संदर्भ
नेपाल के गोरखा जिले में बूढ़ी गंडकी नदी के किनारे आई आकस्मिक बाढ़ ने हिमालयी क्षेत्रों की आपदा संवेदनशीलता को फिर उजागर किया है। भारी कीचड़, बड़े पत्थरों और मलबे के तेज प्रवाह ने 35 से अधिक घरों और पुलों को बहा दिया। यह घटना बताती है कि पर्वतीय क्षेत्रों में बाढ़ का खतरा केवल भारी बारिश तक सीमित नहीं है, बल्कि भूस्खलन, हिमनदों में बदलाव और नदी मार्गों में अवरोध भी अचानक विनाश का कारण बन सकते हैं। ऐसे में भारत के लिए प्रभावी पूर्व चेतावनी प्रणाली, जोखिम आधारित विकास और सीमा पार सहयोग को मजबूत करना आवश्यक है।
आकस्मिक बाढ़ क्या है?
- आकस्मिक बाढ़ (Flash Flood) वह स्थिति है, जिसमें बहुत कम समय में जलस्तर और जलप्रवाह तेजी से बढ़ जाते हैं। यह सामान्यतः छह घंटे से कम समय में विकसित हो सकती है। अत्यधिक वर्षा, बादल फटना, भूस्खलन से बने अस्थायी बांधों का टूटना और हिमनदीय झीलों से अचानक पानी निकलना इसके प्रमुख कारण हैं।
- पहाड़ी क्षेत्रों में संकरी घाटियों और तीव्र ढाल के कारण पानी तेजी से नीचे की ओर बहता है। जब इसके साथ बड़े पत्थर, मिट्टी और अन्य मलबा भी बहने लगता है, तो नुकसान की तीव्रता कई गुना बढ़ जाती है।
नेपाल में हालिया बाढ़ और संभावित कारण
- 11 अक्टूबर को नेपाल के गोरखा जिले के चुमनबुरी गांव में बूढ़ी गंडकी नदी के किनारे आकस्मिक बाढ़ आई। भारी वर्षा के अभाव में नदी में अचानक जलप्रवाह बढ़ने की संभावित वजह ऊपरी क्षेत्र में भूस्खलन से बना अस्थायी बांध टूटना या चेकााम्पार और सिउरिबास के आसपास हिमस्खलन के कारण नदी का मार्ग अवरुद्ध होना हो सकती है।
- हालांकि, सटीक कारण की पुष्टि के लिए वैज्ञानिक जांच आवश्यक है। यह घटना दर्शाती है कि पर्वतीय क्षेत्रों में मौसम सामान्य दिखाई देने पर भी अचानक बाढ़ का खतरा बना रह सकता है।
भारत के हिमालयी क्षेत्र की आकस्मिक बाढ़ के प्रति संवेदनशीलता भारत का हिमालयी क्षेत्र भूगर्भीय, जलवायवीय और मानवीय कारणों से आकस्मिक बाढ़ के प्रति संवेदनशील है।
- युवा और विवर्तनिक रूप से सक्रिय पर्वत: हिमालय की चट्टानें कई स्थानों पर दरारयुक्त हैं और यहां तीव्र ढाल तथा भूकंपीय गतिविधियां भूस्खलन का जोखिम बढ़ाती हैं। वर्ष 2021 की चमोली आपदा में ऋषिगंगा घाटी में चट्टान और बर्फ का विशाल हिस्सा टूटने से विनाशकारी बाढ़ आई तथा जलविद्युत परियोजनाओं को नुकसान पहुंचा।
- हिमनदीय झीलों का विस्फोट: हिमनदों के विस्तार में कमी नाज़ुक हिमनद-जलोढ़ बाँध से अवरुद्ध झीलें बन सकती हैं। इनके प्राकृतिक अवरोध टूटने पर हिमनदीय झील विस्फोट बाढ़ (GLOF) आती है। वर्ष 2023 में सिक्किम की दक्षिण ल्होनक झील के फटने से तीस्ता नदी बेसिन में विनाशकारी बाढ़ आई और चुंगथांग बांध क्षतिग्रस्त हुआ।
- बादल फटना और अत्यधिक वर्षा: पर्वतीय ढालों से टकराकर ऊपर उठने वाली नम हवाएं सीमित क्षेत्र में बहुत अधिक वर्षा कर सकती हैं। वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा ने दिखाया कि अत्यधिक वर्षा और मलबे का प्रवाह किस प्रकार बस्तियों और तीर्थस्थलों को तबाह कर सकता है।
- नदी क्षेत्रों में अनियोजित निर्माण: सक्रिय नदी तल और बाढ़ मैदानों में सड़कें, होटल, व्यावसायिक प्रतिष्ठान तथा बस्तियां बनाने से जोखिम बढ़ता है। वर्ष 2023 में हिमाचल प्रदेश के ब्यास नदी बेसिन में आई बाढ़ ने नदी किनारे स्थित बुनियादी ढांचे को व्यापक नुकसान पहुंचाया।
आकस्मिक बाढ़ के प्रमुख कारण
आकस्मिक बाढ़ के पीछे कई परस्पर जुड़े प्राकृतिक कारण काम करते हैं।
- भूस्खलन से बने अस्थायी बांध का टूटना: मलबे से नदी का मार्ग अवरुद्ध होने पर पानी जमा हो जाता है। दबाव बढ़ने से अवरोध टूट सकता है और अचानक तेज जलप्रवाह उत्पन्न हो सकता है।
- तापमान में वृद्धि: पर्माफ्रॉस्ट और चट्टानों के बीच मौजूद बर्फ पिघलने से पर्वतीय ढालों की स्थिरता कमजोर हो सकती है। इससे चट्टानें खिसकने और भूस्खलन की आशंका बढ़ती है।
