संदर्भ
विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision—SIR) प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूचियों को अद्यतन करना, मृत एवं दोहरी प्रविष्टियों को हटाना तथा पात्र नागरिकों का पंजीकरण सुनिश्चित करना है। हालाँकि, इस प्रक्रिया को लेकर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। पूर्व चुनाव आयुक्तों और सर्वोच्च न्यायालय के कुछ पूर्व न्यायाधीशों ने इसके वर्तमान स्वरूप पर सवाल उठाए हैं, जबकि कुछ पूर्व न्यायाधीशों और नौकरशाहों ने इसका समर्थन किया है। मुख्य चुनौती मतदाता सूची की शुद्धता बनाए रखने के साथ प्रत्येक पात्र नागरिक के मतदान के अधिकार की रक्षा करना है।
एसआईआर के बारे में
- जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) निर्वाचन आयोग (ECI) को किसी निर्वाचन क्षेत्र या उसके किसी हिस्से की मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण कराने का अधिकार देती है।
- जून 2025 में निर्वाचन आयोग ने देशव्यापी एसआईआर का निर्णय लिया। इसका पहला चरण बिहार में आयोजित हुआ। दूसरा चरण अक्टूबर 2025 से फरवरी 2026 के बीच नौ राज्यों और तीन केंद्रशासित प्रदेशों में पूरा किया गया। तीसरा चरण मई 2026 में शुरू हुआ, जिसमें 16 राज्य और तीन केंद्रशासित प्रदेश शामिल थे। मई 2026 में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि आयोग अनेक या सभी निर्वाचन क्षेत्रों में एसआईआर कराने के अपने संवैधानिक अधिकार के अंतर्गत कार्य कर रहा है।
पिछली एसआईआर प्रक्रिया की प्रमुख विशेषताएँ
वर्ष 2002 से 2004 के बीच हुए पिछले एसआईआर में मई 2002 के दिशा-निर्देशों के अंतर्गत कई महत्त्वपूर्ण प्रावधान थे।
- घर-घर सत्यापन: गणनाकर्ता मौजूदा मतदाता सूची के आधार पर घर-घर जाकर सत्यापन करते थे। सहायता के लिए निर्वाचित पंचायत सदस्यों को स्वेच्छा से शामिल किया जा सकता था।
- प्रभावी पर्यवेक्षण: पर्यवेक्षक कम-से-कम 25% घरों का यादृच्छिक सत्यापन करते थे। बार-बार बंद मिले घरों की स्वयं जाँच भी आवश्यक थी। सहायक निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों (AERO), निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों (ERO) और जिला निर्वाचन अधिकारियों को क्रमशः 12%, 5% और 2% घरों की जाँच करनी होती थी।
- नागरिकता संबंधी नियम: पहली बार नाम जुड़वाने वाले आवेदक को नागरिकता साबित करनी होती थी। हालाँकि, लाल बाबू हुसैन बनाम निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (1995) मामले के सिद्धांतों के अनुसार, मौजूदा मतदाता सूची में नाम होने को पर्याप्त साक्ष्यात्मक महत्त्व दिया जाना था।
- स्थानांतरित मतदाताओं का पंजीकरण: ऐसे मतदाताओं का नाम सीधे हटाने के बजाय उनकी प्रविष्टि पर ‘S’ चिह्न लगाया जाता था। स्थानांतरण की सूचना देने वाले व्यक्ति और नए पते का विवरण दर्ज किया जाता था। पूरे परिवार के स्थानांतरण पर पर्यवेक्षक स्वयं सत्यापन करता था। समन्वित गणना के कारण नए पते पर पंजीकरण संभव था।
- सामूहिक दावों पर रोक: व्यक्तियों, संगठनों या राजनीतिक दलों के सामूहिक दावों एवं आपत्तियों को अस्वीकार करने और सभी मामलों का निपटारा होने के बाद ही अंतिम सूची प्रकाशित करने का निर्देश था।
वर्तमान एसआईआर से जुड़े प्रमुख मुद्दे
- मतदाता सूची से नाम हटाना: जिन मतदाताओं का पता नहीं चला या जिन्होंने गणना प्रपत्र वापस नहीं किया अथवा नहीं भरा, उनके नाम प्रारूप सूची से हटाए गए। इसमें पहले मतदान कर चुके लोग भी शामिल हो सकते हैं। स्थानांतरित मतदाताओं को नए पते पर स्वतः पंजीकृत नहीं किया गया। उन्हें फॉर्म 8 से स्थानांतरण या नाम छूटने की स्थिति में फॉर्म 6 से पुनः पंजीकरण कराना पड़ सकता है। यह प्रक्रिया निर्वाचन आयोग की 2023 की निर्वाचक नामावली मार्गदर्शिका पर भी सवाल उठाती है, जिसमें नोटिस, निर्धारित अवधि और आवश्यक सत्यापन के बाद ही नाम हटाने की व्यवस्था बताई गई है।
