चर्चा में क्यों ?
हाल ही में उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और कर्नाटक की विधान परिषद की 28 सीटों के लिए चुनाव हुए

इतिहास और भारतीय राज्यों में स्थिति
- भारत के सभी राज्यों में विधान परिषद (लेजिस्लेटिव काउंसिल) का अस्तित्व नहीं है, और वर्तमान में केवल छह राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में ही यह व्यवस्था लागू है।
- विधान परिषद का इतिहास ब्रिटिश काल के मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों से जुड़ा हुआ है, जिसके तहत वर्ष 1919 में केंद्रीय स्तर पर काउंसिल ऑफ़ स्टेट की स्थापना की गई थी।
- इसके पश्चात् वर्ष 1935 के भारत सरकार अधिनियम के अंतर्गत भारतीय प्रांतों में द्विसदनीय विधायिका बनाने का प्रावधान किया गया था।
- वर्ष 1937 में बंगाल में भारत की पहली विधान परिषद ने आधिकारिक रूप से अपना कार्य करना प्रारंभ किया था।
संविधान सभा की बहस और विधान परिषद पर विचार
- संविधान निर्माण के दौरान संविधान सभा के सदस्यों के बीच विधान परिषद की आवश्यकता और उसकी उपयोगिता को लेकर काफी मतभेद देखने को मिले थे।
- कांग्रेस नेता ब्रजेश्वर प्रसाद का मानना था कि नए संविधान की शुरुआत में संपूर्ण शक्तियाँ केवल निचले सदन (विधान सभा) को देना जोखिम भरा हो सकता है।
- उनका तर्क था कि शासन की शक्ति ऐसे शिक्षित, समझदार और न्यायप्रिय लोगों के हाथों में होनी चाहिए जो संकीर्ण सोच और अंधविश्वास से ऊपर उठकर निर्णय ले सकें।
- इसके विपरीत संविधान सभा के अन्य सदस्यों ने विधान परिषद की सीमित शक्तियों पर सवाल उठाए और इसे जनता के पैसों पर अनावश्यक वित्तीय बोझ माना था।
सभी भारतीय राज्यों में लेजिस्लेटिव काउंसिल क्यों नहीं हैं ?
- भारत के सभी राज्यों में विधान परिषद न होने का मुख्य कारण यह है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 169 के तहत राज्यों को यह विकल्प दिया गया है कि वे द्विसदनीय व्यवस्था रखना चाहते हैं या नहीं।
- यह राज्यों के लिए अनिवार्य नहीं बल्कि पूरी तरह से वैकल्पिक है।
आर्थिक और प्रशासनिक बोझ
- विधान परिषद को बनाए रखने के लिए भारी वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता होती है।
- सदस्यों (MLCs) के वेतन, भत्ते, पेंशन और अलग से सचिवालय चलाने का खर्च राज्य सरकार को उठाना पड़ता है।
- छोटे या कम वित्तीय संसाधनों वाले राज्य इस अतिरिक्त खर्च से बचने के लिए विधान परिषद का गठन नहीं करते हैं।
सीमित शक्तियां और निरर्थकता की भावना
- विधान परिषद के पास बहुत सीमित शक्तियां होती हैं।
- यह धन विधेयक को न तो खारिज कर सकती है और न ही उसे 14 दिनों से अधिक रोक सकती है।
- साधारण विधेयकों के मामले में भी अंतिम शक्ति विधानसभा के पास ही होती है।
- इस वजह से कई राज्य इसे एक गैर-जरूरी सदन मानते हैं जो केवल कानूनों को पारित करने में देरी (अधिकतम 4 महीने तक) कराता है।
राजनीतिक हितों के लिए उपयोग
- अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि राजनीतिक दल विधान परिषद का उपयोग उन नेताओं या कार्यकर्ताओं को 'बैकडोर एंट्री' (पार्किंग स्लॉट) देने के लिए करते हैं जो प्रत्यक्ष चुनाव (विधानसभा) हार जाते हैं।
- इस राजनीतिक स्वार्थ की धारणा के कारण भी कई राज्य इसे अपनाने से कतराते हैं।
जटिल गठन और उन्मूलन प्रक्रिया
- संविधान के अनुच्छेद 169 के अनुसार, यदि कोई राज्य विधान परिषद बनाना या समाप्त करना चाहता है, तो सबसे पहले उसकी विधानसभा को विशेष बहुमत से एक प्रस्ताव पारित करना होता है।
- इसके बाद, देश की संसद को इस संबंध में कानून बनाना पड़ता है।
- संसद की मंजूरी के बिना इसका गठन या अंत नहीं हो सकता, जिससे प्रक्रिया राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर हो जाती है। (जैसे- असम, राजस्थान और ओडिशा के प्रस्ताव वर्षों से संसद में लंबित हैं)।
संवैधानिक प्रावधान
- भारतीय संविधान का अनुच्छेद 169 संसद को किसी भी राज्य में विधान परिषद के गठन या उसे समाप्त करने के लिए कानून बनाने का अधिकार प्रदान करता है।
