स्विफ्ट के विकल्पों की तलाश: ब्रिक्स से सीबीडीसी तक बदल रही वैश्विक भुगतान व्यवस्था
संदर्भ
वैश्विक व्यापार और वित्तीय व्यवस्था में सीमा-पार भुगतान को लेकर एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग लेन-देन में प्रमुख भूमिका निभाने वाली स्विफ्ट व्यवस्था के विकल्प के रूप में कई देश वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों, राष्ट्रीय मुद्राओं और केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्राओं यानी सीबीडीसी पर काम कर रहे हैं।
हाल ही में नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से जारी नई दिल्ली घोषणा में सदस्य देशों के बीच व्यापार और राष्ट्रीय मुद्राओं में भुगतान बढ़ाने का संकल्प लिया गया। सम्मेलन से पहले ऐसी खबरें सामने आई थीं कि भारत ब्रिक्स देशों के बीच सीमा-पार भुगतान के लिए सीबीडीसी को आपस में जोड़ने का प्रस्ताव रख सकता है। हालांकि, यह प्रस्ताव अंतिम घोषणा-पत्र का हिस्सा नहीं बना। फिर भी, इस चर्चा ने यह सवाल जरूर सामने ला दिया है कि क्या भविष्य में अंतरराष्ट्रीय भुगतान के लिए स्विफ्ट के अलावा कोई मजबूत और व्यापक वैकल्पिक व्यवस्था विकसित हो सकती है?
स्विफ्ट की जगह विकल्पों की जरूरत क्यों महसूस हो रही है?
स्विफ्ट यानी सोसाइटी फॉर वर्ल्डवाइड इंटरबैंक फाइनेंशियल टेलीकम्युनिकेशन बेल्जियम स्थित एक वैश्विक संदेश प्रणाली है, जिसके माध्यम से बैंक अंतरराष्ट्रीय भुगतान से जुड़े संदेशों का आदान-प्रदान करते हैं।
हाल के वर्षों में युद्धों, आर्थिक प्रतिबंधों और डॉलर आधारित वित्तीय व्यवस्था को लेकर बढ़ती चिंताओं ने कई देशों को वैकल्पिक भुगतान माध्यमों पर विचार करने के लिए प्रेरित किया है। रूस पर लगाए गए पश्चिमी प्रतिबंधों और 2022 में कई रूसी बैंकों के स्विफ्ट से बाहर किए जाने के बाद यह चर्चा और तेज हुई।
इसी संदर्भ में चीन, रूस और अन्य देशों ने अपनी-अपनी वैकल्पिक भुगतान प्रणालियां विकसित की हैं। भारत भी राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार और सीमा-पार भुगतान को लेकर संभावनाएं तलाश रहा है।
प्रोजेक्ट एमब्रिज: डिजिटल मुद्राओं से सीमा-पार भुगतान
प्रोजेक्ट एमब्रिज केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्राओं के जरिए सीमा-पार भुगतान की संभावनाओं पर आधारित एक महत्वपूर्ण पहल रही है। इसमें बैंक ऑफ थाईलैंड, संयुक्त अरब अमीरात के केंद्रीय बैंक, पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना का डिजिटल करेंसी इंस्टीट्यूट, हांगकांग मॉनेटरी अथॉरिटी और सऊदी सेंट्रल बैंक जैसे संस्थान शामिल रहे हैं।
इसका उद्देश्य अलग-अलग देशों की डिजिटल मुद्राओं के बीच सीधे भुगतान और निपटान की सुविधा विकसित करना था। इसके लिए केंद्रीय बैंकों ने एमब्रिज लेजर नामक विशेष ब्लॉकचेन तकनीक विकसित की।
2024 में इस परियोजना ने न्यूनतम व्यवहार्य व्यवस्था का दर्जा हासिल किया। हालांकि, उसी वर्ष 31 अक्टूबर को बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स यानी बीआईएस ने परियोजना से अपनी भागीदारी समाप्त कर दी।
बीआईएस के बाहर निकलने के बाद मीडिया में यह अटकलें सामने आईं कि एमब्रिज भविष्य में प्रतिबंधों से प्रभावित देशों के लिए वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था का आधार बन सकता है। हालांकि, इसके व्यापक इस्तेमाल के सामने तकनीकी, नियामकीय और राजनीतिक चुनौतियां अभी मौजूद हैं।
सीआईपीएस: चीन की वैकल्पिक भुगतान प्रणाली
चीन ने 2015 में क्रॉस-बॉर्डर इंटरबैंक पेमेंट सिस्टम यानी सीआईपीएस शुरू किया। इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय व्यापार में चीनी मुद्रा युआन के इस्तेमाल को बढ़ावा देना और सीमा-पार युआन लेन-देन के लिए चीन में ही क्लियरिंग और निपटान की सुविधा उपलब्ध कराना था।
सीआईपीएस की अंतरराष्ट्रीय पहुंच लगातार बढ़ी है। नवंबर 2025 में प्रकाशित एक विश्लेषण के अनुसार, इसके प्रतिभागी 120 से अधिक देशों में मौजूद थे। इनमें भारत को छोड़कर ब्रिक्स के सभी सदस्य देश शामिल थे।
