भारत तेजी से अपनी स्वच्छ ऊर्जा क्षमता बढ़ा रहा है और इसमें सौर ऊर्जा की अहम भूमिका है। लेकिन बड़े सौर संयंत्रों के लिए जमीन की उपलब्धता और भूमि अधिग्रहण एक बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं। इससे कृषि, पर्यावरण और स्थानीय समुदायों से जुड़े सवाल भी उठते हैं। ऐसे में कम भूमि की जरूरत वाली तकनीकों पर जोर बढ़ रहा है। फ्लोटिंग सोलर के साथ कैनाल-टॉप फोटोवोल्टिक, यानी नहरों के ऊपर लगाए जाने वाले सौर पैनल, भारत के लिए एक उपयोगी विकल्प हो सकते हैं।
हाल ही में स्वीकृत पीएम सूर्य सरोवर योजना (पीएम-एसएसवाई) के तहत जलाशयों और अन्य अंतर्देशीय जल निकायों पर 5,000 मेगावाट की फ्लोटिंग सोलर क्षमता विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है। इसी तर्ज पर भारत का विशाल नहर नेटवर्क भी स्वच्छ बिजली उत्पादन के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
कैनाल-टॉप फोटोवोल्टिक क्या है?
कैनाल-टॉप फोटोवोल्टिक, यानी सीटीपीवी, ऐसी सौर ऊर्जा प्रणाली है जिसमें नहर के ऊपर विशेष स्टील या अन्य मजबूत संरचनाएं बनाकर उन पर सौर पैनल लगाए जाते हैं।
फ्लोटिंग सोलर में पैनल पानी की सतह पर तैरने वाले प्लेटफॉर्म पर लगाए जाते हैं, जबकि सीटीपीवी में पैनल नहर के ऊपर ऊंचाई पर स्थापित किए जाते हैं। इनका डिजाइन नहर की चौड़ाई, दिशा और संरचना के अनुसार किया जा सकता है।
कुछ परियोजनाओं में पैनल नहर को एक किनारे से दूसरे किनारे तक ढकते हैं, जबकि कुछ जगहों पर नहर के किनारों के साथ सौर संरचनाएं स्थापित की जा सकती हैं। हालांकि, हर स्थिति में यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि सौर ढांचा पानी के प्रवाह और नहर के संचालन में बाधा न बने।
जमीन की बचत और पानी का संरक्षण
सीटीपीवी का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसके लिए बड़े पैमाने पर अतिरिक्त भूमि की जरूरत नहीं होती। मौजूदा सिंचाई और जलापूर्ति नहरों के ऊपर सौर पैनल स्थापित करके एक ही बुनियादी ढांचे का दोहरा उपयोग किया जा सकता है।
पंजाब में 20 मेगावाट की सीटीपीवी प्रणालियों की स्थापना से लगभग 100 एकड़ भूमि बचने का अनुमान लगाया गया था। यानी नहरों का इस्तेमाल केवल पानी पहुंचाने के लिए नहीं, बल्कि बिजली पैदा करने के लिए भी किया जा सकता है।
इस तकनीक का दूसरा महत्वपूर्ण लाभ पानी के वाष्पीकरण में संभावित कमी है। सौर पैनल नहर की सतह के एक हिस्से को ढक देते हैं, जिससे पानी का सीधे सूर्य के संपर्क में आना कम होता है। पानी की कमी वाले क्षेत्रों में यह विशेष रूप से उपयोगी हो सकता है।
इसके अलावा, पैनलों के नीचे बहता पानी उनके तापमान को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है। गर्म मौसम में इसका शीतलन प्रभाव सौर पैनलों के प्रदर्शन को बेहतर बनाने में योगदान दे सकता है।
गुजरात के मेहसाणा में नर्मदा नहर पर वर्ष 2012 में स्थापित 1 मेगावाट की सीटीपीवी प्रणाली से प्रत्येक वर्ष करीब 90 लाख लीटर पानी बचाने और लगभग 16 लाख यूनिट बिजली पैदा करने की सूचना दी गई थी।
भारत में पहले से मौजूद है अनुभव
भारत ने सीटीपीवी तकनीक को काफी पहले अपनाना शुरू कर दिया था। देश की पहली कैनाल-टॉप सोलर परियोजना वर्ष 2012 में गुजरात के मेहसाणा में स्थापित की गई थी।
इसके बाद वर्ष 2014 से 2017 के बीच गुजरात के वडोदरा में दो 10 मेगावाट की सीटीपीवी प्रणालियां स्थापित की गईं। वर्ष 2017 से 2018 के बीच पंजाब में भी 20 मेगावाट की सीटीपीवी प्रणालियां स्थापित की गईं।
हाल के वर्षों में राज्यों की दिलचस्पी फिर बढ़ी है। सितंबर 2025 में पंजाब एनर्जी डेवलपमेंट एजेंसी ने राज्य के 10,000 किलोमीटर से अधिक लंबे नहर नेटवर्क पर कुल 40 मेगावाट की सीटीपीवी परियोजनाओं के लिए एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट आमंत्रित किया। हरियाणा ने भी छह सिंचाई नहरों पर सीटीपीवी की संभावनाओं का अध्ययन शुरू किया है।
