संदर्भ
- हाल ही में केंद्र सरकार ने देश में नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार और उसके बेहतर ग्रिड एकीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर (Green Energy Corridor—GEC) के तीसरे चरण को मंजूरी दे दी है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 30 सितंबर, 2026 को इस चरण को मंजूरी दी। इसका प्रमुख उद्देश्य वित्त वर्ष 2032-33 तक राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के विद्युत ग्रिड में 135 गीगावाट (GW) तक की नवीकरणीय ऊर्जा को एकीकृत करना है।
- ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर का तीसरा चरण केवल नवीकरणीय ऊर्जा को ग्रिड से जोड़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तहत बिजली पारेषण क्षमता को मजबूत करने और नवीकरणीय ऊर्जा के कर्टेलमेंट की समस्या को कम करने पर भी जोर दिया जाएगा।
क्या है कर्टेलमेंट की समस्या?
- नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन, विशेषकर सौर और पवन ऊर्जा, मौसम और समय के अनुसार बदलता रहता है। कई बार ग्रिड की स्थिरता बनाए रखने के लिए ग्रिड ऑपरेटरों को नवीकरणीय ऊर्जा संयंत्रों से बिजली उत्पादन को सीमित करना पड़ता है। इस प्रक्रिया को कर्टेलमेंट (Curtailment) कहा जाता है।
ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर चरण-3 का कुल परिव्यय
- ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर के तीसरे चरण के लिए ₹1.86 लाख करोड़ से अधिक का कुल परियोजना परिव्यय निर्धारित किया गया है।
- इसमें सबसे बड़ा हिस्सा राज्य के भीतर की पारेषण प्रणाली (Intra-State Transmission System—InSTS) के विकास पर खर्च किया जाएगा। InSTS के लिए लगभग ₹1.36 लाख करोड़ का प्रावधान किया गया है।
- इस पारेषण नेटवर्क के मजबूत होने से नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन वाले क्षेत्रों से बिजली की निकासी और उसे विभिन्न क्षेत्रों तक पहुंचाने की क्षमता में सुधार किया जा सकेगा।
पहली बार बैटरी ऊर्जा भंडारण पर विशेष जोर
- जीईसी के तीसरे चरण की एक महत्वपूर्ण विशेषता बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली (Battery Energy Storage System—BESS) के लिए विशेष प्रावधान है।
- इस चरण में ₹50,000 करोड़ का समर्पित घटक रखा गया है, जिसके माध्यम से 50 GWh की बैटरी ऊर्जा भंडारण क्षमता विकसित करने का लक्ष्य है।
- बैटरी भंडारण प्रणाली नवीकरणीय ऊर्जा की अनियमित प्रकृति को संतुलित करने में मदद कर सकती है। उदाहरण के लिए, सौर ऊर्जा का उत्पादन दिन के समय अधिक होता है, जबकि बिजली की मांग अलग-अलग समय पर बदल सकती है। ऐसे में ऊर्जा भंडारण से अतिरिक्त बिजली को बाद में उपयोग करने में सहायता मिल सकती है।
केंद्रीय वित्तीय सहायता का प्रावधान
योजना के तहत ₹54,082 करोड़ की केंद्रीय वित्तीय सहायता (Central Financial Assistance—CFA) का प्रावधान किया गया है। इसका उद्देश्य राज्य के भीतर की पारेषण लागत को कम करना और बिजली की लागत को नियंत्रित रखने में सहायता करना है।
केंद्रीय वित्तीय सहायता के प्रमुख प्रावधानों में:
- ₹45,005 करोड़ — राज्य के भीतर की पारेषण प्रणाली से संबंधित लागत को कम करने के लिए।
- ₹6,000 करोड़ — बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली के लिए।
इस प्रकार, योजना में पारेषण अवसंरचना और ऊर्जा भंडारण दोनों को एक साथ मजबूत करने पर ध्यान दिया गया है।
ग्रीनफील्ड और ब्राउनफील्ड परियोजनाओं के लिए अलग व्यवस्था
