भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौता: कॉपीराइट प्रावधानों पर क्यों उठ रहे सवाल
संदर्भ
भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) को लेकर बौद्धिक संपदा अधिकारों से जुड़े प्रावधान चर्चा में हैं। हाल ही में यूरोपीय आयोग ने ईयू के सदस्य देशों से भारत-ईयू एफटीए पर हस्ताक्षर और इसे अंतिम रूप देने की मंजूरी देने का औपचारिक अनुरोध किया है। समझौते के विभिन्न हिस्सों में दोनों पक्षों की प्रतिबद्धताओं का विवरण सामने आने के बाद कॉपीराइट से जुड़े प्रावधानों पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
चिंता मुख्य रूप से इस बात को लेकर है कि प्रस्तावित बौद्धिक संपदा अध्याय के कुछ प्रावधान भारत के मौजूदा कॉपीराइट कानून, 1957 में बदलाव की आवश्यकता पैदा कर सकते हैं। इससे डिजिटल सामग्री, शिक्षा, शोध, सॉफ्टवेयर और इंटरनेट सेवाओं से जुड़े मौजूदा कानूनी अपवाद प्रभावित हो सकते हैं।
डब्ल्यूसीटी को लेकर मुख्य सवाल
भारत का कॉपीराइट कानून विश्व बौद्धिक संपदा संगठन (डब्ल्यूआईपीओ) की कॉपीराइट संधि (डब्ल्यूसीटी) और व्यापार-संबंधी बौद्धिक संपदा अधिकार (ट्रिप्स) समझौते जैसे अंतरराष्ट्रीय प्रावधानों के अनुरूप है। डब्ल्यूसीटी खास तौर पर डिजिटल वातावरण में रचनाकारों और उनकी रचनाओं की सुरक्षा से संबंधित है।
प्रस्तावित एफटीए में दोनों पक्षों की इन अंतरराष्ट्रीय समझौतों के प्रति प्रतिबद्धता का उल्लेख है, लेकिन राष्ट्रीय व्यवहार से जुड़े अनुच्छेद 10.8 में डब्ल्यूसीटी को शामिल नहीं किया गया है। आलोचकों के अनुसार, इससे डिजिटल कॉपीराइट के कुछ मौजूदा अपवादों और सीमाओं को लेकर भारत की कानूनी स्थिति कमजोर हो सकती है।
एफटीए के अनुच्छेद 10.21 में कॉपीराइट अपवादों के लिए एक सीमित ‘थ्री-स्टेप टेस्ट’ का प्रावधान है। यदि भारत के मौजूदा अपवादों को स्पष्ट रूप से सुरक्षित नहीं रखा गया, तो विदेशी अधिकारधारक कुछ डिजिटल उपयोगों को चुनौती दे सकते हैं।
शिक्षा और शोध पर संभावित असर
भारत के कॉपीराइट अधिनियम की धारा 52 के तहत शिक्षा, शोध और तकनीकी गतिविधियों के लिए कई अपवाद मौजूद हैं। इसी तरह धारा 65ए तकनीकी सुरक्षा उपायों से संबंधित है और कुछ परिस्थितियों में डिजिटल सुरक्षा व्यवस्था को दरकिनार करने की अनुमति देती है।
यह प्रावधान छात्रों और शोधकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण हैं। उदाहरण के तौर पर, इंजीनियरिंग छात्र या सुरक्षा शोधकर्ता सॉफ्टवेयर की कार्यप्रणाली का अध्ययन, उसकी जांच या रिवर्स इंजीनियरिंग कर सकते हैं, खासकर जब इसका उद्देश्य अलग-अलग प्रणालियों के बीच संगतता विकसित करना या सुरक्षा खामियों की पहचान करना हो।
लेकिन आधुनिक सॉफ्टवेयर में एन्क्रिप्शन और डिजिटल सुरक्षा उपाय व्यापक रूप से इस्तेमाल होते हैं। यदि डिजिटल लॉक को दरकिनार करने पर कड़े प्रतिबंध लागू होते हैं, तो किसी वैध शैक्षणिक या शोध गतिविधि के लिए ऐसा करने वाला छात्र या शोधकर्ता भी कानूनी जोखिम में आ सकता है।
इसका असर विश्वविद्यालयों की प्रयोगशालाओं, तकनीकी शिक्षा और साइबर सुरक्षा शोध पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
पुस्तकालय और डिजिटल अभिलेखागार भी दायरे में
