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विकसित भारत की ओर भारत के बढ़ते कदम

संदर्भ  

  • साक्षरता किसी भी राष्ट्र के सामाजिक, आर्थिक और मानवीय विकास की बुनियाद है। यह केवल पढ़ने-लिखने की क्षमता या शिक्षा की प्रगति का पैमाना नहीं, बल्कि लोगों को रोजगार और नए अवसरों तक पहुँचने, अर्थव्यवस्था में भागीदारी करने और समाज में सार्थक भूमिका निभाने में सक्षम बनाती है। यूनेस्को साक्षरता को बुनियादी मानवाधिकार तथा समानता, न्याय, समावेश और कानून के शासन को मजबूत करने का महत्वपूर्ण माध्यम मानता है।   
  • स्वतंत्रता के बाद भारत ने साक्षरता के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। 1947 में देश की समग्र साक्षरता दर लगभग 14% थी, जबकि महिलाओं की साक्षरता करीब 8% थी। 1951 में कुल साक्षरता दर 18.32% थी, जो 2011 में बढ़कर 74.04% हो गई। इसी अवधि में पुरुष साक्षरता 27.15% से बढ़कर 82.14% और महिला साक्षरता 8.86% से बढ़कर 65.46% हुई।  

ग्रामीण-शहरी और लैंगिक अंतर में बदलाव 

  • भारत की साक्षरता यात्रा में ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच अंतर भी महत्वपूर्ण रहा है। शहरी साक्षरता दर 1951 में 34.59% से बढ़कर 2011 में 84.1% हो गई, जबकि ग्रामीण साक्षरता 12.10% से बढ़कर 67.8% हुई। 2001 से 2011 के बीच ग्रामीण महिलाओं की साक्षरता में लगभग 26% की वृद्धि हुई, जबकि ग्रामीण पुरुषों में यह वृद्धि करीब 10% रही। 
  • पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे (पीएलएफएस) के अनुसार, 7 वर्ष और उससे अधिक आयु की आबादी में देश की कुल साक्षरता दर 81.1% रही। शहरी क्षेत्रों में यह दर 89% थी, जिसमें पुरुषों की साक्षरता 93.1% और महिलाओं की 84.8% रही। ग्रामीण क्षेत्रों में कुल साक्षरता दर 77.4% रही; ग्रामीण पुरुषों की दर 84.8% और महिलाओं की 70.3% थी। ये आंकड़े प्रगति के साथ-साथ क्षेत्रीय और लैंगिक अंतर को कम करने की आवश्यकता भी बताते हैं।

 साक्षरता क्या है?

  • शिक्षा मंत्रालय स्कूली शिक्षा और साक्षरता विभाग ने पहली बार साक्षरता को इस तरह परिभाषित किया है: "पहचानने, समझने, व्याख्या करने और रचना करने के साथ ही डिजिटल साक्षरता, वित्तीय साक्षरता जैसे महत्वपूर्ण जीवन कौशल के लिए समझ के साथ पढ़ने, लिखने और हिसाब-किताब करने की क्षमता।" यह किसी राज्य/केंद्र शासित प्रदेश में 95% साक्षरता को पूर्ण साक्षरता के बराबर मानता है। 
  • वैश्विक संदर्भ में, यूनेस्को साक्षरता को पढ़ने, लिखने और संख्याओं का उपयोग करने की क्षमता के साथ-साथ तेज़ी से तकनीकी और सूचना-समृद्ध वातावरण में समस्याओं को हल करने के लिए डिजिटल सामग्री का उपयोग करने की क्षमता के रूप में परिभाषित करता है - यह एक बुनियादी कौशल है जो कार्य करने, सीखने और जीवन में लोगों की भागीदारी के लिए केंद्रीय पक्ष है। यह शिक्षा के अधिकार का ज़रूरी घटक है और अन्य मानवाधिकारों का लाभ उठाने के लिए पूर्व-आवश्यकता है।

स्कूल शिक्षा में नामांकन और रिटेंशन में सुधार 

  • साक्षरता बढ़ाने के साथ सरकार ने बच्चों के स्कूल में दाखिले, उनके बने रहने और शिक्षा के अगले स्तर तक पहुँचने पर भी जोर दिया है। UDISE+ 2025-26 के अनुसार, देश के स्कूलों में 24.72 करोड़ से अधिक विद्यार्थी नामांकित थे।
  • सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) फाउंडेशनल स्टेज पर 42.8%, प्रिपरेटरी स्टेज पर 91.7%, मिडिल स्टेज पर 89.6% और सेकेंडरी स्टेज पर 71.7% रहा। ड्रॉपआउट दर प्रिपरेटरी स्टेज में 1.8%, मिडिल में 3.6% और सेकेंडरी में 7.0% रही। रिटेंशन दर क्रमशः 98.5%, 91.1%, 83.7% और 51.9% रही। 
  • ट्रांज़िशन दर भी महत्वपूर्ण रही। फाउंडेशनल से प्रिपरेटरी स्तर पर 99.2%, प्रिपरेटरी से मिडिल स्तर पर 93.8% और मिडिल से सेकेंडरी स्तर पर 88.3% विद्यार्थी आगे बढ़े। 