- जीईसी के तीसरे चरण में परियोजनाओं के क्रियान्वयन के लिए अलग-अलग मॉडल अपनाए जाएंगे।
- ग्रीनफील्ड परियोजनाओं, यानी नई पारेषण परियोजनाओं को टैरिफ-आधारित प्रतिस्पर्धी बोली (Tariff-Based Competitive Bidding—TBCB) के माध्यम से लागू किया जाएगा।
- वहीं, मौजूदा पारेषण नेटवर्क के उन्नयन, विस्तार और मजबूती से संबंधित ब्राउनफील्ड परियोजनाओं को लागत-प्लस आधार (Cost-Plus Basis—CPB) मॉडल के तहत क्रियान्वित किया जाएगा।
लंबित परियोजनाओं की निगरानी के लिए संयुक्त समन्वय तंत्र
- सरकार ने जीईसी की परियोजनाओं को समय पर पूरा करने के लिए निगरानी व्यवस्था को भी मजबूत करने का निर्णय लिया है। इसके तहत कैबिनेट सचिव के स्तर पर एक समर्पित संयुक्त समन्वय तंत्र स्थापित किया जाएगा।
- यह तंत्र परियोजनाओं की प्रगति की हर छह महीने में समीक्षा करेगा। इसके दायरे में जीईसी के पहले और दूसरे चरण की लंबित परियोजनाओं को भी शामिल किया जाएगा।
- केंद्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) के सचिव संतोष सारंगी के अनुसार, जीईसी के दूसरे चरण की लंबित परियोजनाओं की भी इस समिति द्वारा निगरानी की जाएगी।
पहले और दूसरे चरण की स्थिति
- जीईसी के पहले चरण के तहत केवल एक परियोजना का काम पूरा होना बाकी है। इसके वित्त वर्ष 2027 के अंत तक पूरा होने की उम्मीद है।
- वहीं, जीईसी के दूसरे चरण को वित्त वर्ष 2028 के अंत तक पूरा किए जाने की उम्मीद है।
- इससे स्पष्ट है कि तीसरे चरण के साथ-साथ सरकार पहले से चल रही परियोजनाओं को पूरा करने और उनके क्रियान्वयन की निगरानी पर भी ध्यान दे रही है।
किन राज्यों को शामिल किया गया है?
- ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर के पिछले चरणों में 10 से अधिक राज्यों को शामिल किया जा चुका है। इनमें आंध्र प्रदेश, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और तमिलनाडु प्रमुख हैं।
- जीईसी के दूसरे चरण में केरल और उत्तर प्रदेश को भी शामिल किया गया।
- इसके अलावा, मिजोरम और बिहार को योजना में शामिल करने के लिए प्राप्त आवेदनों का केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) द्वारा मूल्यांकन किया जा रहा है।
जीईसी चरण-3 का महत्व
- भारत ने नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता बढ़ाने पर लगातार जोर दिया है। ऐसे में केवल नए सौर और पवन ऊर्जा संयंत्र स्थापित करना पर्याप्त नहीं है। उत्पादित बिजली को उपभोक्ता क्षेत्रों तक पहुंचाने के लिए मजबूत पारेषण नेटवर्क और पर्याप्त ऊर्जा भंडारण क्षमता भी आवश्यक है।
- जीईसी के तीसरे चरण में पारेषण अवसंरचना, ऊर्जा भंडारण और केंद्रीय वित्तीय सहायता को एक साथ जोड़ा गया है। 135 गीगावाट तक की नवीकरणीय ऊर्जा को ग्रिड में एकीकृत करने का लक्ष्य इस बात को रेखांकित करता है कि आने वाले वर्षों में भारत के बिजली तंत्र में नवीकरणीय ऊर्जा की भूमिका और बढ़ने वाली है।
निष्कर्ष
- ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर का तीसरा चरण भारत के नवीकरणीय ऊर्जा विस्तार को ग्रिड अवसंरचना के साथ जोड़ने की दिशा में एक व्यापक पहल है। ₹1.86 लाख करोड़ से अधिक के परिव्यय, 135 गीगावाट तक नवीकरणीय ऊर्जा के एकीकरण और 50 GWh बैटरी ऊर्जा भंडारण क्षमता के लक्ष्य के साथ यह चरण पारेषण क्षमता को मजबूत करने और नवीकरणीय ऊर्जा के बेहतर उपयोग की दिशा में काम करेगा।
- इसके साथ ही, लंबित परियोजनाओं की निगरानी के लिए उच्चस्तरीय समन्वय तंत्र और नए राज्यों को शामिल करने की प्रक्रिया जीईसी के विस्तार को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।