भारत को व्यापक राष्ट्रीय शहरीकरण नीति (NUP) की आवश्यकता

संदर्भ 

  • भारत में शहरीकरण की रफ्तार तेजी से बढ़ रही है। महानगरों के साथ-साथ छोटे शहरों और उनके आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में भी आबादी, उद्योग, व्यापार और रोजगार के नए केंद्र विकसित हो रहे हैं। लेकिन देश की शहरी व्यवस्था अभी भी काफी हद तक पुराने ग्रामीण-शहरी वर्गीकरण और प्रशासनिक सीमाओं पर आधारित है। इसका परिणाम यह है कि आर्थिक और सामाजिक रूप से शहरी बन चुके अनेक क्षेत्र आज भी ग्रामीण प्रशासन के अधीन हैं। ऐसे में भारत के लिए एक व्यापक राष्ट्रीय शहरीकरण नीति (National Urbanisation Policy-NUP) की आवश्यकता महसूस की जा रही है। 
  • भारत की आगामी जनगणना में 2011 के शहरी वर्गीकरण मानदंडों को बनाए रखने की संभावना ने इस बहस को और महत्वपूर्ण बना दिया है। लगभग 16 वर्षों के अंतराल के बाद होने वाली जनगणना यदि पुराने मानदंडों पर आधारित रही, तो देश में वास्तविक शहरीकरण की तस्वीर पूरी तरह सामने नहीं आ पाएगी। 

राष्ट्रीय शहरीकरण नीति की आवश्यकता  

  • प्रस्तावित राष्ट्रीय शहरीकरण नीति का उद्देश्य तेजी से फैलते शहरी और अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों के नियोजन एवं प्रबंधन के लिए एक एकीकृत ढाँचा तैयार करना है। इसका प्रमुख विचार पारंपरिक ग्रामीण और शहरी वर्गीकरण से आगे बढ़कर कार्यात्मक शहरी क्षेत्रों (Functional Urban Regions) को आधार बनाना है।  
  • वर्तमान व्यवस्था में वैधानिक नगर (Statutory Towns) वे हैं जिन्हें राज्य सरकारें नगरपालिका कानूनों के तहत अधिसूचित करती हैं। वहीं, जनगणना नगर (Census Towns) वे बस्तियां हैं जिनकी आबादी कम-से-कम 5,000, जनसंख्या घनत्व 400 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर और पुरुष मुख्य कार्यशील आबादी में गैर-कृषि रोजगार का हिस्सा कम-से-कम 75 प्रतिशत होता है।  
  • समस्या यह है कि जनगणना नगरों में शहरी विशेषताएं विकसित होने के बावजूद उनका प्रशासन ग्राम पंचायतों के पास रहता है। दूसरी ओर, महानगरों के आसपास तेजी से विकसित हो रहे अर्द्ध-शहरी क्षेत्र (Peri-Urban Areas) नगरपालिका की सीमाओं से बाहर रह जाते हैं। इसलिए अब शहरीकरण को केवल प्रशासनिक दर्जे से नहीं, बल्कि आर्थिक गतिविधियों, रोजगार, आवागमन और बुनियादी सुविधाओं के आधार पर समझने की जरूरत है। 

