संदर्भ
भारत ने वर्ष 2070 तक नेट ज़ीरो उत्सर्जन हासिल करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस दिशा में नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता और स्वच्छ प्रौद्योगिकियों का विस्तार महत्त्वपूर्ण है। हालाँकि, इस्पात, सीमेंट, रसायन, उर्वरक और तेल एवं गैस जैसे उद्योगों में उत्सर्जन कम करना चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि इनकी कई प्रक्रियाओं में अत्यधिक तापमान या कार्बन-आधारित कच्चे माल की आवश्यकता होती है। ऐसे में कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण (सीसीयूएस) भारत के निम्न-कार्बन औद्योगिक परिवर्तन का एक महत्त्वपूर्ण समाधान बनकर उभर रहा है।
सीसीयूएस क्या है?
- सीसीयूएस ऐसी तकनीक है, जिसके अंतर्गत औद्योगिक संयंत्रों और अन्य स्रोतों से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड को वायुमंडल में छोड़े जाने से पहले कैप्चर किया जाता है। इसके बाद इसे शुद्ध करके संपीड़ित किया जाता है और पाइपलाइनों, जहाजों या अन्य माध्यमों से उपयोग अथवा भंडारण स्थल तक पहुँचाया जाता है।
- इस प्रक्रिया के तीन प्रमुख चरण हैं। पहले चरण में औद्योगिक उत्सर्जन से कार्बन डाइऑक्साइड को अलग किया जाता है। दूसरे चरण में इसे आवश्यकतानुसार परिवहन किया जाता है। तीसरे चरण में कैप्चर की गई कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग कंक्रीट, रसायन, कृत्रिम ईंधन और अन्य उत्पादों के निर्माण में किया जा सकता है, अथवा इसे गहरे भूगर्भीय संरचनाओं में प्रविष्ट कराकर सुरक्षित रूप से भंडारित किया जा सकता है। समाप्त हो चुके तेल एवं गैस भंडार, गहरे लवणीय जलभृत और उपयुक्त बेसाल्टिक चट्टानें इसके संभावित भंडारण स्थल हैं।
कठिन औद्योगिक क्षेत्रों के लिए महत्त्व
- नीति आयोग ने इस्पात, सीमेंट, तेल शोधन, पेट्रोरसायन, रसायन और उर्वरक जैसे कठिन क्षेत्रों के कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने के लिए सीसीयूएस की भूमिका को महत्त्वपूर्ण माना है। इन उद्योगों में उत्सर्जन केवल ईंधन जलाने से नहीं, बल्कि उत्पादन की रासायनिक प्रक्रियाओं से भी होता है। इसलिए केवल नवीकरणीय बिजली अपनाने से इनके सभी उत्सर्जनों को समाप्त करना संभव नहीं है।
- सीसीयूएस मौजूदा औद्योगिक संयंत्रों में उत्सर्जन कम करने का अवसर प्रदान करता है। इससे आवश्यक वस्तुओं का उत्पादन जारी रखते हुए जलवायु लक्ष्यों की दिशा में प्रगति की जा सकती है। ताप विद्युत संयंत्रों और औद्योगिक इकाइयों में उपयुक्त कार्बन कैप्चर प्रणालियाँ स्थापित करके भी उत्सर्जन प्रबंधन को मजबूत किया जा सकता है।
निम्न-कार्बन हाइड्रोजन और कार्बन का उपयोग
- सीसीयूएस भारत में निम्न-कार्बन हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था के विकास में भी योगदान दे सकता है। कोयला गैसीकरण या प्राकृतिक गैस आधारित प्रक्रियाओं से हाइड्रोजन उत्पादन के दौरान निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड को कैप्चर करने से उत्सर्जन घटाया जा सकता है। हालाँकि, इसका वास्तविक जलवायु लाभ कार्बन कैप्चर की दक्षता, ऊर्जा स्रोत और शेष उत्सर्जनों पर निर्भर करेगा।
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कोयला गैसीकरण (कोल गैसीफिकेशन):
- कोयला गैसीकरण नियंत्रित ताप का उपयोग कर ठोस कोयले को एक स्वच्छ और उपयोगी गैस में परिवर्तित करता है। इस गैस को सिंथेसिस गैस या सिनगैस कहा जाता है। कोयले से इसे बनाने की प्रक्रिया को कोल गैसीफिकेशन कहा जाता है।
- इसके दो स्थापित तरीके हैं: सरफेस कोल गैसीफिकेशन, जिसमें जमीन के ऊपर गैसीफायरों में खनन किए गए कोयले को संसाधित किया जाता है। अंडरग्राउंड कोल गैसीफिकेशन, जो सीधे भूमिगत परत के भीतर ही कोयले को परिवर्तित करता है। दोनों ही मामलों में, पारंपरिक दहन के विपरीत, कोयला पूरी तरह से जलता नहीं है। इसके बजाय, यह ऑक्सीजन और भाप की सीमित आपूर्ति के साथ प्रतिक्रिया करता है।
