संदर्भ
- मुख्य चुनाव आयुक्त (Chief Election Commissioner) और चुनाव आयुक्तों (Election Commissioners) की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में महत्वपूर्ण सुनवाई हुई है। दो न्यायाधीशों की पीठ ने मामले को भारत के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of India) के समक्ष भेजने का फैसला किया है, ताकि मामले की सुनवाई के लिए उचित संख्या वाली बड़ी पीठ गठित करने पर विचार किया जा सके।
- मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने की। दोनों न्यायाधीश मामले के संवैधानिक पहलुओं पर अलग-अलग दृष्टिकोण रखते हैं, लेकिन इस बात पर सहमत हुए कि मामले को आगे बड़ी पीठ के सामने ले जाना उचित होगा।
विवाद की पृष्ठभूमि
- इस मामले की पृष्ठभूमि मार्च 2023 के सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (Anoop Baranwal v. Union of India) से जुड़ी है।
- उस समय अदालत ने कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 324 में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए संसद द्वारा कानून बनाए जाने की परिकल्पना है, लेकिन ऐसा कोई कानून मौजूद नहीं था।
- ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम व्यवस्था के तौर पर चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए तीन सदस्यीय समिति का प्रावधान किया था। इसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश को शामिल किया गया था।
- अदालत ने चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण बताते हुए इस बात पर जोर दिया था कि चुनाव कराने वाली संस्था को कार्यपालिका के प्रभाव से पर्याप्त रूप से स्वतंत्र होना चाहिए।
- इसके बाद संसद ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 बनाया।
2023 के कानून के अंतर्गत मुख्य बदलाव
- नए कानून ने सुप्रीम कोर्ट की अंतरिम व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव किया। नियुक्ति समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश को हटाकर उनकी जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल किया गया।
- इससे तीन सदस्यीय समिति में प्रधानमंत्री और उनके द्वारा नामित कैबिनेट मंत्री के रूप में सरकार के दो प्रतिनिधि हो गए। तीसरे सदस्य लोकसभा में विपक्ष के नेता हैं।
- याचिकाकर्ताओं की ओर से इस व्यवस्था को लेकर यह सवाल उठाया गया है कि क्या ऐसी समिति चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और नियुक्ति प्रक्रिया में पर्याप्त संस्थागत संतुलन सुनिश्चित करती है।
न्यायाधीशों की राय में मतभेद
- मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति दत्ता और न्यायमूर्ति शर्मा के बीच इस सवाल पर मतभेद सामने आया कि क्या मौजूदा दो सदस्यीय पीठ मामले का फैसला कर सकती है या इसके लिए संविधान पीठ की जरूरत है।
- न्यायमूर्ति दत्ता के अनुसार, चुनाव आयोग की स्वतंत्रता से जुड़े मूल संवैधानिक सिद्धांत पहले ही तय किए जा चुके हैं। इसलिए मौजूदा कानून को उन्हीं स्थापित सिद्धांतों की कसौटी पर परखा जा सकता है।
- वहीं न्यायमूर्ति शर्मा का दृष्टिकोण था कि याचिकाएं एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न उठाती हैं, जिस पर पहले स्पष्ट रूप से निर्णय नहीं हुआ है। इसलिए मामले को बड़ी पीठ के सामने रखा जाना चाहिए।
- दोनों न्यायाधीशों ने इस मतभेद को तीन सदस्यीय पीठ के पास भेजने के बजाय सीधे मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखने पर सहमति जताई, ताकि जरूरत पड़ने पर पांच न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ गठित की जा सके।
न्यायमूर्ति दत्ता ने चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर क्या कहा?