भारत में शहरीकरण से संबंधित आंकड़े 

  • जनगणना 2011 के अनुसार, भारत में लगभग 8,000 शहरी बस्तियों में 37.7 करोड़ लोग रहते थे। संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के अनुसार, भारत की शहरी आबादी वर्तमान में लगभग 44 प्रतिशत है और 2050 तक यह 72 करोड़ से अधिक हो सकती है।
  • शहरीकरण के वास्तविक विस्तार का एक महत्वपूर्ण संकेत आर्थिक सर्वेक्षण में उद्धृत उपग्रह आधारित आंकड़े भी देते हैं। इनके अनुसार, वर्ष 2015 में ही भारत लगभग 63 प्रतिशत शहरीकृत हो चुका था। यह पारंपरिक जनगणना आधारित वर्गीकरण और वास्तविक शहरी विस्तार के बीच अंतर को दर्शाता है।
  • इसके अलावा, अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों की वार्षिक वृद्धि दर 4.15 प्रतिशत बताई गई है, जबकि मुख्य नगरपालिका क्षेत्रों में यह लगभग 2.9 प्रतिशत है। यानी शहरों का विस्तार अब उनकी प्रशासनिक सीमाओं से कहीं आगे बढ़ रहा है।  
  • शहरी नियोजन की स्थिति भी चिंताजनक है। लगभग 52 प्रतिशत वैधानिक नगरों और 76 प्रतिशत जनगणना नगरों के पास मास्टर प्लान नहीं हैं। वहीं, नगरपालिकाओं का राजस्व देश की जीडीपी का लगभग 1 प्रतिशत है और संपत्ति कर का योगदान मात्र 0.15 प्रतिशत है। तुलना करें तो ब्राजील में संपत्ति कर का योगदान 7.4 प्रतिशत और दक्षिण अफ्रीका में 6 प्रतिशत बताया गया है।  

ग्रामीण-शहरी वर्गीकरण की चार बड़ी चुनौतियां 

  • प्रशासनिक और तकनीकी क्षमता का अभाव: ग्रामीण पंचायतों के पास शहरी क्षेत्रों की जरूरतों के अनुरूप इंजीनियरिंग विशेषज्ञता, तकनीकी कर्मचारी और वैधानिक अधिकार नहीं होते। महाराष्ट्र का भिवंडी लॉजिस्टिक्स हब इसका उदाहरण है। यह लगभग 60 गांवों और 9 जनगणना नगरों में फैला है तथा यहां 91.8 प्रतिशत से अधिक रोजगार गैर-कृषि गतिविधियों से जुड़ा है। इसके बावजूद बुनियादी ढांचे, अग्नि सुरक्षा और स्वच्छता की जिम्मेदारी ग्रामीण पंचायतों पर है।
  • पुराने नियोजन कानून: कई राज्यों में नगर नियोजन संबंधी कानून आधुनिक शहरी चुनौतियों के अनुरूप नहीं हैं। कुछ स्थानों पर 1985 के मॉडल टाउन एंड कंट्री प्लानिंग कानून के आधार पर नियोजन किया जाता है, जिसमें जलवायु-अनुकूल विकास और आधुनिक स्थानिक नियोजन की आवश्यकताएं पर्याप्त रूप से शामिल नहीं हैं।
  • वित्तीय असमानता: जनगणना नगरों को शहरी स्थानीय निकायों के समान वित्तीय संसाधन और पूंजीगत अनुदान नहीं मिलते। परिणामस्वरूप, तेजी से विकसित हो रहे औद्योगिक और आवासीय क्षेत्रों में सीवरेज, जल निकासी और सड़क जैसी सुविधाओं का विकास प्रभावित होता है। 
  • पर्यावरणीय समस्याओं का क्षेत्रीय स्वरूप: वायु प्रदूषण, जल संकट और यातायात जैसी समस्याएं प्रशासनिक सीमाओं तक सीमित नहीं रहतीं। उदाहरण के लिए, दिल्ली के शीतकालीन पीएम  2.5 प्रदूषण का 65 प्रतिशत से अधिक हिस्सा शहर की सीमाओं के बाहर से आने का उल्लेख किया गया है। ऐसे में केवल नगरपालिका स्तर पर समाधान पर्याप्त नहीं हैं। 

राष्ट्रीय शहरीकरण नीति के तहत जरूरी सात बड़े सुधार 

भारत को शहरीकरण की चुनौतियों से निपटने के लिए सात प्रमुख क्षेत्रों में सुधार करने होंगे। 