- किसी राज्य में विधान परिषद के गठन या समापन के लिए संबंधित राज्य की विधान सभा को कुल सदस्यों के बहुमत तथा उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित करना अनिवार्य होता है।
- इसके बाद संसद इसे साधारण बहुमत से पास करके विधान परिषद का गठन या समाप्ति कर सकती है।
- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 171 के अनुसार विधान परिषद के सदस्यों की कुल संख्या राज्य की विधान सभा के कुल सदस्यों की संख्या के एक-तिहाई से अधिक नहीं हो सकती, और यह संख्या किसी भी स्थिति में 40 से कम नहीं होनी चाहिए।
विधान परिषद सदस्यता
योग्यता (Qualifications) -
- भारत का नागरिक हो।
- न्यूनतम आयु 30 वर्ष होनी चाहिए (विधानसभा के लिए 25 वर्ष होती है)।
- दिवालिया या मानसिक रूप से अस्वस्थ न हो।
कार्यकाल (Tenure) -
- विधान परिषद एक स्थाई सदन है, यह कभी भंग नहीं होता।
- इसके प्रत्येक सदस्य का कार्यकाल 6 वर्ष का होता है।
- प्रत्येक 2 वर्ष में इसके 1/3 (एक-तिहाई) सदस्य सेवानिवृत्त हो जाते हैं और उनकी जगह नए सदस्य चुने जाते हैं।
सदस्यों के चयन की प्रक्रिया
- विधान परिषद के सदस्यों का चुनाव एकल संक्रमणीय मत प्रणाली के माध्यम से आनुपातिक प्रतिनिधित्व द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से होता है।
- विधान परिषद के कुल सदस्यों में से एक-तिहाई सदस्य नगरपालिकाओं, जिला बोर्डों और अन्य स्थानीय निकायों के निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा चुने जाते हैं।
- कुल सदस्यों का एक-तिहाई हिस्सा राज्य के विधायकों (MLAs) द्वारा चुना जाता है।
- कुल सदस्यों का एक-बारहवां (1/12) हिस्सा उन स्नातकों द्वारा चुना जाता है जिन्होंने कम से कम तीन वर्ष पूर्व अपनी स्नातक की डिग्री पूरी कर ली हो।
- कुल सदस्यों का एक-बारहवां (1/12) हिस्सा उन शिक्षकों द्वारा चुना जाता है जो राज्य के कम से कम माध्यमिक विद्यालय स्तर के शिक्षण संस्थानों में तीन वर्षों से अध्यापन कर रहे हों।
- शेष बचे हुए सदस्यों को राज्य के राज्यपाल द्वारा साहित्य, कला, विज्ञान, सहकारिता आंदोलन और समाज सेवा के क्षेत्र में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव रखने वाले प्रमुख व्यक्तियों में से मनोनीत किया जाता है।
- विधान परिषद के चुनाव आधिकारिक रूप से पार्टी के चुनाव चिन्ह पर नहीं लड़े जाते हैं, फिर भी उम्मीदवारों को विभिन्न राजनीतिक दलों का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष समर्थन प्राप्त होता है।
- राजनीतिक दल विधान परिषद के चुनावों को पढ़े-लिखे वर्गों और पेशेवरों के बीच अपने समर्थन का आकलन करने के लिए एक राजनीतिक पैमाने के रूप में देखते हैं।
विधान परिषद के प्रमुख कार्य और शक्तियाँ
- साधारण विधेयक संसद की तरह ही राज्य विधानमंडल के किसी भी सदन (विधानसभा या विधान परिषद) में पेश किया जा सकता है।
- विधान परिषद किसी साधारण विधेयक को पूरी तरह से खारिज नहीं कर सकती।
- यह किसी विधेयक को पहली बार में अधिकतम 3 महीने और दूसरी बार में 1 महीने (कुल मिलाकर अधिकतम 4 महीने) के लिए रोक सकती है। इसके बाद विधेयक को दोनों सदनों द्वारा पारित मान लिया जाता है।
- धन विधेयक केवल विधानसभा में ही पेश किया जा सकता है, विधान परिषद में नहीं।
- विधानसभा से पारित होने के बाद धन विधेयक को विधान परिषद के पास भेजा जाता है।
- परिषद इसे अधिकतम 14 दिनों तक ही अपने पास रख सकती है।
- यदि वह इस पर कोई सुझाव देती है, तो उसे मानना या न मानना पूरी तरह विधानसभा पर निर्भर करता है।
- विधान परिषद के सदस्य मंत्रियों से प्रश्न और पूरक प्रश्न पूछ सकते हैं तथा सरकार की नीतियों पर चर्चा कर सकते हैं।
- मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से केवल विधानसभा के प्रति उत्तरदायी होती है।
- इसलिए विधान परिषद सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित करके उसे हटा नहीं सकती।
- मुख्यमंत्री या अन्य मंत्री विधान परिषद के सदस्य भी हो सकते हैं।
- कुछ विशेष प्रकार के संविधान संशोधनों में, जहाँ राज्यों की मंजूरी की आवश्यकता होती है, विधान परिषद की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है।
विधान परिषद का महत्व (क्यों जरूरी है?)