131 गीगावाट तक की संभावित क्षमता
सीटीपीवी की संभावनाओं का पैमाना एक वर्ष 2024 के आकलन से समझा जा सकता है। इसके अनुसार भारत में कैनाल-टॉप और कैनाल-बैंक सोलर परियोजनाओं की संभावित क्षमता लगभग 131 गीगावाट हो सकती है।
इस आकलन में 30 मीटर तक चौड़ी नहरों के लिए सीटीपीवी और 30 मीटर से अधिक चौड़ी नहरों के लिए वर्टिकल बाइफेशियल सौर पैनलों की संभावनाओं को शामिल किया गया।
सौर विकिरण, नहरों की विशेषताओं, बिजली सबस्टेशनों से दूरी और संरक्षित क्षेत्रों जैसे कारकों के आधार पर उपयुक्त क्षेत्रों की पहचान की गई। उत्तर प्रदेश, बिहार, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और पंजाब में संभावित क्षमता अधिक आंकी गई।
लागत और रखरखाव सबसे बड़ी चुनौती
सीटीपीवी के विस्तार के सामने सबसे बड़ी बाधाओं में इसकी लागत शामिल है। जमीन पर लगाए जाने वाले सौर संयंत्रों की तुलना में नहर के ऊपर पैनल लगाने के लिए मजबूत और ऊंची संरचनाओं की जरूरत होती है। इन संरचनाओं को तेज हवाओं और अन्य मौसम संबंधी परिस्थितियों का सामना करने के साथ-साथ नहर के संचालन को प्रभावित नहीं करना चाहिए।
अतिरिक्त स्टील, मजबूत नींव और रखरखाव के लिए सुरक्षित पहुंच व्यवस्था परियोजना की लागत बढ़ा सकती है।
पैनलों की सफाई, खराब मॉड्यूल को बदलना और विद्युत उपकरणों की मरम्मत भी चुनौतीपूर्ण हो सकती है, क्योंकि पूरा सिस्टम सक्रिय नहर के ऊपर ऊंचाई पर स्थापित होता है।
इसके अलावा, नहरों का रैखिक स्वरूप भी आर्थिक चुनौती पैदा करता है। यदि नहर का मार्ग बार-बार दिशा बदलता है या पास में पर्याप्त क्षमता वाला सबस्टेशन उपलब्ध नहीं है, तो परियोजना की लागत और बिजली को ग्रिड तक पहुंचाने का खर्च बढ़ सकता है।
केवल वित्तीय सहायता पर्याप्त नहीं
वर्ष 2014 में नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय, यानी एमएनआरई, ने ग्रिड से जुड़ी सीटीपीवी और कैनाल-बैंक परियोजनाओं के लिए पायलट-कम-डेमोंस्ट्रेशन योजना शुरू की थी। इसके तहत दोनों श्रेणियों के लिए 50-50 मेगावाट का लक्ष्य रखा गया था और वित्तीय सहायता का प्रावधान किया गया था।
लेकिन शुरुआती समर्थन के बावजूद इस क्षेत्र का बड़े पैमाने पर विस्तार नहीं हो पाया। इससे संकेत मिलता है कि सीटीपीवी के लिए केवल वित्तीय सहायता पर्याप्त नहीं है।
भविष्य में वायबिलिटी गैप फंडिंग, कम ब्याज वाली वित्तीय सहायता, मानकीकृत तकनीकी विनिर्देश, बेहतर परियोजना दिशानिर्देश और सिंचाई विभागों की क्षमता बढ़ाने जैसे कदम जरूरी हो सकते हैं। साथ ही परियोजना मंजूरी और ग्रिड कनेक्शन की प्रक्रियाओं को भी सरल बनाना होगा।
नहरें : बहुउद्देश्यीय ऊर्जा परिसंपत्ति
भारत का विशाल नहर नेटवर्क भविष्य में केवल सिंचाई और जलापूर्ति का माध्यम नहीं, बल्कि स्वच्छ ऊर्जा बुनियादी ढांचे का हिस्सा भी बन सकता है।
कैनाल-टॉप सोलर जमीन की जरूरत कम करते हुए बिजली उत्पादन बढ़ाने, कुछ परिस्थितियों में पानी के वाष्पीकरण को घटाने और मौजूदा सार्वजनिक बुनियादी ढांचे का बेहतर उपयोग करने का अवसर देता है।
सीटीपीवी जमीन पर स्थापित या रूफटॉप सोलर का विकल्प नहीं है और इसकी अपनी तकनीकी तथा आर्थिक चुनौतियां हैं। लेकिन भारत की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों और सीमित भूमि संसाधनों के बीच यह एक महत्वपूर्ण पूरक विकल्प बन सकता है।
अगर इसकी संभावित क्षमता का एक छोटा हिस्सा भी आर्थिक और तकनीकी रूप से व्यवहार्य तरीके से विकसित किया जाता है, तो भारत अपनी स्वच्छ ऊर्जा क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ जल और भूमि जैसे महत्वपूर्ण संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल की दिशा में भी आगे बढ़ सकता है। आने वाले वर्षों में नहरों के ऊपर चमकते सौर पैनल भारत के ऊर्जा और जल बुनियादी ढांचे के बीच एक नए तालमेल की तस्वीर पेश कर सकते हैं।