19 मार्च 2026 की एक रिपोर्ट के अनुसार, सीआईपीएस ने 2025 में प्रतिदिन औसतन 679.8 अरब युआन यानी करीब 98.7 अरब डॉलर के लेन-देन का निपटान किया। हालांकि, यह अमेरिका स्थित क्लियरिंग हाउस इंटरबैंक पेमेंट सिस्टम यानी चिप्स द्वारा प्रतिदिन निपटाए जाने वाले लगभग 1.9 ट्रिलियन डॉलर के भुगतान से काफी कम है।
इसके बावजूद चीन सीआईपीएस को बहु-मुद्रा निपटान और अन्य विदेशी भुगतान प्रणालियों के साथ जोड़ने वाले व्यापक वैश्विक मंच के रूप में विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
रूस का एसपीएफएस और ईरान का सेपाम
रूस ने पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच 2014 में सिस्टम फॉर ट्रांसफर ऑफ फाइनेंशियल मैसेजेज यानी एसपीएफएस विकसित किया था। 2022 में रूसी बैंकों को स्विफ्ट से बाहर किए जाने के बाद इसका महत्व बढ़ा।
रूसी केंद्रीय बैंक के अनुसार, 2023 में 50 नई संस्थाएं एसपीएफएस से जुड़ीं और इसके प्रतिभागियों की कुल संख्या 440 तक पहुंच गई। इनमें 100 से अधिक गैर-रूसी संस्थाएं थीं।
ईरान की सेपाम प्रणाली भी इसी तरह की स्थानीय अंतर-बैंक भुगतान व्यवस्था है। एसपीएफएस और सेपाम के बीच संपर्क स्थापित होने से रूसी और ईरानी वित्तीय संस्थानों के बीच भुगतान संबंधों को सुगम बनाने की क्षमता बनी है।
भारत-रूस भुगतान व्यवस्था का महत्त्व
भारत और रूस ने पश्चिमी वित्तीय प्रतिबंधों के बीच द्विपक्षीय व्यापार के लिए रुपये और रूबल में भुगतान की व्यवस्था विकसित की है। स्बेरबैंक के अधिकारियों के अनुसार, भारत-रूस द्विपक्षीय व्यापार का लगभग 96 प्रतिशत भुगतान इन दोनों राष्ट्रीय मुद्राओं में हो रहा है।
भारत में स्बेरबैंक के प्रमुख इवान नोसोव ने इस व्यवस्था को रूस और भारत के बीच भुगतान के लिए विश्वसनीय और अच्छी तरह स्थापित तंत्र बताया है।
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, फिलहाल 22 रूसी बैंक और 17 भारतीय बैंक दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार से जुड़े भुगतान में सेवाएं दे रहे हैं। रूस का सबसे बड़ा बैंक स्बेरबैंक भी इस भुगतान ढांचे को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
क्या सीबीडीसी बन सकती है अगली बड़ी कड़ी?
सीबीडीसी यानी केंद्रीय बैंक द्वारा जारी डिजिटल मुद्रा को सीमा-पार भुगतान के भविष्य के संभावित माध्यमों में से एक माना जा रहा है। यदि अलग-अलग देशों की सीबीडीसी प्रणालियों को तकनीकी और नियामकीय स्तर पर आपस में जोड़ा जा सके, तो अंतरराष्ट्रीय भुगतान में बिचौलियों की संख्या और भुगतान निपटान में लगने वाला समय कम किया जा सकता है।
हालांकि, इसके लिए देशों के बीच साझा तकनीकी मानक, डेटा सुरक्षा, साइबर सुरक्षा, मुद्रा विनिमय, नियामकीय समन्वय और वित्तीय निगरानी जैसे कई मुद्दों पर सहमति जरूरी होगी। इसके अलावा, दुनिया के अधिकांश देशों में सीबीडीसी का इस्तेमाल अभी शुरुआती या सीमित स्तर पर है।
आगे की राह
स्विफ्ट का विकल्प तैयार करना केवल एक नई भुगतान प्रणाली बनाने का तकनीकी सवाल नहीं है। इसके लिए वैश्विक स्तर पर भरोसा, व्यापक भागीदारी, साझा नियम और मजबूत तकनीकी बुनियादी ढांचे की जरूरत होगी।
राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार, सीआईपीएस और एसपीएफएस जैसी मौजूदा प्रणालियां तथा एमब्रिज जैसी सीबीडीसी आधारित पहल यह संकेत देती हैं कि अंतरराष्ट्रीय भुगतान व्यवस्था में विविधता बढ़ रही है। हालांकि, इन प्रणालियों का पैमाना अभी स्विफ्ट और अन्य स्थापित वैश्विक भुगतान नेटवर्क के बराबर नहीं है।
भारत के लिए चुनौती यह होगी कि वह अपनी भुगतान प्रणालियों की सुरक्षा और दक्षता बनाए रखते हुए प्रमुख व्यापारिक साझेदारों के साथ ऐसे तंत्र विकसित करे, जो कम लागत, तेज निपटान और वित्तीय स्थिरता के साथ सीमा-पार व्यापार को सुगम बना सकें।
इस लिहाज से ब्रिक्स के भीतर राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार और सीबीडीसी को लेकर जारी चर्चा केवल भुगतान का तकनीकी मुद्दा नहीं है। यह वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में उभरते बहुध्रुवीय रुझान की ओर भी संकेत करती है, जहां भविष्य में एक ही भुगतान नेटवर्क पर निर्भरता के बजाय कई परस्पर जुड़े विकल्पों का समानांतर इस्तेमाल देखने को मिल सकता है।