हार्टबर्न यानी सीने में जलन को अक्सर लोग एसिडिटी समझकर एंटासिड ले लेते हैं। लेकिन हर बार सीने में जलन का कारण ज्यादा एसिड बनना नहीं होता। गैस्ट्रो-ओसोफेगल रिफ्लक्स डिजीज (GERD) एक ऐसी स्थिति है, जिसमें पेट की सामग्री बार-बार भोजन नली यानी इसोफेगस में वापस आने लगती है। लंबे समय तक ऐसा होने पर भोजन नली को नुकसान भी पहुंच सकता है।
भारत में भी जीईआरडी एक आम समस्या है। वर्ष 2021 में भारत में किए गए नौ अध्ययनों और 20,614 लोगों के आंकड़ों के विश्लेषण में जीईआरडी की संयुक्त प्रसार दर 15.6 प्रतिशत पाई गई थी।
गैस्ट्रो-ओसोफेगल रिफ्लक्स डिजीज (GERD) के बारे में
भोजन नली और पेट के बीच मौजूद निचला इसोफेजियल स्फिंक्टर एक वाल्व की तरह काम करता है। इसका सामान्य काम पेट की सामग्री को वापस भोजन नली में जाने से रोकना है। लेकिन जब यह वाल्व अनुचित तरीके से बार-बार ढीला पड़ता है, तो पेट की सामग्री ऊपर की ओर आ सकती है।
हाइटल हर्निया भी इस एंटी-रिफ्लक्स व्यवस्था को कमजोर कर सकता है। इसमें पेट का कुछ हिस्सा डायफ्राम के ऊपर की ओर खिसक जाता है।
इसके अलावा मोटापा, खासकर पेट के आसपास जमा अतिरिक्त चर्बी, पेट के अंदर दबाव बढ़ा सकती है। पेट के देर से खाली होने पर भी पेट के भीतर सामग्री और दबाव बढ़ सकता है, जिससे रिफ्लक्स की संभावना बढ़ती है।
शरीर में रिफ्लक्स से बचाव की प्राकृतिक व्यवस्था भी होती है। लार भोजन नली में वापस आई सामग्री को साफ करने में मदद करती है, जबकि क्षारीय म्यूकस एसिड से होने वाली क्षति को सीमित करता है।
ज्यादा जलन का मतलब हमेशा ज्यादा रिफ्लक्स नहीं
जीईआरडी में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि रिफ्लक्स की मात्रा और लक्षणों की गंभीरता हमेशा एक-दूसरे के अनुरूप नहीं होती।
कुछ लोगों की भोजन नली सामान्य से अधिक संवेदनशील होती है। ऐसे लोगों में सामान्य मात्रा में होने वाला रिफ्लक्स भी तेज जलन या सीने में असहजता पैदा कर सकता है। इसे रिफ्लक्स हाइपरसेंसिटिविटी कहा जाता है।
दूसरी स्थिति फंक्शनल हार्टबर्न है। इसमें व्यक्ति को लगातार या बार-बार जलन महसूस हो सकती है, लेकिन जांच में यह प्रमाण नहीं मिलता कि इसके पीछे रिफ्लक्स जिम्मेदार है।
ऐसी स्थितियों में केवल एसिड कम करने वाली दवाओं की मात्रा बढ़ाते जाना हमेशा समस्या का समाधान नहीं करता। सही कारण की पहचान करना जरूरी होता है।
गैस्ट्रो-ओसोफेगल रिफ्लक्स डिजीज (GERD) की जांच
प्रोटॉन पंप इनहिबिटर (PPI) दवाओं से लक्षणों में सुधार गैस्ट्रो-ओसोफेगल रिफ्लक्स डिजीज की संभावना का संकेत दे सकता है, लेकिन केवल दवा से फायदा होना यह साबित नहीं करता कि रिफ्लक्स ही लक्षणों का कारण है।