- मलबे का तीव्र प्रवाह: हिमनदीय निक्षेप, बजरी और बड़े पत्थर पानी के साथ बहकर विनाशकारी मलबा प्रवाह बनाते हैं। यह पुलों, सड़कों और इमारतों को भारी नुकसान पहुंचा सकता है।
- अत्यधिक वर्षा: छोटे जलग्रहण क्षेत्रों में कम समय के दौरान तेज वर्षा से नदी-नालों का जलस्तर अचानक बढ़ जाता है। वर्ष 2010 में लेह में बादल फटने से आई बाढ़ इसका प्रमुख उदाहरण है।
आकस्मिक बाढ़ के प्रमुख प्रभाव
आकस्मिक बाढ़ केवल तत्काल जन-धन की हानि तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इसके दीर्घकालिक सामाजिक और आर्थिक परिणाम भी होते हैं।
- बुनियादी ढांचे को नुकसान: तेज जलप्रवाह से पुल, सुरंगें, सड़कें और जलविद्युत परियोजनाएं क्षतिग्रस्त हो सकती हैं। इससे परिवहन और ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होती है।
- नदी तल में गाद का जमाव: बाढ़ के साथ बहकर आया मलबा और तलछट नदी तल को ऊंचा कर सकता है, जिससे निचले मैदानी क्षेत्रों में भविष्य में बाढ़ का जोखिम बढ़ सकता है। कोसी और गंडक नदी प्रणालियों के माध्यम से उत्तर बिहार में गाद का जमाव इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है।
- स्थानीय आजीविका पर असर: खेतों, ग्रामीण सड़कों और झूला पुलों के नष्ट होने से दूरदराज के गांवों का संपर्क कट सकता है। इससे कृषि, पर्यटन और स्थानीय व्यापार प्रभावित होते हैं।
- सीमा पार जोखिम: हिमालयी नदियां कई देशों से होकर बहती हैं। नेपाल या तिब्बत के ऊपरी क्षेत्रों में अचानक जलप्रवाह बढ़ने से भारत के निचले क्षेत्रों को बहुत कम समय में खतरा हो सकता है।
आकस्मिक बाढ़ से निपटने के लिए एनडीएमए के दिशा-निर्देश
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के दिशा-निर्देशों के अनुरूप जोखिम कम करने के लिए निम्नलिखित उपाय महत्वपूर्ण हैं:
- जोखिम मानचित्रण: आकस्मिक बाढ़ और हिमनदीय झील विस्फोट के संभावित क्षेत्रों की पहचान कर नियमित रूप से जोखिम मानचित्र अपडेट किए जाएं। सिंथेटिक अपर्चर रडार (SAR) जैसी तकनीकों से जलभराव और झीलों में बदलाव की निगरानी की जा सकती है।
- अस्थिर झीलों का सुरक्षित प्रबंधन: जोखिमपूर्ण झीलों का जलस्तर नियंत्रित करने के लिए वैज्ञानिक आकलन के आधार पर साइफन, पंपिंग और जल निकासी नालियों जैसे उपाय अपनाए जा सकते हैं।
- बाढ़ मैदानों में निर्माण पर नियंत्रण: सक्रिय नदी तल और तेज जलप्रवाह वाले क्षेत्रों में आवासीय तथा व्यावसायिक निर्माण को नियंत्रित किया जाए। भूमि उपयोग संबंधी नियमों का सख्ती से पालन कराया जाए।
- पूर्व चेतावनी प्रणाली: डॉप्लर मौसम रडार, नदी जलस्तर सेंसर और स्वचालित अलार्म नेटवर्क को उपग्रह संचार से जोड़कर प्रभावित समुदायों तक समय पर चेतावनी पहुंचाई जाए।
आगे की राह
- हिमालय में आकस्मिक बाढ़ के बढ़ते जोखिम से निपटने के लिए भारत, नेपाल और भूटान के बीच वास्तविक समय में जल-मौसम संबंधी आंकड़ों का आदान-प्रदान मजबूत करना चाहिए। दूरस्थ घाटियों में जमीनी सेंसर और स्वचालित मौसम केंद्र स्थापित करने से निगरानी में सुधार हो सकता है।
- इसके साथ ही, पुलों, सुरंगों और जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण में जलवायु एवं भूवैज्ञानिक जोखिमों को ध्यान में रखना आवश्यक है। स्थानीय समुदायों और आपदा मित्र स्वयंसेवकों को त्वरित निकासी, सुरक्षित आश्रय और आपातकालीन संचार का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
- नेपाल के गोरखा क्षेत्र की आकस्मिक बाढ़ हिमालयी नदी बेसिनों की संवेदनशीलता और पर्वतीय आपदाओं की अप्रत्याशित प्रकृति को उजागर करती है। बढ़ते तापमान, अस्थिर ढालों और अनियोजित निर्माण के कारण जोखिम और गंभीर हो सकता है।
- इसलिए आपदा के बाद राहत एवं बचाव के साथ-साथ पूर्व तैयारी, वैज्ञानिक निगरानी, बाढ़ मैदानों का नियमन और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को प्राथमिकता देना जरूरी है। एक प्रभावी पूर्व चेतावनी प्रणाली और जोखिम-संवेदनशील बुनियादी ढांचा ही हिमालयी क्षेत्रों में जनजीवन, आजीविका और रणनीतिक परिसंपत्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।