कॉपीराइट नियमों में बदलाव का प्रभाव सार्वजनिक पुस्तकालयों और डिजिटल अभिलेखागार पर भी पड़ सकता है। आज ऐतिहासिक दस्तावेज, किताबें और शोध सामग्री तेजी से डिजिटल रूप में संरक्षित की जा रही हैं। इनमें से कई सामग्री पर डिजिटल अधिकार प्रबंधन (डीआरएम) लागू होता है।
पुरानी या दुर्लभ सामग्री को संरक्षित करने के लिए पुस्तकालयों को कभी-कभी उसका प्रारूप बदलने या डिजिटल सुरक्षा उपायों को दरकिनार करने की जरूरत पड़ सकती है। यदि ऐसे कार्यों के लिए पर्याप्त कानूनी अपवाद उपलब्ध नहीं रहे, तो डिजिटल विरासत के संरक्षण में मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
उच्च शिक्षा में इलेक्ट्रॉनिक पुस्तकों और शोध सामग्री के बढ़ते इस्तेमाल के बीच भुगतान-दीवार और डीआरएम भी छात्रों और शोधकर्ताओं की सामग्री तक पहुंच को प्रभावित कर सकते हैं।
इंटरनेट सेवा प्रदाताओं के लिए भी चुनौती
प्रस्तावित प्रावधानों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा इंटरनेट सेवा प्रदाताओं (आईएसपी) और डिजिटल मध्यस्थों से संबंधित है। भारत के कॉपीराइट कानून में डेटा के सामान्य प्रवाह के दौरान रैम, सर्वर कैश और अन्य तकनीकी प्रक्रियाओं में बनने वाली कुछ अस्थायी प्रतियों को सुरक्षा प्राप्त है।
ये प्रावधान इंटरनेट के सामान्य संचालन के लिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि डेटा को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने के दौरान अस्थायी प्रतियां बनना तकनीकी प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा है।
एफटीए के अनुच्छेद 10.11 में अस्थायी और स्थायी प्रतियों से जुड़े व्यापक अधिकारों का प्रावधान है। आलोचकों का कहना है कि यदि डब्ल्यूसीटी के तहत उपलब्ध सुरक्षा को पर्याप्त रूप से संरक्षित नहीं किया गया, तो भारतीय इंटरनेट मध्यस्थों और सेवा प्रदाताओं के सामने कानूनी जोखिम बढ़ सकता है।
भारत के लिए संतुलन बनाए रखना जरूरी
भारत-ईयू एफटीए के संदर्भ में मुख्य प्रश्न व्यापारिक संबंधों को आगे बढ़ाने का नहीं, बल्कि कॉपीराइट सुरक्षा और सार्वजनिक हित के बीच संतुलन बनाए रखने का है।
भारत की मौजूदा व्यवस्था में शिक्षा, शोध, तकनीकी विकास, पुस्तकालयों और डिजिटल सेवाओं के लिए महत्वपूर्ण कानूनी अपवाद मौजूद हैं। ये अपवाद छात्रों, शोधकर्ताओं, शिक्षण संस्थानों और डिजिटल सेवाओं के सामान्य कामकाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
इसलिए एफटीए को अंतिम रूप देते समय यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण होगा कि वैध शैक्षणिक, शोध और तकनीकी गतिविधियों के लिए भारत की मौजूदा कानूनी सुविधाएं सुरक्षित रहें। डब्ल्यूसीटी को राष्ट्रीय व्यवहार प्रावधान में शामिल करना और शिक्षा, शोध तथा डिजिटल संरक्षण से जुड़े अपवादों को स्पष्ट रूप से सुरक्षित रखना इस दिशा में महत्वपूर्ण मुद्दे हो सकते हैं।
भारत और यूरोपीय संघ के बीच व्यापारिक संबंधों का विस्तार आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। साथ ही, भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था, शिक्षा और तकनीकी नवाचार के लिए ऐसा कॉपीराइट ढांचा भी जरूरी है जो अधिकारधारकों की सुरक्षा के साथ ज्ञान तक पहुंच और सार्वजनिक हित के बीच संतुलन बनाए रखे।