देश में सुपर-स्पेशियलिटी चिकित्सा पाठ्यक्रमों में बड़ी संख्या में सीटें खाली रहने की समस्या के बीच केंद्र सरकार ने वर्ष 2025 की राष्ट्रीय पात्रता-सह-प्रवेश परीक्षा-सुपर स्पेशियलिटी यानी नीट-एसएस की न्यूनतम पात्रता कटऑफ 50 प्रतिशत से घटाकर 30 प्रतिशत करने पर सहमति जताई है। सर्वोच्च न्यायालय के सुझाव के बाद यह फैसला लिया गया। इसके बाद मेडिकल काउंसलिंग कमेटी यानी एमसीसी ने 25 सितंबर से बची हुई 1,857 सीटों को भरने के लिए स्ट्रे राउंड शुरू किया है।
इसके अलावा तमिलनाडु में इन-सर्विस डॉक्टरों के लिए आरक्षित 40 खाली सीटों को वापस राज्य को देने पर भी केंद्र ने सहमति जताई है।
नीट-एसएस परीक्षा क्या है?
नीट-एसएस भारत में डीएम, एमसीएच और डीआरएनबी जैसे सुपर-स्पेशियलिटी पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए आयोजित होने वाली प्रमुख प्रवेश परीक्षा है। इसका आयोजन नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन इन मेडिकल साइंसेज यानी एनबीईएमएस करता है। यह केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अधीन एक स्वायत्त संस्था है।
देश में सुपर-स्पेशियलिटी पाठ्यक्रमों के लिए 7,000 से अधिक सीटें उपलब्ध हैं, जबकि हर साल करीब 15,000 उम्मीदवार परीक्षा में शामिल होते हैं।
नीट-एसएस एक ही प्रश्नपत्र वाली परीक्षा नहीं है। इसके अंतर्गत पाठ्यक्रमों को 15 समूहों में बांटा गया है। इनमें जनरल मेडिसिन, जनरल सर्जरी, ऑर्थोपेडिक्स, पीडियाट्रिक्स, ऑब्स्टेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजी, एनेस्थीसियोलॉजी, रेडियोलॉजी, रेस्पिरेटरी मेडिसिन, माइक्रोबायोलॉजी, पैथोलॉजी, साइकियाट्री, फार्माकोलॉजी, ईएनटी, क्रिटिकल केयर और मेडिकल ऑन्कोलॉजी शामिल हैं।
प्रत्येक समूह के लिए अलग प्रश्नपत्र होता है और उसके अनुसार कटऑफ भी अलग हो सकती है।
सीट खाली रहने के कारण
सुपर-स्पेशियलिटी में सभी विषयों की मांग एक जैसी नहीं है। कार्डियोलॉजी, न्यूरोसर्जरी, मेडिकल ऑन्कोलॉजी और गैस्ट्रोएंटरोलॉजी जैसे विषयों में प्रतिस्पर्धा काफी अधिक रहती है। वहीं कुछ अन्य विशेषज्ञताओं में उम्मीदवारों की रुचि अपेक्षाकृत कम होती है।
डॉक्टर्स एसोसिएशन फॉर सोशल इक्वैलिटी के महासचिव डॉ. रविंद्रनाथ के अनुसार, रोजगार और आय की संभावनाएं उम्मीदवारों की पसंद को प्रभावित करती हैं। डॉक्टर ऐसी विशेषज्ञताओं को प्राथमिकता देते हैं, जिनमें भविष्य में बेहतर प्रैक्टिस और कमाई के अवसर मिल सकें। पसंदीदा सीट नहीं मिलने पर कई उम्मीदवार अगले वर्ष दोबारा परीक्षा देने का विकल्प चुनते हैं।
निजी मेडिकल कॉलेजों की अधिक फीस और प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रवेश की प्राथमिकता भी सीटें खाली रहने का कारण है।
2023 से जारी है सीटों का संकट
नीट-एसएस की खाली सीटों का मामला नया नहीं है। वर्ष 2023 में 1,003 सीटें खाली रहने के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र से इसका समाधान खोजने को कहा था। अदालत ने इन खाली सीटों को “संसाधनों की बर्बादी” बताया था।
इसके बाद एमसीसी ने शून्य पर्सेंटाइल वाले उम्मीदवारों को भी उपलब्ध सीटों पर प्रवेश लेने की अनुमति दी थी। इसके बावजूद कई सीटें खाली रह गईं। वर्ष 2024 में भी दो दौर की काउंसलिंग के बाद करीब 600 सीटें रिक्त थीं और बाद में मॉप-अप राउंड आयोजित किया गया।
तमिलनाडु के इन-सर्विस डॉक्टरों का मामला
तमिलनाडु में जी.ओ. एमएस नंबर 462 के तहत राज्य के मेडिकल कॉलेजों में नीट-एसएस की 50 प्रतिशत सीटें इन-सर्विस डॉक्टरों के लिए आरक्षित हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने 2022 में इस व्यवस्था को बरकरार रखा था।
वर्ष 2025 में राज्य ने इन-सर्विस डॉक्टरों के लिए 219 सीटें आरक्षित की थीं, लेकिन इनमें केवल 68 सीटें भर पाईं। 111 से अधिक उम्मीदवार प्रतीक्षा सूची में रह गए।
तमिलनाडु मेडिकल ऑफिसर्स एसोसिएशन ने इन-सर्विस डॉक्टरों के लिए आरक्षित 152 सीटों को ऑल इंडिया कोटा में स्थानांतरित किए जाने का विरोध किया। इसके बाद केंद्र ने 40 खाली सीटें राज्य को वापस देने पर सहमति जताई।
क्या 30 प्रतिशत कटऑफ पर्याप्त है?
कटऑफ घटने से अधिक उम्मीदवार काउंसलिंग प्रक्रिया में शामिल हो सकेंगे और कुछ खाली सीटें भरने की संभावना है। लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार, इससे समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होगी।
उत्तर प्रदेश, बिहार और पूर्वोत्तर राज्यों में सरकारी सुपर-स्पेशियलिटी सीटों की कमी, विशेषज्ञ डॉक्टरों के लिए सीमित रोजगार और पदोन्नति के अवसर, सरकारी अस्पतालों में नए विभागों की कमी, कम स्टाइपेंड और अधिक कार्यभार भी महत्वपूर्ण कारण हैं।
आगे की दिशा
नीट-एसएस की खाली सीटों का समाधान केवल कटऑफ कम करने तक सीमित नहीं होना चाहिए। सरकारी संस्थानों में सुपर-स्पेशियलिटी सीटों का विस्तार, नए विभागों की स्थापना और विशेषज्ञ डॉक्टरों के लिए बेहतर रोजगार अवसर उपलब्ध कराना भी जरूरी होगा। 30 प्रतिशत कटऑफ तत्काल राहत दे सकती है, लेकिन स्थायी समाधान के लिए चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था में व्यापक सुधार की आवश्यकता बनी रहेगी।
यदि सरकार सुपर-स्पेशियलिटी चिकित्सा शिक्षा को मजबूत करने के साथ सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों के लिए पर्याप्त पद और बेहतर करियर अवसर उपलब्ध कराती है, तो इसका लाभ न केवल मेडिकल छात्रों और डॉक्टरों को मिलेगा, बल्कि देश की स्वास्थ्य व्यवस्था को भी मिलेगा।