- यह आमतौर पर 800°C और 1,600°C के बीच के उच्च तापमान पर होता है। ये स्थितियां कोयले की जटिल संरचना को सरल गैसों में तोड़ देती हैं।
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- कार्बन उपयोग के अंतर्गत कैप्चर की गई कार्बन डाइऑक्साइड को उपयोगी उत्पादों में बदला जा सकता है। इसके प्रमुख अनुप्रयोगों में निर्माण सामग्री, कंक्रीट, कृत्रिम ईंधन, रसायन, बहुलक, यूरिया और शैवाल-आधारित जैव ईंधन शामिल हैं। उन्नत तेल पुनर्प्राप्ति में भी इसका उपयोग होता है। हालाँकि, कार्बन डाइऑक्साइड से बने उत्पादों में कार्बन कितने समय तक सुरक्षित रहता है और उनके निर्माण में कितनी ऊर्जा लगती है, यह उनके वास्तविक पर्यावरणीय लाभ का निर्धारण करता है।
भारत सरकार की प्रमुख पहल
- भारत सरकार ने सीसीयूएस अनुसंधान, प्रौद्योगिकी विकास और औद्योगिक उपयोग को बढ़ावा देने के लिए कई पहल की हैं। नीति आयोग की नवंबर 2022 की रिपोर्ट ने कठिन औद्योगिक क्षेत्रों में कार्बन उत्सर्जन घटाने के लिए क्षेत्र-विशिष्ट नीतिगत उपायों की आवश्यकता पर बल दिया।
- विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के समर्थन से वर्ष 2022 में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, मुंबई और जवाहरलाल नेहरू उन्नत वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र, बेंगलुरु में राष्ट्रीय सीसीयूएस केंद्र स्थापित किए गए। ये संस्थान अनुसंधान, प्रायोगिक परियोजनाओं, प्रौद्योगिकी प्रदर्शन और उद्योगों के साथ सहयोग पर कार्य करते हैं। दिसंबर 2025 में शुरू किए गए सीसीयूएस अनुसंधान एवं विकास मार्गदर्शक दस्तावेज का उद्देश्य प्रौद्योगिकी विकास, वित्तपोषण और व्यावसायिक स्तर पर इसके विस्तार को दिशा देना है।
- इसके अतिरिक्त, फरवरी 2026 में घोषित केंद्रीय बजट 2026–27 के अंतर्गत पाँच वर्षों में 20,000 करोड़ रुपये के आवंटन का प्रावधान बिजली, इस्पात, सीमेंट, तेल शोधन और रसायन क्षेत्रों में सीसीयूएस को बढ़ावा देने के लिए किया गया।
भारत में कार्बन उपयोग परियोजनाओं की प्रगति
- अप्रैल 2026 तक उपलब्ध विवरण के अनुसार, भारत में कार्बन कैप्चर एवं उपयोग की तीन परियोजनाएँ संचालित थीं, जबकि छह निर्माणाधीन या कार्यान्वयन के चरण में थीं। इसके अतिरिक्त, 16 परियोजनाएँ प्रस्तावित थीं। आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र, असम और ओडिशा सहित विभिन्न राज्यों में इन परियोजनाओं की मौजूदगी कार्बन प्रबंधन के बढ़ते दायरे को दर्शाती है।
- ये परियोजनाएँ स्वदेशी तकनीकों के विकास, औद्योगिक सहयोग, नए निवेश और चक्रीय अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित कर सकती हैं। इनके सफल विस्तार के लिए अनुसंधान के साथ-साथ व्यावसायिक व्यवहार्यता और दीर्घकालिक भंडारण सुरक्षा सुनिश्चित करना आवश्यक होगा।
चुनौतियाँ और आगे की राह
- सीसीयूएस के व्यापक उपयोग के सामने उच्च लागत, ऊर्जा की अतिरिक्त आवश्यकता, परिवहन नेटवर्क की कमी, भंडारण स्थलों की पहचान और दीर्घकालिक निगरानी जैसी चुनौतियाँ हैं। इसके अतिरिक्त, कैप्चर की गई कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग तभी वास्तविक जलवायु लाभ देगा, जब उससे होने वाला उत्सर्जन पारंपरिक विकल्पों की तुलना में कम हो।
- इसलिए भारत को अनुसंधान एवं विकास, निजी निवेश, स्पष्ट नियामक ढाँचे, सुरक्षित भंडारण और प्रशिक्षित मानव संसाधन पर ध्यान देना होगा। सीसीयूएस को नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता और स्वच्छ उत्पादन के विकल्प के रूप में नहीं, बल्कि उनके पूरक समाधान के रूप में विकसित करना चाहिए।
निष्कर्ष
- भारत के 2070 नेट ज़ीरो लक्ष्य की प्राप्ति के लिए ऊर्जा क्षेत्र के साथ औद्योगिक उत्सर्जनों में भी गहरी कटौती आवश्यक है। सीसीयूएस उन क्षेत्रों में उत्सर्जन कम करने का महत्त्वपूर्ण अवसर देता है, जहाँ अन्य उपायों की सीमाएँ हैं। उचित नीतियों, वित्तपोषण, तकनीकी नवाचार और सुरक्षित भंडारण व्यवस्था के माध्यम से भारत सीसीयूएस को औद्योगिक कार्बन उत्सर्जन में कमी, संसाधन दक्षता और सतत आर्थिक विकास का प्रभावी साधन बना सकता है।