स्टारलिंक से सैन्य उपकरणों तक: विदेशी कंपनियों पर भारत की निर्भरता
संदर्भ
भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था, उपग्रह संचार, क्लाउड कंप्यूटिंग और रक्षा क्षेत्र में विदेशी कंपनियों पर बढ़ती निर्भरता राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता के लिए चुनौती बन सकती है। अमेरिकी उद्योगपति एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स के स्टारशील्ड नेटवर्क को लेकर द वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार, यूक्रेन के रूसी तेल बुनियादी ढाँचे पर हमलों के जवाब में कथित तौर पर इसकी सेवाएँ सीमित की गईं। वर्ष 2022 में भी ऐसा विवाद सामने आया था, हालाँकि स्पेसएक्स ने मीडिया रिपोर्टों का खंडन किया था।
यह घटनाक्रम भारत के लिए भी चिंता का विषय है, क्योंकि उसकी कई महत्वपूर्ण सेवाएँ विदेशी तकनीक और नेटवर्क पर निर्भर हैं। ऐसे में विदेशी कंपनियों के फैसले, सरकारी प्रतिबंध और तकनीकी गड़बड़ियाँ देश की महत्वपूर्ण सेवाओं को प्रभावित कर सकती हैं।
उपग्रह संचार: भारतीय स्वामित्व, लेकिन सीमित नियंत्रण
भारत सरकार ने उपग्रह संचार सेवाओं के लिए तीन कंपनियों को लाइसेंस दिया है - स्टारलिंक, यूटेलसैट वनवेब की भारतीय इकाई और जियो सैटेलाइट कम्युनिकेशंस। हालाँकि, संबंधित रिपोर्ट के अनुसार, 16 अक्टूबर तक किसी को भी व्यावसायिक उपग्रह ब्रॉडबैंड सेवाओं के लिए आवश्यक सुरक्षा मंजूरी नहीं मिली थी।
यूटेलसैट वनवेब में फ्रांस सरकार की 29.65 प्रतिशत, ब्रिटेन सरकार की 10.89 प्रतिशत और भारती स्पेस की 17.88 प्रतिशत हिस्सेदारी है। इसके अतिरिक्त, भारती एयरटेल की वनवेब की भारतीय इकाई में 26 प्रतिशत हिस्सेदारी है।
वहीं, जियो प्लेटफॉर्म्स और लक्ज़मबर्ग की कंपनी एसईएस ने 2022 में संयुक्त उद्यम बनाया था, जिसमें जियो की 51 प्रतिशत हिस्सेदारी है। इसके बावजूद, एसईएस के उपग्रहों और नेटवर्क पर पूर्ण नियंत्रण जियो के पास नहीं है।
फिलहाल भारत का अधिकांश टेलीफोन और इंटरनेट यातायात स्थलीय नेटवर्क से संचालित होता है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने 1981 से लगभग दो दर्जन संचार उपग्रह प्रक्षेपित किए हैं, जबकि देश के पास सैन्य संचार के लिए भी समर्पित उपग्रह क्षमताएँ हैं। इसलिए विदेशी उपग्रह सेवाओं पर निर्भरता सीमित होने के बावजूद, रणनीतिक क्षेत्रों में तकनीकी आत्मनिर्भरता आवश्यक है।
नाविक की कमजोरी और उपग्रह नेविगेशन का जोखिम
उपग्रह नेविगेशन में भारत की स्थिति अधिक चिंताजनक है। देश की ‘नेविगेशन विद इंडियन कॉन्स्टेलेशन’ (नाविक) प्रणाली को भारतीय उपमहाद्वीप में अमेरिकी जीपीएस की तरह स्थान निर्धारण, नेविगेशन और समय संबंधी सेवाएँ देने के लिए विकसित किया गया था।
