संदर्भ
भारत में मतदान केवल चुनाव के दिन वोट डालने की प्रक्रिया नहीं है। इसके पीछे मतदाता सूची तैयार करने, नाम जोड़ने और हटाने, आपत्तियों की सुनवाई, डेटा प्रबंधन और चुनाव आयोग की प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़ा एक व्यापक तंत्र काम करता है। हाल में चुनाव आयोग के भीतर सामने आए मतभेद और गोवा के 97 पात्र मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में शामिल न हो पाने की रिपोर्ट ने इस व्यवस्था की पारदर्शिता, जवाबदेही और तकनीकी संरचना पर नई बहस छेड़ दी है।
चुनाव आयोग के भीतर मतभेद का मामला
- सितंबर 2026 में सामने आई एक जांच रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने लगभग 10 महीनों के दौरान चुनाव आयोग के भीतर लिए गए कुछ फैसलों पर कम-से-कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कीं। रिपोर्ट में इन आपत्तियों को नए मतदाताओं के पंजीकरण, नाम हटाने और बहाल करने, मतदाता डेटा तक केंद्रीकृत पहुंच तथा चुनावी आईटी प्रणाली के संचालन से जुड़े मुद्दों से जोड़ा गया है।
- रिपोर्ट के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने कुछ मामलों में निर्णय लेने की प्रक्रिया और केंद्रीकृत डेटा व्यवस्था को लेकर सवाल उठाए। हालांकि, चुनाव आयोग ने इन दावों के जवाब में कहा कि अलग-अलग विचार और टिप्पणियां संस्थागत निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा हैं और संबंधित फैसले पूर्ण आयोग की प्रक्रिया के अनुसार लिए गए। इसलिए विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू केवल मतभेदों का होना नहीं, बल्कि चुनावी संस्था में निर्णय लेने की प्रक्रिया की पारदर्शिता और स्पष्टता भी है।
गोवा के 97 मतदाताओं का मामला
- इसी संदर्भ में गोवा का मामला विशेष ध्यान खींचता है। रिपोर्ट के अनुसार, 97 मतदाताओं के मामलों की स्थानीय स्तर पर जांच के बाद संबंधित निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों ने उन्हें पात्र पाया, लेकिन उनके नाम अंतिम मतदाता सूची में शामिल नहीं हो सके। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि स्थानीय अधिकारियों ने इस समस्या की जानकारी चुनाव आयोग को दी थी।
- यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां सवाल केवल किसी मतदाता की पात्रता का नहीं, बल्कि चुनावी प्रशासन में इस्तेमाल होने वाली तकनीकी व्यवस्था का भी है। यदि किसी अधिकारी ने किसी नागरिक को पात्र माना है, लेकिन केंद्रीकृत सॉफ्टवेयर उस निर्णय को लागू करने की अनुमति नहीं देता, तो इससे तकनीकी प्रणाली और प्रशासनिक अधिकारों के बीच संतुलन का प्रश्न उठता है।
- मतदाता सूची की शुद्धता का महत्व केवल मतदान तक सीमित नहीं है। कुछ सरकारी योजनाओं में भी मतदाता सूची का उपयोग पात्रता के मानदंड के रूप में किया जाता है। ऐसे में किसी पात्र व्यक्ति का नाम सूची से छूटना उसके लिए अन्य सरकारी सुविधाओं तक पहुंच को भी प्रभावित कर सकता है।
भारत और सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार
- भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था की महत्वपूर्ण विशेषता यह रही कि संविधान लागू होने के साथ ही व्यापक वयस्क मताधिकार को स्वीकार किया गया। इसके विपरीत, कई पश्चिमी लोकतंत्रों में मतदान का अधिकार लंबे समय तक संपत्ति, लिंग, नस्ल और सामाजिक स्थिति जैसी शर्तों से जुड़ा रहा।
- संविधान के अनुच्छेद 326 के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों में वयस्क नागरिकों के मतदान की व्यवस्था की गई। शुरुआत में मतदान की न्यूनतम आयु 21 वर्ष थी, जिसे 61वें संविधान संशोधन के बाद घटाकर 18 वर्ष कर दिया गया।
- भारत के पहले आम चुनाव के समय करोड़ों नागरिकों को पहली बार चुनावी प्रक्रिया से जोड़ना बड़ी प्रशासनिक चुनौती थी। तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन के नेतृत्व में चुनाव चिह्नों जैसी व्यवस्थाओं ने निरक्षर मतदाताओं के लिए चुनावी प्रक्रिया को अधिक सुलभ बनाया। इससे भारतीय चुनाव व्यवस्था का मूल उद्देश्य—पात्र नागरिक तक लोकतांत्रिक प्रक्रिया को पहुंचाना स्पष्ट हुआ।
मतदान का अधिकार: मौलिक या वैधानिक?