यदि उचित उपचार के बावजूद समस्या बनी रहती है, तो डॉक्टर भोजन नली की गतिविधियों और उसकी संवेदनशीलता से जुड़े अन्य विकारों की जांच कर सकते हैं।
कुछ लक्षण ऐसे हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इनमें शामिल हैं:
निगलने में कठिनाई या दर्द
बिना कारण वजन कम होना
रक्तस्राव या खून की उल्टी
लगातार उल्टी
एनीमिया
काला मल
ऐसे मामलों में एंडोस्कोपी की जरूरत पड़ सकती है। इससे ओसोफैजाइटिस, अल्सर, भोजन नली में संकुचन और बैरेट्स इसोफेगस जैसी स्थितियों का पता लगाया जा सकता है।
हालांकि, सामान्य एंडोस्कोपी होने का मतलब यह नहीं है कि रिफ्लक्स की संभावना पूरी तरह समाप्त हो गई। ऐसे मामलों में 24 घंटे की pH-इम्पीडेंस मॉनिटरिंग की जा सकती है। यह जांच रिफ्लक्स की घटनाओं को मापने के साथ यह भी पता लगाने में मदद करती है कि रिफ्लक्स एसिडिक है या गैर-एसिडिक और क्या लक्षणों का संबंध रिफ्लक्स से है।
मैनोमेट्री भोजन नली के अंदर दबाव और उसकी गतिविधियों को मापती है। इससे भोजन नली की मोटिलिटी से जुड़े विकारों का पता लगाया जा सकता है। कुछ मरीजों में एंटी-रिफ्लक्स सर्जरी या अन्य प्रक्रिया से पहले भी इसका इस्तेमाल किया जाता है।
उपचार के विकल्प
जिन मरीजों में जांच के माध्यम से रिफ्लक्स की पुष्टि हो चुकी है और उचित दवा व जीवनशैली में बदलाव के बावजूद लक्षण गंभीर बने रहते हैं, उनमें चुनिंदा मामलों में एंडोस्कोपिक या सर्जिकल उपचार पर विचार किया जा सकता है।
लेप्रोस्कोपिक फंडोप्लीकेशन एक सर्जिकल विकल्प है। इसके अलावा कुछ मरीजों के लिए एंडोस्कोपिक एंटी-रिफ्लक्स प्रक्रियाएं भी उपलब्ध हैं।
हालांकि, उपचार का चुनाव मरीज के लक्षणों, जांच के परिणाम, रिफ्लक्स की प्रकृति और अन्य स्वास्थ्य स्थितियों को ध्यान में रखकर चिकित्सक द्वारा किया जाना चाहिए।
जीवनशैली में बदलाव से कम हो सकते हैं लक्षण
गैस्ट्रो-ओसोफेगल रिफ्लक्स डिजीज के प्रबंधन में जीवनशैली की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। अधिक वजन या मोटापे से ग्रस्त लोगों में वजन कम करने से लक्षणों में सुधार हो सकता है।
रात में होने वाले रिफ्लक्स को कम करने के लिए सोने से करीब तीन घंटे पहले भोजन करना बंद कर देना मददगार हो सकता है।
खाद्य पदार्थों के ट्रिगर हर व्यक्ति में अलग हो सकते हैं। इसलिए बिना जरूरत कई खाद्य पदार्थों को पूरी तरह बंद करने के बजाय यह पहचानना बेहतर है कि कौन-से खाद्य पदार्थ बार-बार लक्षण बढ़ाते हैं।
कुछ लोगों में कॉफी, मसालेदार भोजन, अधिक वसा वाले खाद्य पदार्थ, चॉकलेट, पुदीना और अम्लीय खाद्य पदार्थ हार्टबर्न को बढ़ा सकते हैं।
रात में रिफ्लक्स की समस्या होने पर बिस्तर के सिरहाने वाले हिस्से को ऊंचा करना मददगार हो सकता है। कुछ लोगों को बाईं करवट सोने से भी राहत मिल सकती है।