भारत के राज्य विधानमंडलों में विधान परिषद (उच्च सदन) की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है।
जल्दबाजी में बने कानूनों पर रोक
- विधानसभा में किसी राजनीतिक दल के पास भारी बहुमत होने पर कभी-कभी बिना व्यापक चर्चा के विधेयक पारित हो जाते हैं।
- विधान परिषद एक 'समीक्षक सदन' के रूप में कार्य करता है जो विधेयकों की नीतिगत कमियों, अनपेक्षित परिणामों और ड्राफ्टिंग की गलतियों को सुधारने का अवसर देता है।
- यह विधानसभा के मनमाने फैसलों और जल्दबाजी में कानून बनाने की प्रवृत्ति पर थोड़ा अंकुश लगाती है।
विशेषज्ञों और प्रतिभावान लोगों की भागीदारी
- समाज के ऐसे प्रबुद्ध और प्रतिभावान लोग जो सीधे चुनाव (लोकप्रियता की राजनीति) की भागदौड़ में शामिल नहीं होना चाहते या चुनाव नहीं जीत पाते, वे इसके जरिए नीति निर्माण में योगदान दे सकते हैं।
- राज्यपाल द्वारा कला, विज्ञान, साहित्य, सहकारी आंदोलन और समाज सेवा के विशेषज्ञों को मनोनीत किया जाता है।
- इसके अलावा शिक्षकों और स्नातकों के माध्यम से भी बुद्धीजीवी वर्ग को इसमें प्रतिनिधित्व मिलता है
राजनीतिक स्थिरता और निरंतरता
- विधानसभा की तरह विधान परिषद कभी पूरी तरह भंग नहीं होती। इसके एक-तिहाई सदस्य हर दो साल बाद सेवानिवृत्त होते हैं।
- जब राज्य में विधानसभा भंग होती है (जैसे चुनाव के समय), तब भी विधान परिषद एक स्थाई अंग के रूप में राज्य विधानमंडल की निरंतरता और स्थिरता बनाए रखती है।
विधानसभा के कार्यभार को कम करना
- दो सदन होने से दोनों सदनों के बीच विधायी कार्यों और बहसों का बँटवारा हो जाता है।
- जो गैर-वित्तीय विधेयक होते हैं, उन पर परिषद में विस्तार से चर्चा की जा सकती है, जिससे विधानसभा का समय बचता है।
प्रारम्भिक परीक्षा प्रश्न -
प्रश्न . भारतीय संविधान के अनुच्छेद 171 के अनुसार, विधान परिषद की अधिकतम सदस्य संख्या राज्य की विधान सभा की कुल सदस्य संख्या की कितनी हो सकती है?
(a) एक-चौथाई (b) एक-तिहाई (c) आधी (d) दो-तिहाई
मुख्य परीक्षा प्रश्न –
प्रश्न - राज्य विधानमंडल के उच्च सदन के रूप में विधान परिषद की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए। क्या यह संघीय व्यवस्था और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को मजबूत करती है?
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FAQ
प्रश्न . भारतीय संविधान का कौन-सा अनुच्छेद राज्य में विधान परिषद के गठन या समाप्ति का प्रावधान करता है?
उत्तर: अनुच्छेद 169, इसके अंतर्गत संसद किसी राज्य में विधान परिषद का गठन या उसे समाप्त करने के लिए कानून बना सकती है।
प्रश्न . विधान परिषद के गठन या समाप्ति के लिए राज्य की विधान सभा में किस बहुमत से प्रस्ताव पारित होना आवश्यक है?
उत्तर: विधान सभा के कुल सदस्यों के बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित होना चाहिए।
प्रश्न . विधान परिषद के गठन या समाप्ति संबंधी प्रस्ताव को संसद किस बहुमत से पारित करती है?
उत्तर: संसद इसे साधारण बहुमत से पारित कर सकती है।
प्रश्न . विधान परिषद के सदस्यों की अधिकतम संख्या कितनी हो सकती है?
उत्तर: अनुच्छेद 171 के अनुसार, विधान परिषद के सदस्यों की कुल संख्या राज्य की विधान सभा के कुल सदस्यों की संख्या के एक-तिहाई से अधिक नहीं हो सकती। हालांकि, विधान परिषद में सामान्यतः न्यूनतम 40 सदस्य होने चाहिए।
प्रश्न . विधान परिषद स्थायी सदन क्यों कहलाती है?
उत्तर: क्योंकि विधान परिषद कभी भंग नहीं होती। इसके प्रत्येक सदस्य का कार्यकाल छह वर्ष होता है तथा प्रत्येक दो वर्ष में लगभग एक-तिहाई सदस्य सेवानिवृत्त होते हैं।
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