29 जुलाई को अंतरिक्ष विभाग के राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने संसद में बताया था कि नाविक के केवल तीन उपग्रह स्थिति निर्धारण, नेविगेशन और समय (पीएनटी) संबंधी संकेत देने में सक्षम हैं। स्वतंत्र स्थिति निर्धारण सेवाओं के लिए कम-से-कम चार उपग्रहों की आवश्यकता होती है।
अमेरिका ने वर्ष 2000 में नागरिक जीपीएस संकेतों की सटीकता जानबूझकर घटाने की नीति समाप्त कर दी थी। फिर भी, वह सैन्य उद्देश्यों के लिए विशिष्ट क्षेत्रों में इन सेवाओं को बाधित करने की क्षमता रखता है। भारत के नाविक की कमजोर स्थिति के पीछे इसरो की प्रक्षेपण दर बढ़ाने में आने वाली चुनौतियाँ भी एक कारण हैं।
क्लाउड कंप्यूटिंग: डेटा भारत में जबकि नियंत्रण विदेश में
अमेज़न वेब सर्विसेज (एडब्ल्यूएस), माइक्रोसॉफ्ट एज्योर और गूगल क्लाउड भारत के हजारों कारोबारों और सरकारी संस्थानों को क्लाउड कंप्यूटिंग यानी इंटरनेट आधारित आँकड़ा-संग्रहण और प्रसंस्करण सेवाएँ प्रदान करते हैं। गार्टनर के अनुमान के अनुसार, 2026 में भारत का क्लाउड सेवाओं पर खर्च 17.5 अरब डॉलर तक पहुँच सकता है।
सरकार का अपना क्लाउड मंच मेघराज भी है, जिसका संचालन राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (एनआईसी) करता है। दिसंबर 2025 में सरकार ने बताया था कि 2,170 मंत्रालय और विभाग इस मंच पर अपने अनुप्रयोग संचालित कर रहे थे। इसके बावजूद, सरकारी विभाग सूचीबद्ध निजी क्लाउड सेवा प्रदाताओं पर भी निर्भर हैं।
फरवरी में एडब्ल्यूएस और भारतीय कंपनी योट्टा ने मेघराज 2.0 के लिए एडब्ल्यूएस आउटपोस्ट्स तकनीक तैनात करने की घोषणा की। इससे एडब्ल्यूएस द्वारा प्रबंधित क्लाउड सेवाएँ एनआईसी के आँकड़ा केंद्रों में संचालित हो सकेंगी और डेटा भारत में ही रखा जा सकेगा। लेकिन एडब्ल्यूएस के दस्तावेजों के मुताबिक, आउटपोस्ट्स को निगरानी और सॉफ्टवेयर अपडेट के लिए एडब्ल्यूएस के क्षेत्रीय नियंत्रण तंत्र से जुड़ना पड़ता है। यानी डेटा देश में होने के बावजूद प्रबंधन व्यवस्था पर विदेशी कंपनी का नियंत्रण बना रह सकता है।
इसी संदर्भ में मुक्त स्रोत यानी ओपन-सोर्स सॉफ्टवेयर का महत्व बढ़ जाता है। केंद्र सरकार की 2015 की नीति में ई-गवर्नेंस के लिए इसे प्राथमिकता दी गई थी। उन्नत कंप्यूटिंग विकास केंद्र (सी-डैक) ने लिनक्स आधारित ‘भारत ऑपरेटिंग सिस्टम सॉल्यूशंस’ (बीओएसएस) भी विकसित किया है।
वर्ष 2024 में अमेरिकी साइबर सुरक्षा कंपनी क्राउडस्ट्राइक के दोषपूर्ण सॉफ्टवेयर अपडेट से दुनिया भर में विंडोज कंप्यूटर प्रभावित हुए थे। भारत में भी विमानन कंपनियों, हवाई अड्डों और वित्तीय संस्थानों का कामकाज बाधित हुआ था। इससे स्पष्ट होता है कि हर व्यवधान के पीछे बदले की भावना नहीं होती, लेकिन उसका प्रभाव फिर भी गंभीर हो सकता है।
डिजिटल भुगतान: यूपीआई की ताकत और सीमाएँ
भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) द्वारा संचालित एकीकृत भुगतान इंटरफेस (यूपीआई) ने भारत को वीज़ा और मास्टरकार्ड पर निर्भरता कम करने में मदद की है। गूगल पे जैसे विदेशी कंपनियों के स्वामित्व वाले अनुप्रयोग इस व्यवस्था के ऊपर काम करते हैं, लेकिन यूपीआई का मूल बुनियादी ढाँचा उनके नियंत्रण में नहीं है।