- भारत में मतदान के अधिकार की कानूनी स्थिति लंबे समय से बहस का विषय रही है। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने कुलदीप नायर बनाम भारत संघ (2006) में ‘राइट टू इलेक्ट’ को वैधानिक अधिकार के रूप में देखा। यानी मतदान और चुनाव में भागीदारी चुनावी कानूनों के ढांचे के तहत संचालित होती है और इसे सामान्यतः मौलिक अधिकार के समान दर्जा प्राप्त नहीं है।
- बाद के मामलों में इस विषय पर अलग-अलग न्यायिक दृष्टिकोण सामने आए। अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (2023) में न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी की असहमति वाली राय में मतदान को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़ने का दृष्टिकोण सामने आया। हालांकि, वर्तमान कानूनी स्थिति में बड़ी पीठ का कुलदीप नायर बनाम भारत संघ के संदर्भ में फैसला महत्वपूर्ण बना हुआ है।
सटीक मतदाता सूची की आवश्यकता क्यों?
- स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए मतदाता सूची की शुद्धता बुनियादी आवश्यकता है। पात्र मतदाता का नाम छूटना, अपात्र व्यक्ति का नाम शामिल होना, दोहरे पंजीकरण या गलत विवरण जैसी समस्याएं ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ के सिद्धांत को प्रभावित कर सकती हैं।
- जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 मतदाता सूचियों की तैयारी और संशोधन का कानूनी ढांचा प्रदान करता है। इसके तहत 18 वर्ष या उससे अधिक आयु का ऐसा नागरिक, जो संबंधित निर्वाचन क्षेत्र में ‘सामान्य रूप से निवास’ करता हो और कानून के तहत अयोग्य न हो, पंजीकरण के लिए पात्र है।
ECINet और तकनीकी जवाबदेही
- चुनावी प्रशासन में डिजिटल प्रणालियों का प्रयोग चुनावी प्रक्रिया को तेज और व्यवस्थित बना सकता है। लेकिन जब मतदाता सूची जैसे संवेदनशील रिकॉर्ड का प्रबंधन केंद्रीकृत तकनीकी प्रणाली से होता है, तो जवाबदेही के नए सवाल भी सामने आते हैं।
- किस अधिकारी को किसी निर्णय को बदलने का अधिकार है?
- गलत तरीके से हटाए गए नाम को कितनी जल्दी बहाल किया जा सकता है?
- सिस्टम में किए गए बदलाव का रिकॉर्ड कौन रखता है? और
- तकनीकी गलती होने पर अंतिम जिम्मेदारी किसकी होगी?
- वस्तुतः गोवा के 97 मतदाताओं का मामला इन्हीं सवालों को सामने लाता है।
आगे की चुनौती
- भारत की चुनावी व्यवस्था में तकनीक की भूमिका आने वाले समय में और बढ़ेगी। इसलिए डिजिटल दक्षता के साथ पारदर्शिता, स्वतंत्र ऑडिट, स्पष्ट अधिकार-वितरण, बदलावों की रिकॉर्डिंग और प्रभावी शिकायत निवारण जैसी व्यवस्थाएं भी महत्वपूर्ण होंगी।
- मतदाता सूची की शुद्धता और नागरिक का मतदान अधिकार एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए दोनों आवश्यक हैं। चुनावी व्यवस्था का उद्देश्य जहां अपात्र और गलत प्रविष्टियों को हटाना है, वहीं यह सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है कि कोई पात्र नागरिक तकनीकी या प्रशासनिक कारणों से लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बाहर न रह जाए।
- यद्यपि आने वाले समय में चुनावी संस्थाओं के सामने सबसे महत्वपूर्ण चुनौती यही होगी कि तकनीकी केंद्रीकरण, प्रशासनिक दक्षता, पारदर्शिता और नागरिक के लोकतांत्रिक अधिकारों के बीच प्रभावी संतुलन कैसे कायम किया जाए।