  • पहला, उपग्रह चित्रों और भू-स्थानिक आंकड़ों के आधार पर शहरी बस्तियों का नियमित पुनर्वर्गीकरण किया जाए। 
  • दूसरा, दस लाख से कम आबादी वाले शहरों और उनके आसपास के क्षेत्रों के लिए भी क्षेत्रीय मास्टर प्लान तैयार किए जाएं। 
  • तीसरा, डिजिटल संपत्ति कर और पारदर्शी वित्तीय हस्तांतरण के माध्यम से नगरपालिकाओं की आय बढ़ाई जाए।
  • चौथा, जीएसटी परिषद की तर्ज पर राष्ट्रीय शहरीकरण परिषद स्थापित की जाए, जो केंद्र, राज्यों और स्थानीय निकायों के बीच समन्वय बनाए। 
  • पांचवां, पर्यावरण और बुनियादी ढांचे का नियोजन प्रशासनिक सीमाओं के बजाय एयरशेड, नदी बेसिन और आवागमन गलियारों के आधार पर हो।
  • छठा, केंद्र सरकार की वित्तीय सहायता को 12वीं अनुसूची के अंतर्गत उल्लिखित 18 नगरपालिका कार्यों के वास्तविक हस्तांतरण से जोड़ा जाए। 
  • सातवां, छोटे शहरों के लिए साझा तकनीकी सेवाएं और परियोजना तैयारी सुविधाएं (Project Preparation Facilities) विकसित की जाएं, ताकि टियर-2 और टियर-3 शहर भी गुणवत्तापूर्ण बुनियादी ढांचा परियोजनाएं तैयार कर सकें।

आगे की राह: वित्तीय और संस्थागत सुधारों पर जोर 

  • राष्ट्रीय शहरीकरण नीति को प्रभावी बनाने के लिए 16वें वित्त आयोग के 10,000 करोड़ रुपये के Urbanisation Premium का उपयोग अर्द्ध-शहरी गांवों को शहरी स्थानीय निकायों में शामिल करने के प्रोत्साहन के रूप में किया जा सकता है।
  • इसके साथ ही, संविधान के अनुच्छेद 243ZD और 243ZE के तहत जिला नियोजन समितियों (DPCs) तथा महानगरीय नियोजन समितियों (MPCs) को सक्रिय बनाना जरूरी है। सिटी इकोनॉमिक रीजन (CER) के लिए आवंटित 5,000 करोड़ रुपये का उपयोग बहु-प्रशासनिक शहरी क्षेत्रों में सार्वजनिक परिवहन और साझा नागरिक सुविधाओं के विकास में किया जा सकता है। 
  • सबसे महत्वपूर्ण है स्थानीय निकायों को 3Fs यानी Funds, Functions और Functionaries का वास्तविक हस्तांतरण। वस्तुतः केवल किसी बस्ती को शहरी घोषित कर देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे वित्तीय संसाधन, प्रशासनिक अधिकार और प्रशिक्षित कर्मचारी भी उपलब्ध कराने होंगे।  

निष्कर्ष 

  • भारत में शहरीकरण अब केवल बड़े महानगरों तक सीमित नहीं है। छोटे शहरों, औद्योगिक गलियारों और महानगरों के आसपास के गांवों में भी शहरी अर्थव्यवस्था तेजी से विकसित हो रही है। ऐसे में पुराने ग्रामीण-शहरी वर्गीकरण के आधार पर नियोजन करना भविष्य की जरूरतों को पूरा नहीं कर सकता। 
  • एक व्यापक राष्ट्रीय शहरीकरण नीति के माध्यम से कार्यात्मक शहरी क्षेत्रों को पहचानना, स्थानीय निकायों को सशक्त बनाना और क्षेत्रीय स्तर पर बुनियादी ढांचे का विकास करना आवश्यक है। इससे न केवल शहरी शासन बेहतर होगा, बल्कि भारत के शहरों को अधिक समावेशी, उत्पादक, टिकाऊ और जलवायु-अनुकूल बनाने में भी मदद मिलेगी। 
« »
  • SUN
  • MON
  • TUE
  • WED
  • THU
  • FRI
  • SAT