उच्च शिक्षा में बढ़ी भागीदारी 

  • उच्च शिक्षा में भी पिछले दशक में उल्लेखनीय विस्तार हुआ है। 2014-15 में उच्च शिक्षा में 3.42 करोड़ विद्यार्थी नामांकित थे, जो 2023-24 में बढ़कर 4.50 करोड़ हो गए। इसी अवधि में उच्च शिक्षा का जीईआर 23.7% से बढ़कर 30% हुआ। उच्च शिक्षा से निकलने वाले विद्यार्थियों की संख्या भी 88.28 लाख से बढ़कर 1.09 करोड़ से अधिक हो गई।
  • महिलाओं के साथ-साथ SC, ST और OBC समुदायों की बढ़ती भागीदारी उच्च शिक्षा तक पहुँच और समावेशन में सुधार को दर्शाती है। एनईपी 2020 ने 2035 तक उच्च शिक्षा जीईआर को 50% तक पहुँचाने का लक्ष्य रखा है। 

साक्षरता को बढ़ावा देने वाली प्रमुख पहल 

  • उल्लास (ULLAS – नव भारत साक्षरता कार्यक्रम) 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के उन वयस्कों पर केंद्रित है जो औपचारिक स्कूली शिक्षा से वंचित रह गए। इसका उद्देश्य कार्यात्मक साक्षरता, न्यूमरेसी, जीवन कौशल और जीवनभर सीखने के अवसर उपलब्ध कराना है। इसका विज़न ‘जन-जन साक्षर’ है और इसमें स्वयंसेवा तथा सामुदायिक भागीदारी पर जोर दिया गया है। 
  • उल्लास (ULLAS) ऐप iOS और Android पर उपलब्ध है और 27 भाषाओं में शिक्षण सामग्री प्रदान करता है। कार्यक्रम के तहत स्वयंसेवक शिक्षकों की मदद से शिक्षार्थियों को पढ़ाया जाता है और बाद में 'फाउंडेशनल लिटरेसी एंड न्यूमरेसी असेसमेंट टेस्ट' (एफएलएनएटी) के माध्यम से उनका आकलन एवं प्रमाणन किया जाता है। 2022-27 के लिए इसका लक्ष्य ₹1,037.90 करोड़ के बजट के साथ 5 करोड़ शिक्षार्थियों को जोड़ना है। अब तक करीब 4.03 करोड़ शिक्षार्थी पंजीकृत हैं और 52.20 लाख से अधिक स्वयंसेवक जुड़े हैं। 3.3 करोड़ से अधिक शिक्षार्थी (एफएलएनएटी) में शामिल हो चुके हैं। 
  • 2024 से 2026 के बीच 10 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों—लद्दाख, मिज़ोरम, गोवा, त्रिपुरा, हिमाचल प्रदेश, चंडीगढ़, अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह, सिक्किम, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर ने खुद को पूर्ण साक्षर घोषित किया है।
  • निपुण भारत जुलाई 2021 में शुरू किया गया। इसका लक्ष्य 2026-27 तक बच्चों में बुनियादी साक्षरता और अंकगणित की दक्षता सुनिश्चित करना है। यह 3 से 8 वर्ष के बच्चों के फाउंडेशनल स्टेज पर केंद्रित है। 
  • इसके अलावा समग्र शिक्षा, पीएम श्री, पीएम ई-विद्या और पीएम पोषण (PM POSHAN) जैसी योजनाएँ भी शिक्षा की पहुँच, गुणवत्ता, डिजिटल लर्निंग, पोषण और स्कूल में बच्चों की भागीदारी बढ़ाने में योगदान देती हैं। पीएम पोषण के तहत 10.36 लाख स्कूलों में बाल वाटिका और कक्षा 1-8 के 11.20 करोड़ विद्यार्थियों को पका हुआ गर्म भोजन उपलब्ध कराया जाता है।  

विकसित भारत के लिए साक्षरता का महत्व 

  • साक्षरता का प्रभाव शिक्षा तक सीमित नहीं है। यह महिलाओं के सशक्तिकरण, सामाजिक समानता, रोजगार, उत्पादकता, नवाचार और आर्थिक भागीदारी को बढ़ावा देती है। शिक्षा और कौशल विकास ग्रीन जॉब्स, सर्कुलर इकोनॉमी और पर्यावरणीय स्थिरता में भी भागीदारी के अवसर बढ़ा सकते हैं।
  • एसडीजी-4 सभी के लिए समावेशी और न्यायसंगत गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तथा जीवनभर सीखने के अवसर सुनिश्चित करने पर केंद्रित है। भारत के विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में साक्षर, शिक्षित और कुशल आबादी महत्वपूर्ण आधार है।
  • आगे की राह में ग्रामीण-शहरी और लैंगिक असमानताओं को कम करने के साथ-साथ शिक्षा की गुणवत्ता और वास्तविक सीखने के परिणामों पर ध्यान देना आवश्यक होगा। साक्षरता में निरंतर प्रगति केवल शिक्षा क्षेत्र की उपलब्धि नहीं, बल्कि अधिक समावेशी, उत्पादक, समान और टिकाऊ विकसित भारत की मजबूत नींव है। 
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