यदि गूगल पे अपनी सेवाएँ बंद कर दे, तो उपयोगकर्ता फोनपे जैसे दूसरे अनुप्रयोग अपना सकते हैं। हालाँकि, फोनपे में अमेरिकी कंपनी वॉलमार्ट की बहुसंख्यक हिस्सेदारी है, फिर भी वॉलमार्ट का यूपीआई के मूल बुनियादी ढाँचे पर नियंत्रण नहीं है।
इसके बावजूद, भारतीय बैंक अंतर्राष्ट्रीय भुगतान और संवाददाता बैंकिंग नेटवर्क से जुड़े हैं। वर्ष 2022 में यूरोपीय संघ ने कुछ रूसी बैंकों को स्विफ्ट (एसडब्ल्यूआईएफटी) अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संदेश प्रणाली से बाहर कर दिया था, जिससे उनकी अंतर्राष्ट्रीय भुगतान क्षमता प्रभावित हुई। भारत पर भी विदेशी प्रतिबंधों का असर पड़ सकता है। इसलिए यूपीआई जोखिम कम करता है, लेकिन सीमा पार वित्तीय निर्भरता समाप्त नहीं करता।
रक्षा क्षेत्र: विदेशी आपूर्ति पर निर्भरता
1998 के ऑपरेशन शक्ति परमाणु परीक्षणों के बाद अमेरिका ने भारत पर प्रतिबंध लगाए थे। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) के अनुसार, इन प्रतिबंधों के कारण हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) को अप्रैल 1998 में ऑर्डर किए गए 30 एलएचटीईसी टी800 हेलीकॉप्टर इंजनों की आपूर्ति नहीं मिल सकी। इसके बाद एचएएल ने उस व्यवस्था को रद्द कर फ्रांसीसी निर्माता से विकल्प तलाशा।
स्टॉकहोम अंतर्राष्ट्रीय शांति अनुसंधान संस्थान (सिप्री) के मार्च में प्रकाशित विश्लेषण के मुताबिक, 2021 से 2025 के बीच भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा प्रमुख हथियार आयातक था। इस दौरान भारत के हथियार आयात में रूस की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत रही। भारत फ्रांस, इजरायल और अमेरिका से भी बड़े पैमाने पर रक्षा उपकरण खरीदता है।
यहाँ तक कि भारत का स्वदेशी तेजस लड़ाकू विमान कार्यक्रम भी अमेरिकी कंपनी जीई एयरोस्पेस के इंजनों पर निर्भर है। इंजनों की आपूर्ति में देरी से उत्पादन प्रभावित हुआ है और विमानों की आपूर्ति की समय-सीमा आगे बढ़ी है।
निष्कर्ष: आत्मनिर्भरता अब रणनीतिक जरूरत
भारत ने यूपीआई, मेघराज और नाविक जैसी पहलों से घरेलू क्षमताएँ विकसित की हैं, लेकिन कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में विदेशी तकनीक और आपूर्ति पर निर्भरता कायम है। इसका समाधान केवल विदेशी कंपनियों को बाहर करना नहीं, बल्कि घरेलू विकल्प विकसित करना, आपूर्ति के स्रोतों में विविधता लाना, मुक्त स्रोत तकनीक अपनाना और महत्वपूर्ण प्रणालियों पर देश का परिचालन नियंत्रण मजबूत करना है।
रणनीतिक आत्मनिर्भरता का वास्तविक अर्थ यही है कि किसी विदेशी कंपनी या सरकार के फैसले से भारत की आवश्यक सेवाएँ, वित्तीय व्यवस्था और रक्षा तैयारियाँ अचानक प्रभावित न हों।