लद्दाख को छठी अनुसूची का दर्जा दिए जाने की मांग पिछले कुछ वर्षों से लगातार चर्चा में रही है। स्थानीय राजनीतिक और सामाजिक समूहों की प्रमुख चिंता लद्दाख की विशिष्ट संस्कृति, भाषा, परंपराओं, भूमि अधिकारों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की सुरक्षा से जुड़ी है। दूसरी ओर, केंद्र सरकार की ओर से लद्दाख के लिए एक प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित विधायी निकाय की व्यवस्था का प्रस्ताव सामने आया है।
इससे एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न पैदा होता है कि क्या किसी केंद्र शासित प्रदेश को छठी अनुसूची जैसी स्वायत्तता दी जा सकती है और क्या राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों के शासन की संवैधानिक संरचना को इस संदर्भ में समान माना जा सकता है?
भारतीय संघवाद की विशिष्ट संरचना
भारतीय संघवाद पारंपरिक संघीय व्यवस्थाओं से कुछ अलग है। संविधान में केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन किया गया है, लेकिन राष्ट्रीय एकता और अखंडता को बनाए रखने के लिए केंद्र को व्यापक शक्तियां भी प्रदान की गई हैं। आपातकाल जैसी परिस्थितियों में केंद्र की भूमिका और अधिक मजबूत हो जाती है।
इसी संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय ने State of Rajasthan v. Union of India (1977) में भारतीय संघीय व्यवस्था की प्रकृति पर विचार करते हुए इसे “Amphibian” यानी “उभयचर” के रूप में वर्णित किया था। इसका आशय यह है कि भारतीय व्यवस्था में संघीय और एकात्मक, दोनों प्रकार की विशेषताएं मौजूद हैं।
भारत का संवैधानिक ढांचा केवल राज्यों तक सीमित नहीं है। देश के क्षेत्र में राज्य, केंद्र शासित प्रदेश और अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अर्जित अन्य क्षेत्र भी शामिल हो सकते हैं। इस विविधतापूर्ण संरचना का उद्देश्य अलग-अलग भौगोलिक, सांस्कृतिक और जातीय समूहों को लोकतांत्रिक शासन की मुख्यधारा में शामिल करना भी है।
छठी अनुसूची क्यों महत्वपूर्ण है?
संविधान की छठी अनुसूची विशेष रूप से जनजातीय क्षेत्रों को प्रशासनिक स्वायत्तता प्रदान करने का महत्वपूर्ण माध्यम है। वर्तमान में यह व्यवस्था असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के निर्दिष्ट जनजातीय क्षेत्रों पर लागू होती है।
छठी अनुसूची का संवैधानिक आधार मुख्य रूप से अनुच्छेद 244(2) और अनुच्छेद 275(1) में मिलता है। इसके तहत स्वायत्त जिला परिषदों और क्षेत्रीय परिषदों की व्यवस्था की गई है। इन संस्थाओं को स्थानीय प्रशासन, सामाजिक प्रथाओं, परंपराओं तथा कुछ विधायी और न्यायिक मामलों में विशेष अधिकार प्राप्त होते हैं।
इस व्यवस्था के पीछे मूल विचार यह है कि विशिष्ट जनजातीय और सांस्कृतिक समुदायों को अपने स्थानीय मामलों के प्रशासन में पर्याप्त भागीदारी और स्वायत्तता मिल सके। इसलिए छठी अनुसूची केवल प्रशासनिक विकेंद्रीकरण का माध्यम नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक पहचान और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के संरक्षण से भी जुड़ी हुई है।
लद्दाख की मांग के पीछे के कारण
2019 में जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम के माध्यम से लद्दाख को बिना विधान सभा वाला केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया। इसके बाद लद्दाख में यह चिंता सामने आई कि नई प्रशासनिक व्यवस्था में स्थानीय लोगों की राजनीतिक भागीदारी और सांस्कृतिक हितों की पर्याप्त सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी।
स्थानीय समूहों की चिंताओं में लद्दाख की भाषा, परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान का संरक्षण प्रमुख है। इसके साथ ही भूमि और प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय लोगों के अधिकारों की सुरक्षा भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। बाहरी लोगों द्वारा भूमि अधिग्रहण की संभावित आशंका को लेकर भी स्थानीय स्तर पर चिंता व्यक्त की गई है।
राजनीतिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न भी इस मांग का महत्वपूर्ण हिस्सा है। चूंकि लद्दाख में वर्तमान में विधान सभा नहीं है, इसलिए स्थानीय स्तर पर व्यापक राजनीतिक भागीदारी के लिए किस प्रकार की संस्थागत व्यवस्था होनी चाहिए, यह बहस का प्रमुख विषय बना हुआ है।
छठी अनुसूची बनाम विशेष विधायी व्यवस्था
