण है। राज्य खनिज राजस्व पर काफी निर्भर है, लेकिन कानून के विरोध में राज्य के भीतर एक समान राजनीतिक रुख नहीं है। विपक्षी बीजू जनता दल ने संशोधन की आलोचना करते हुए विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने की मांग की है। दूसरी ओर, भाजपा के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने इस मांग को खारिज करते हुए कहा है कि संशोधन से राज्य के खनिज राजस्व को नुकसान नहीं होगा। 
  • इसके विपरीत, अपेक्षाकृत कम खनिज राजस्व पर निर्भर तेलंगाना ने अन्य गैर-राजग शासित राज्यों के साथ मिलकर संशोधन को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देने की तैयारी की है। 
  • कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश और केरल भी कानून के खिलाफ न्यायिक चुनौती की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। इन राज्यों का तर्क है कि खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त भूमि पर राज्य के कराधिकार को सीमित करना राज्यों की वित्तीय शक्तियों और संघीय ढांचे को कमजोर करता है। 
  • केरल ने एक अतिरिक्त चिंता जताई है। उसका कहना है कि खनिज-युक्त भूमि से जुड़े प्रावधानों के माध्यम से केन्द्र को राज्य के तटीय और वन क्षेत्रों पर भी व्यापक अधिकार मिल सकते हैं। 
  • झारखंड ने भी संशोधन पर गंभीर आपत्ति जताई है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने चेतावनी दी है कि खनिज करों से होने वाले राजस्व के नुकसान का असर लाखों लोगों को लाभ पहुंचाने वाली सामाजिक सुरक्षा योजनाओं पर पड़ सकता है। 
  • हालांकि, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे खनिज-संपन्न राज्यों की ओर से अब तक ऐसी समान चुनौती सामने नहीं आई है। यह अंतर बताता है कि आर्थिक हित समान होने के बावजूद राजनीतिक प्राथमिकताएं राज्यों की प्रतिक्रिया को अलग दिशा दे सकती हैं। 

असममित राजकोषीय संघवाद (Asymmetric fiscal federalism) की चुनौती 

  • यह पूरा विवाद भारत के असममित राजकोषीय संघवाद की एक बड़ी तस्वीर भी सामने लाता है। भारतीय व्यवस्था में केन्द्र के पास अपेक्षाकृत अधिक कराधान शक्तियां हैं, जबकि राज्यों पर शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, पुलिस और सामाजिक कल्याण जैसे कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अधिक व्यय संबंधी जिम्मेदारियां हैं। 
  • इसके अलावा राज्यों के उधार लेने और केन्द्र से मिलने वाले वित्तीय हस्तांतरण पर भी केन्द्र का महत्वपूर्ण प्रभाव रहता है। ऐसे में जब राज्यों के अपने राजस्व स्रोत सीमित होते हैं, तो उनकी वित्तीय स्वायत्तता स्वाभाविक रूप से प्रभावित होती है।

  असममित संघवाद क्या है?

  • असममित संघवाद संवैधानिक व्यवस्थाओं का वर्णन करता है जिसमें संघ की घटक इकाइयों के पास असमान शक्तियां, क्षमताएं या संस्थागत संरचनाएं होती हैं।
  • सममित संघों के विपरीत - जहां सभी उप-राष्ट्रीय इकाइयां समान संवैधानिक स्थिति और विधायी क्षमताएं साझा करती हैं - असममित संघ एक या अधिक क्षेत्रों की विशिष्ट राजनीतिक, सांस्कृतिक, भाषाई या ऐतिहासिक परिस्थितियों को पहचानते हैं और उन्हें विशेष स्वायत्तता प्रदान करके उनका ध्यान रखते हैं। 
  • असममित संघवाद को बहुजातीय या भौगोलिक रूप से भिन्न राज्यों में एकता और विविधता के सामंजस्य की चुनौती के समाधान के रूप में देखा जाता है, जो एकात्मक विकेंद्रीकरण या एकसमान संघीय संरचनाओं की तुलना में अधिक लचीलापन प्रदान करता है। 
  • यही वजह है कि खनिज करों का मुद्दा केवल एक कर विवाद नहीं है। यह इस बड़े सवाल से जुड़ता है कि प्राकृतिक संसाधनों से मिलने वाले राजस्व पर अंतिम नियंत्रण किसका होना चाहिए और संघीय व्यवस्था में राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता की सीमा क्या होनी चाहिए।

संघवाद की नई परीक्षा 

  • जीएसटी मुआवजा, वित्त आयोगों के विचारणीय विषय, राष्ट्रीय शिक्षा नीति, नागरिकता संशोधन अधिनियम और अखिल भारतीय सेवाओं के नियमों में प्रस्तावित बदलाव जैसे मुद्दों पर पहले भी केन्द्र और राज्यों के बीच तनाव सामने आता रहा है।
  • खनिज कानून का विवाद इसी लंबी श्रृंखला की नई कड़ी है। इसमें एक तरफ केन्द्र खनिज क्षेत्र में समान नियमन, कम लागत और राष्ट्रीय हित की बात कर रहा है, तो दूसरी तरफ कई राज्य अपने संवैधानिक अधिकारों और वित्तीय स्वायत्तता की रक्षा को लेकर चिंतित हैं। 
  • आखिरकार, इस विवाद का महत्व केवल खनिज राजस्व तक सीमित नहीं है। यह भारतीय संघवाद के उस मूल प्रश्न को सामने लाता है कि राष्ट्रीय हित और राज्यों की स्वायत्तता के बीच संतुलन कहां और कैसे तय किया जाए। आने वाले समय में संसद और न्यायपालिका की भूमिका इस संतुलन की संवैधानिक सीमाओं को निर्धारित करने में निर्णायक हो सकती है। 
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