संदर्भ
भारत में खाद्य उत्पादन लगातार बढ़ रहा है, लेकिन खेत से लेकर उपभोक्ता की थाली तक पहुंचने के दौरान बड़ी मात्रा में भोजन बर्बाद भी हो जाता है। 29 सितंबर को मनाए जाने वाले खाद्य हानि और अपशिष्ट के प्रति जागरूकता के अंतरराष्ट्रीय दिवस के अवसर पर खाद्य और कृषि संगठन यानी एफएओ के आकलन ने भारत के सामने मौजूद इसी चुनौती को रेखांकित किया है। देश के लिए अब केवल अधिक खाद्य उत्पादन करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि जो भोजन पहले से उत्पादित हो रहा है, उसे सुरक्षित तरीके से उपभोक्ताओं तक पहुंचाना भी उतना ही जरूरी है।
खाद्य हानि और खाद्य अपशिष्ट में अंतर
- खाद्य हानि और खाद्य अपशिष्ट को अक्सर एक ही अर्थ में प्रयोग किया जाता है, लेकिन दोनों में अंतर है। खाद्य हानि मुख्य रूप से आपूर्ति श्रृंखला के शुरुआती चरण में होती है। फसल की कटाई के बाद उचित रखरखाव की कमी, खराब भंडारण, नमी, प्रसंस्करण, परिवहन और थोक वितरण के दौरान भोजन खराब होना इसका हिस्सा है।
- इसके विपरीत, खाद्य अपशिष्ट आपूर्ति श्रृंखला के अंतिम चरण में होता है। खुदरा दुकानों, सुपरमार्केट, होटल, रेस्तरां, खानपान सेवाओं और घरों में खाने योग्य भोजन का फेंक दिया जाना खाद्य अपशिष्ट की श्रेणी में आता है।
- भारत के लिए दोनों समस्याओं का समाधान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे एक साथ खाद्य सुरक्षा, पर्यावरण और अर्थव्यवस्था को लाभ पहुंच सकता है।
खाद्य हानि न्यूनता के लाभ
- सबसे पहला लाभ खाद्य सुरक्षा और पोषण के क्षेत्र में होगा। भारत की करीब 1.4 अरब आबादी के लिए उपलब्ध भोजन को बर्बाद होने से बचाकर कैलोरी और सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाई जा सकती है। इससे केवल अधिक उत्पादन पर निर्भरता कम होगी।
- दूसरा फायदा पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन से मुकाबले में मिलेगा। किसी खाद्य पदार्थ के उत्पादन में पानी, जमीन, उर्वरक और ऊर्जा का इस्तेमाल होता है। जब वही भोजन बर्बाद होता है तो इन सभी संसाधनों का भी अप्रत्यक्ष रूप से नुकसान होता है। जैविक कचरे के सड़ने से मीथेन जैसी ग्रीनहाउस गैसें भी पैदा होती हैं।
- तीसरा लाभ किसानों और खाद्य कारोबार से जुड़े उद्यमों को मिल सकता है। फसल खराब होने से किसानों को होने वाला आर्थिक नुकसान कम होगा और खाद्य कचरे से जैविक खाद, बायोगैस और जैव-सीएनजी जैसे उत्पाद तैयार करके अतिरिक्त आर्थिक मूल्य पैदा किया जा सकता है।
खाद्य हानि के आंकड़ों में भारत
- भारत ने कटाई के बाद होने वाली खाद्य हानि के आंकड़े जुटाने के क्षेत्र में महत्वपूर्ण काम किया है। खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय यानी एमओएफपीआई के माध्यम से देश में तीन व्यापक राष्ट्रीय सर्वेक्षण किए जा चुके हैं।
- पहला सर्वेक्षण 2005-07 में 45 कृषि जिंसों पर किया गया था।
- दूसरा 2012-14 में 45 जिंसों को लेकर हुआ।
- तीसरे सर्वेक्षण में 2020-22 के दौरान खेत से खुदरा स्तर तक 54 जिंसों को शामिल किया गया।
- खाद्य हानि के आंकड़ों को अपडेट करने के लिए चौथा सर्वेक्षण भी जारी है।
- यह व्यवस्था संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य यानी एसडीजी 12.3 और एफएओ के फूड लॉस इंडेक्स के तहत भारत की रिपोर्टिंग को मजबूत आधार देती है।
- हालांकि, समस्या का दूसरा हिस्सा यानी खुदरा बाजार, होटल-रेस्तरां और घरेलू स्तर पर होने वाले खाद्य अपशिष्ट का व्यवस्थित आंकड़ा अभी पर्याप्त रूप से उपलब्ध नहीं है।
मंडियों से निकलने वाला कचरा बड़ी चुनौती
- खाद्य हानि का एक बड़ा केंद्र देश की कृषि मंडियां भी हैं। एफएओ और नेशनल काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चर मार्केटिंग बोर्ड्स यानी कॉसाम्ब के आकलन के अनुसार, बड़ी थोक कृषि मंडियां प्रतिदिन 100 टन तक जैविक कचरा पैदा कर सकती हैं।
- देशभर में थोक कृषि बाजारों से हर साल करीब 35 लाख टन जैविक कचरा निकलने का अनुमान है। कई महानगरों में मंडियों से निकलने वाला कृषि अपशिष्ट नगर निकायों के लैंडफिल में पहुंचने वाले कुल जैविक कचरे का करीब 20 प्रतिशत तक हो सकता है।
