संदर्भ
- आगामी त्योहारी सीजन में खाद्य तेलों की बढ़ती मांग और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में तेजी के बीच केंद्र सरकार ने प्रमुख खाद्य तेलों पर बेसिक कस्टम्स ड्यूटी (बीसीडी) में कटौती की है। सरकार का कहना है कि इस कदम से आयातित खाद्य तेलों की लागत कम होगी, घरेलू बाजार में कीमतों को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी और उपभोक्ताओं को राहत मिल सकती है।
- उपभोक्ता मामलों के विभाग ने 24 सितंबर को जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में इसकी जानकारी दी। इससे एक दिन पहले, 23 सितंबर को वित्त मंत्रालय ने गजट अधिसूचना जारी कर खाद्य तेलों पर लागू आयात शुल्क से संबंधित पिछली अधिसूचना में संशोधन किया था। नई दरें 24 सितंबर से प्रभावी हो गई हैं।
अंतर्राष्ट्रीय बाजार में खाद्य तेलों की कीमतों में वृद्धि
- सरकार के फैसले की पृष्ठभूमि में अंतर्राष्ट्रीय बाजार में खाद्य तेलों की बढ़ती कीमतें भी अहम हैं। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के 4 सितंबर को जारी खाद्य मूल्य सूचकांक के अनुसार, अगस्त में वनस्पति तेल मूल्य सूचकांक 196.9 अंक रहा। यह जुलाई के मुकाबले 1.1 अंक यानी 0.6 प्रतिशत अधिक था।
- एफएओ के अनुसार, यह लगातार तीसरी मासिक वृद्धि थी और जून 2022 के बाद वनस्पति तेलों के मूल्य सूचकांक का सबसे ऊंचा स्तर था। पाम और सोया तेल की कीमतों में वृद्धि ने सूरजमुखी और रेपसीड तेल की कीमतों में आई कमी के प्रभाव को पीछे छोड़ दिया।
- पाम ऑयल की कीमतों में बढ़ोतरी के पीछे मजबूत वैश्विक आयात मांग और दक्षिण-पूर्व एशिया में उत्पादन पर मौसम संबंधी संभावित असर की चिंता प्रमुख कारण रही। वहीं, दक्षिण अमेरिकी सोया तेल को मजबूत निर्यात मांग से समर्थन मिला। अमेरिका में सोया तेल की कीमतों में मामूली गिरावट देखी गई, जिसका संबंध जैव ईंधन नीतियों को लेकर अनिश्चितता से बताया गया।
- दूसरी ओर, सूरजमुखी और रेपसीड तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में मामूली गिरावट आई। कमजोर आयात मांग और 2026-27 सीजन में पर्याप्त आपूर्ति की उम्मीद को इसका कारण माना गया।
किन खाद्य तेलों पर कितनी घटी बीसीडी?
सरकार ने कई प्रमुख खाद्य तेलों पर आयात शुल्क में कटौती की है।
- कच्चे सोया तेल पर बीसीडी 10 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत किया गया है।
- कच्चे पाम ऑयल पर शुल्क 10 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत किया गया है।
- मूंगफली तेल और जैतून तेल पर बीसीडी 32.5 प्रतिशत से घटाकर 27.5 प्रतिशत किया गया है।
- रिफाइंड पाम ऑयल पर शुल्क 32.5 प्रतिशत से घटाकर 27.5 प्रतिशत किया गया है।
- कच्चे सूरजमुखी तेल पर 10 प्रतिशत बीसीडी को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है।
- खाद्य श्रेणी के सूरजमुखी तेल पर बीसीडी 32.5 प्रतिशत से घटाकर 22.5 प्रतिशत किया गया है।
सरकार के अनुसार, संबंधित रिफाइंड खाद्य तेलों पर भी बीसीडी में समानांतर बदलाव किया गया है। साथ ही कच्चे और रिफाइंड खाद्य तेलों के बीच 19.25 प्रतिशत का आयात शुल्क अंतर बनाए रखा गया है।
सरकार द्वारा आयात शुल्क में कटौती क्यों?