- कमजोर पर्यवेक्षण: बिहार में जारी निर्देशों के अनुसार, पर्यवेक्षकों द्वारा कम-से-कम 10% घरों का यादृच्छिक सत्यापन निर्धारित था। यह 2002 के 25% सत्यापन से कम है। नियमित निगरानी बैठकों के बावजूद व्यापक और प्रभावी जाँच की आवश्यकता बनी हुई है।
- पात्रता साबित करने का बोझ: मतदाताओं से लगभग दो दशक पुरानी मतदाता सूची में अपना या माता-पिता का नाम खोजने अथवा नागरिकता संबंधी दस्तावेज देने की अपेक्षा की गई। इससे गरीब, प्रवासी और दस्तावेजों की कमी से जूझ रहे नागरिकों के बहिष्करण का खतरा बढ़ सकता है।
- सॉफ्टवेयर आधारित विसंगतियाँ: नामों की वर्तनी में अंतर, एक पूर्वज से छह से अधिक मतदाताओं का जुड़ाव तथा माता-पिता और बच्चों की आयु में निर्धारित 15–45 वर्ष की सीमा से बाहर का अंतर जैसी स्थितियों को तार्किक विसंगति माना गया। ऐसी स्वचालित पहचान को मानवीय सत्यापन के बिना निर्णायक आधार बनाना उचित नहीं है।
- फॉर्म 7 का सामूहिक उपयोग: नाम हटाने के लिए सामूहिक आपत्तियाँ दाखिल किए जाने की शिकायतें सामने आईं। इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए निर्वाचन आयोग ने 9 अक्टूबर को एक व्यक्ति द्वारा दाखिल किए जा सकने वाले आपत्ति प्रपत्रों की संख्या सीमित करने संबंधी निर्देश जारी किए। इसके अतिरिक्त, फॉर्म 6 की घोषणा की वैधता, पुनः पंजीकरण और बड़ी संख्या में अपीलों के निपटारे को लेकर भी कानूनी प्रश्न उठे हैं।
प्रमुख आँकड़े और उनका महत्त्व
तीनों चरणों में लगभग 13.3 करोड़ नाम मतदाता सूचियों से हटाए गए। उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार:
- 2.7 करोड़ (20%) नाम मृत्यु के कारण हटाए गए।
- 1.01 करोड़ (लगभग 7.6%) प्रविष्टियाँ दोहरी पाई गईं।
- 9.5 करोड़ (71%) मतदाता ‘अनुपस्थित, स्थानांतरित और अन्य’ श्रेणी में रखे गए।
- अंतिम श्रेणी में शामिल बड़ी संख्या में लोग पुनः पंजीकरण के पात्र हो सकते हैं। इसलिए, नाम हटाने की कुल संख्या के साथ उसके कारणों और वास्तविक पात्रता का आकलन करना आवश्यक है।
आगे की राह
- व्यापक ऑडिट: अंतिम मतदाता सूचियों की स्वतंत्र एवं पारदर्शी जाँच कर गलत तरीके से हटाए गए पात्र मतदाताओं की पहचान की जाए।
- पुनः पंजीकरण में तेजी: पात्र नागरिकों के दावों का समयबद्ध निपटारा हो तथा जरूरत पड़ने पर घर-घर सत्यापन कराया जाए।
- प्रभावी पर्यवेक्षण: जारी एसआईआर में नियमित निगरानी, यादृच्छिक जाँच और जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।
- निष्पक्ष दावा-आपत्ति प्रक्रिया: प्रत्येक आपत्ति पर उचित सुनवाई हो और सभी मामलों का निपटारा करने के बाद ही अंतिम सूची प्रकाशित की जाए।
- पुरानी सूची का संरक्षण: जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) के अनुरूप, आवश्यक परिस्थितियों में उचित प्रक्रिया पूरी होने तक पूर्ववर्ती मतदाता सूची के उपयोग की संभावना पर विचार किया जाए।
निष्कर्ष
- एसआईआर लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतदाता सूचियों की शुद्धता सुनिश्चित करने का महत्त्वपूर्ण साधन है, लेकिन इसकी सफलता केवल नाम हटाने से नहीं, बल्कि पात्र मतदाताओं को सूची में बनाए रखने से भी मापी जानी चाहिए। व्यापक सत्यापन, प्रभावी पर्यवेक्षण, सरल पुनः पंजीकरण और निष्पक्ष अपील व्यवस्था के माध्यम से निर्वाचन आयोग को पारदर्शिता तथा समावेशन सुनिश्चित करना चाहिए। मतदाता सूची की शुद्धता और मतदान के अधिकार की रक्षा परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि लोकतंत्र को मजबूत करने वाले पूरक उद्देश्य हैं।