- यदि इस कचरे को जैव-ऊर्जा और अन्य उपयोगी उत्पादों में बदला जाए तो हर साल करीब 33 लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य उत्सर्जन की भरपाई की जा सकती है। इससे लगभग 3 करोड़ डॉलर सालाना की कार्बन क्रेडिट क्षमता भी पैदा हो सकती है।
गुजरात का सूरत मॉडल एक उदाहरण
- गुजरात के सूरत में सार्वजनिक-निजी भागीदारी के तहत प्रतिदिन 50 टन क्षमता वाला बायो-सीएनजी संयंत्र संचालित हो रहा है। यहां बाजारों से निकलने वाले जैविक कचरे को स्वच्छ ईंधन और जैव उर्वरक में बदला जाता है। इससे हर साल करीब 7,500 टन मीथेन उत्सर्जन कम करने में मदद मिलती है।
- ऐसे मॉडल को अन्य बड़े और मध्यम कृषि बाजारों में लागू किया जा सकता है।
कोल्ड-चेन और वित्तीय सहायता की आवश्यकता
- भारत में खाद्य हानि का एक प्रमुख कारण पर्याप्त कोल्ड-चेन अवसंरचना का अभाव है। खेतों के पास पैक-हाउस, प्री-कूलिंग सुविधाओं, रेफ्रिजरेटेड परिवहन और नियंत्रित वातावरण वाले भंडारण की कमी के कारण जल्दी खराब होने वाली फसलें बाजार तक पहुंचने से पहले ही खराब हो सकती हैं।
- छोटे किसानों और किसान उत्पादक संगठनों के लिए आधुनिक भंडारण और पोस्ट-हार्वेस्ट तकनीकों में निवेश करना महंगा है। ऐसे में रियायती वित्त और पूंजीगत सहायता की जरूरत है।
- एफएओ और भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक यानी सिडबी के बीच सहयोग इसी दिशा में महत्वपूर्ण है। इसके जरिए एमएसएमई, किसान उत्पादक संगठन और कृषि उत्पाद एकत्र करने वाली संस्थाओं को सौर या हाइब्रिड कोल्ड रूम, प्री-कूलर, नमी नियंत्रण वाली सुखाने की तकनीक और डिजिटल ट्रेसबिलिटी जैसी सुविधाओं में निवेश के लिए वित्त उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है।
शहरी खाद्य अपशिष्ट पर भी ध्यान जरूरी
- भारत में खाद्य अपशिष्ट की समस्या केवल किसानों और मंडियों तक सीमित नहीं है। शहरों में होटल, रेस्तरां, खुदरा बाजार, संस्थागत कैंटीन और घर भी खाद्य अपशिष्ट के बड़े स्रोत हैं।
- ऐसे में खाद्य अपशिष्ट को अलग-अलग एकत्र करने, खाने योग्य भोजन को जरूरतमंदों तक पहुंचाने और बाकी जैविक कचरे को खाद या जैव-ऊर्जा में बदलने की व्यवस्था विकसित करनी होगी। नगर निकायों में नियमित खाद्य अपशिष्ट ऑडिट से यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि सबसे अधिक अपशिष्ट कहां और किस स्तर पर पैदा हो रहा है।
आगे की राह
- भारत को गांव स्तर के संग्रह केंद्रों पर छंटाई, ग्रेडिंग और प्री-कूलिंग जैसी सुविधाएं बढ़ानी होंगी। प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना यानी पीएमकेएसवाई और कृषि अवसंरचना कोष यानी एआईएफ जैसी योजनाओं के माध्यम से ऐसी सुविधाओं में निवेश को बढ़ावा दिया जा सकता है।
- मंडियों में सूरत जैसे बायो-सीएनजी मॉडल को गोबरधन जैसी योजनाओं के साथ जोड़ा जा सकता है। वहीं, खुदरा कंपनियों, होटल-रेस्तरां और संस्थागत खानपान सेवाओं को पंजीकृत फूड बैंक और सामाजिक संगठनों के साथ जोड़कर खाने योग्य भोजन के पुनर्वितरण को बढ़ावा दिया जा सकता है।
- साथ ही, खाद्य हानि में कमी को भारत की जलवायु नीति और राष्ट्रीय स्तर पर तय जलवायु लक्ष्यों से भी जोड़ा जा सकता है।
निष्कर्ष
- भारत के पास खाद्य हानि को मापने और समझने के लिए एक मजबूत आधार मौजूद है, लेकिन अब इस जानकारी को ठोस कार्रवाई में बदलने की जरूरत है। खेत से लेकर मंडी, बाजार और घर तक खाद्य आपूर्ति श्रृंखला के हर चरण में नुकसान को कम करना होगा।
- सस्ती कोल्ड-चेन, बेहतर भंडारण, मंडी स्तर पर जैविक कचरे का उपयोग, शहरी खाद्य पुनर्वितरण और छोटे किसानों के लिए वित्तीय सहायता इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं। खाद्य हानि और अपशिष्ट को केवल कचरा प्रबंधन की समस्या मानने के बजाय इसे खाद्य सुरक्षा, किसान आय, पर्यावरण संरक्षण और जलवायु नीति से जोड़कर देखना होगा। यही दृष्टिकोण भारत को कम संसाधनों में अधिक खाद्य सुरक्षा हासिल करने और एक अधिक टिकाऊ खाद्य व्यवस्था बनाने में मदद कर सकता है।