लद्दाख को छठी अनुसूची के तहत लाने के बजाय केंद्र सरकार की ओर से एक प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित विधायी निकाय की व्यवस्था का प्रस्ताव चर्चा में आया है। यह मॉडल लद्दाख की विशिष्ट परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए एक अलग या sui generis, यानी विशिष्ट संवैधानिक व्यवस्था का स्वरूप ले सकता है।
ऐसी व्यवस्था का उद्देश्य स्थानीय लोगों को कानून और नीतिगत निर्णयों में प्रत्यक्ष भागीदारी देना हो सकता है। प्रस्तावित निकाय को मौजूदा लद्दाख स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषदों (LAHDCs) से ऊपर रखा जा सकता है, जबकि पंचायत और जिला स्तर की संस्थाएं भी अपनी भूमिका निभाती रहें।
हालांकि, इस प्रस्ताव की वास्तविक प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करेगी कि नए निकाय को कितनी विधायी, प्रशासनिक और वित्तीय शक्तियां दी जाती हैं। विशेष रूप से वित्तीय स्वायत्तता का प्रश्न महत्वपूर्ण होगा। यदि किसी निर्वाचित संस्था के पास पर्याप्त वित्तीय संसाधन और निर्णय लेने की शक्ति नहीं होगी, तो उसकी स्वायत्तता सीमित रह सकती है।
इसके साथ ही उपराज्यपाल की भूमिका भी स्पष्ट करना आवश्यक होगा। निर्वाचित निकाय और उपराज्यपाल के बीच शक्तियों का विभाजन किस प्रकार होगा, यह प्रस्तावित व्यवस्था की कार्यक्षमता और संवैधानिक संतुलन के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न है।
क्या केंद्र शासित प्रदेश को विशेष संवैधानिक व्यवस्था मिल सकती है?
भारतीय संविधान केंद्र शासित प्रदेशों के लिए एक समान प्रशासनिक मॉडल को अनिवार्य नहीं करता। दिल्ली इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है। संविधान के अनुच्छेद 239AA और 239AB के माध्यम से राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के लिए एक विशेष संवैधानिक व्यवस्था बनाई गई है।
इससे यह स्पष्ट होता है कि संसद किसी केंद्र शासित प्रदेश की विशिष्ट परिस्थितियों को देखते हुए उसके लिए अलग संवैधानिक या प्रशासनिक व्यवस्था निर्धारित कर सकती है। इसलिए लद्दाख के लिए भी विशेष शासन मॉडल तैयार करना अपने आप में संवैधानिक रूप से असंभव नहीं है।
हालांकि, किसी भी प्रस्ताव की संवैधानिक वैधता इस बात पर निर्भर करेगी कि उसके वास्तविक प्रावधान संविधान के अन्य हिस्सों, शक्तियों के विभाजन और मौलिक संवैधानिक सिद्धांतों के साथ किस प्रकार सामंजस्य स्थापित करते हैं।
राष्ट्रीय हित और स्थानीय स्वायत्तता के बीच संतुलन
लद्दाख की भौगोलिक स्थिति इसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र बनाती है। ऐसे में शासन की ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता है जो स्थानीय लोकतांत्रिक भागीदारी और सांस्कृतिक संरक्षण के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी आवश्यकताओं के बीच संतुलन स्थापित कर सके।
यही वह बिंदु है जहां छठी अनुसूची और प्रस्तावित विशेष विधायी व्यवस्था के बीच बहस महत्वपूर्ण हो जाती है। एक ओर स्थानीय समुदाय अधिक स्वायत्तता की मांग कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर केंद्र के लिए राष्ट्रीय प्रशासन और रणनीतिक हित भी महत्वपूर्ण हैं।
इस संदर्भ में आनुपातिकता का सिद्धांत उपयोगी संवैधानिक दृष्टिकोण प्रदान कर सकता है। इसका व्यापक उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी विशेष परिस्थिति के समाधान के लिए अपनाया गया उपाय आवश्यकता के अनुरूप हो और विभिन्न संवैधानिक हितों के बीच उचित संतुलन कायम करे।
निष्कर्ष
लद्दाख का प्रश्न केवल छठी अनुसूची प्रदान करने या न करने तक सीमित नहीं है। यह भारतीय संघवाद, स्थानीय स्वशासन, सांस्कृतिक अधिकार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, वित्तीय स्वायत्तता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन से जुड़ा व्यापक संवैधानिक प्रश्न है।
लद्दाख के लिए प्रस्तावित विशेष विधायी व्यवस्था इसी चुनौती का एक संभावित समाधान हो सकती है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि स्थानीय निर्वाचित संस्थाओं को कितनी वास्तविक शक्तियां दी जाती हैं और केंद्र तथा स्थानीय प्रशासन के बीच अधिकारों की सीमाएं कितनी स्पष्ट रखी जाती हैं।
भारतीय संविधान की विशेषता ही इसकी विविध परिस्थितियों के अनुरूप शासन की अलग-अलग व्यवस्थाएं विकसित करने की क्षमता है। इसलिए लद्दाख के मामले में भी ऐसा मॉडल विकसित किया जा सकता है जो स्थानीय पहचान और लोकतांत्रिक भागीदारी को संरक्षण देते हुए राष्ट्रीय एकता और रणनीतिक हितों के साथ संतुलन कायम करे।