- केंद्र सरकार का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय कीमतों में वृद्धि के कारण आयातित खाद्य तेलों की घरेलू लागत और खुदरा कीमतों पर दबाव बढ़ा है। चूंकि आयात शुल्क किसी भी आयातित खाद्य तेल की लैंडेड कॉस्ट का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है, इसलिए बीसीडी में कटौती से आयात लागत कम होने की उम्मीद है।
- सरकार के अनुसार, कम आयात शुल्क का लाभ सप्लाई चेन के माध्यम से उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है। इससे खाद्य तेलों की कीमतों को नियंत्रित करने और खाद्य महंगाई के साथ-साथ व्यापक महंगाई के दबाव को कम करने में मदद मिल सकती है।
- हालांकि, शुल्क में कमी का वास्तविक लाभ खुदरा उपभोक्ताओं तक कितनी तेजी और कितनी मात्रा में पहुंचता है, यह अंतरराष्ट्रीय कीमतों, विनिमय दर, आयात लागत और घरेलू बाजार की स्थिति समेत कई कारकों पर निर्भर करेगा।
खाद्य तेल उद्योग ने फैसले का किया स्वागत
- खाद्य तेल उद्योग के संगठन इंडियन वेजिटेबल ऑयल प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन (आईवीपीए) ने सरकार के फैसले का स्वागत किया है। संगठन के अध्यक्ष सुधाकर देसाई के अनुसार, कम आयात शुल्क से आयातित खाद्य तेलों की लैंडेड कॉस्ट में कमी आ सकती है और इससे उपभोक्ताओं को कुछ राहत मिलने की संभावना है।
- उन्होंने कहा कि त्योहारी महीनों में घरों के अलावा मिठाई, स्नैक्स, फूड सर्विस तथा होटल, रेस्तरां और कैटरिंग क्षेत्र में भी खाद्य तेल की मांग बढ़ती है। ऐसे में उद्योग के सामने सबसे बड़ी प्राथमिकता देशभर में पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करना है।
- देसाई ने यह भी उम्मीद जताई कि सूरजमुखी और सोया तेल के आयात में अधिक लचीलापन आने से पाम ऑयल पर मांग का दबाव कम हो सकता है। उनके अनुसार, इंडोनेशिया में प्रस्तावित बी50 बायोफ्यूल अनिवार्यता तथा इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे प्रमुख उत्पादक देशों में पाम क्षेत्र के विस्तार में सीमाएं पाम ऑयल की कीमतों पर दबाव डाल सकती हैं।
किसानों के लिए समस्या
- दूसरी ओर, तिलहन किसानों ने सरकार के फैसले को लेकर चिंता जताई है। वस्तुतः किसानों का तर्क है कि सस्ते आयातित खाद्य तेलों से घरेलू तिलहन उत्पादन प्रभावित हो सकता है और इससे उनकी आय पर दबाव पड़ सकता है।
- अखिल भारतीय किसान सभा के वरिष्ठ नेता बादल सरोज ने कहा कि आयात शुल्क में कटौती खाद्य तेल उत्पादन में आत्मनिर्भरता के सरकार के लक्ष्य से मेल नहीं खाती। उन्होंने सवाल उठाया कि जब किसानों को पाम, सूरजमुखी, मूंगफली और सोयाबीन जैसी फसलों का उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है, तब आयातित तेल को सस्ता करने की नीति का घरेलू किसानों पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
- यह आशंका भी जताई जा रही है कि यह फैसला अमेरिका के साथ प्रस्तावित व्यापार समझौते के संदर्भ में महत्वपूर्ण हो सकता है, क्योंकि अमेरिका प्रमुख सोया उत्पादक देशों में शामिल है। वस्तुतः इस फैसले से बहुराष्ट्रीय खाद्य तेल कंपनियों को फायदा हो सकता है।
उपभोक्ता राहत बनाम घरेलू उत्पादन की चुनौती
- खाद्य तेलों पर बीसीडी में कटौती को लेकर सरकार, उद्योग और किसानों के दृष्टिकोण अलग-अलग हैं। सरकार इसे बढ़ती अंतरराष्ट्रीय कीमतों के बीच उपभोक्ताओं को राहत देने और महंगाई के दबाव को कम करने के उपाय के रूप में देख रही है। उद्योग के लिए यह कदम त्योहारी सीजन में पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करने और आयात लागत घटाने का अवसर है।
- वहीं, तिलहन किसान सस्ते आयात से घरेलू उत्पादन और उनकी आय पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव को लेकर चिंतित हैं।
- आने वाले महीनों में इस फैसले का असर खाद्य तेलों की खुदरा कीमतों, आयात की मात्रा, घरेलू तिलहन उत्पादन और किसानों की आय पर किस तरह पड़ता है, यह महत्वपूर्ण रहेगा। सरकार के लिए उपभोक्ताओं को उचित कीमत पर खाद्य तेल उपलब्ध कराने के साथ-साथ घरेलू तिलहन उत्पादन और खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता के लक्ष्य के बीच संतुलन बनाए रखना भी एक अहम चुनौती होगी।