मामला बड़ी पीठ के पास भेजे जाने के बावजूद न्यायमूर्ति दत्ता की टिप्पणियां विवाद के मूल मुद्दे को समझने में महत्वपूर्ण हैं।
- उन्होंने चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को केवल वास्तविक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं माना, बल्कि उसकी निष्पक्षता और स्वतंत्रता के सार्वजनिक विश्वास से भी जोड़ा।
- क्रिकेट के अंपायर का उदाहरण देते हुए उन्होंने संकेत दिया कि यदि अंपायर को चुनने की प्रक्रिया ही निष्पक्ष नजर नहीं आती, तो उसके सही फैसलों पर भी संदेह पैदा हो सकता है।
- इस दृष्टिकोण के अनुसार, चुनाव आयोग की स्वतंत्रता ऐसी होनी चाहिए जो कानून और व्यवहार में होने के साथ-साथ जनता को भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे।
विपक्ष के नेता की भूमिका कमजोर
- न्यायमूर्ति दत्ता ने नियुक्ति समिति की संरचना को लेकर एक और महत्वपूर्ण पहलू उठाया। उनके अनुसार, प्रधानमंत्री द्वारा नामित कैबिनेट मंत्री सामूहिक मंत्रिमंडलीय जिम्मेदारी के सिद्धांत से बंधे होते हैं। ऐसे में समिति में प्रधानमंत्री से अलग रुख अपनाने की उनकी स्वतंत्रता पर सवाल उठ सकता है।
- उनके विचार में इससे लोकसभा में विपक्ष के नेता की मौजूदगी से मिलने वाला संभावित संतुलन कमजोर पड़ सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि याचिकाकर्ताओं की यह दलील कि 2023 का कानून चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में कार्यपालिका को व्यापक प्रभाव के अधिकार का आधार नजर आता है।
कॉलेजियम से तुलना पर भी सवाल
- इस विवाद में एक तर्क यह भी सामने आया है कि यदि न्यायाधीशों की नियुक्ति में कॉलेजियम व्यवस्था के तहत न्यायपालिका की प्रमुख भूमिका स्वीकार की जाती है, तो चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में कार्यपालिका की प्रमुख भूमिका पर सवाल क्यों उठना चाहिए।
- न्यायमूर्ति दत्ता ने इस तुलना को पूरी तरह समान मानने पर सवाल उठाया। उन्होंने न्यायिक नियुक्तियों में कार्यपालिका की मौजूदा भूमिका और कॉलेजियम की सिफारिशों को लेकर उठने वाले सवालों का भी उल्लेख किया।
- उन्होंने यह प्रश्न भी उठाया कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में किसी बाहरी या तटस्थ सदस्य की भूमिका कितनी प्रभावी होगी, जबकि न्यायिक कॉलेजियम की अपनी व्यवस्था में भी कोई बाहरी सदस्य शामिल नहीं होता।
संविधान पीठ के मामलों में देरी पर चिंता
- मामले के मूल संवैधानिक सवालों पर अलग-अलग राय रखने के बावजूद दोनों न्यायाधीश एक व्यापक मुद्दे पर सहमत दिखे वो संविधान पीठ के मामलों के निपटारे में होने वाली देरी है।
- पीठ ने इस बात की ओर ध्यान दिलाया कि कई संवैधानिक प्रश्न लंबे समय से लंबित हैं। ऐसे मामलों का समयबद्ध तरीके से निपटारा जरूरी है, क्योंकि इनके फैसले व्यापक संवैधानिक और संस्थागत प्रभाव डाल सकते हैं।
- इसी संदर्भ में मुख्य न्यायाधीश से उचित संविधान पीठ गठित करने और ऐसे मामलों को अपेक्षाकृत तेजी से निपटाने पर विचार करने की बात कही गई।
आगे की राह
- फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने 2023 के कानून की संवैधानिक वैधता पर अंतिम फैसला नहीं दिया है। मामला अब मुख्य न्यायाधीश के समक्ष जाएगा, जहाँ यह तय किया जा सकता है कि इसकी सुनवाई के लिए कितनी बड़ी पीठ गठित की जाए।
- इसलिए इस स्तर पर यह कहना जल्दबाजी होगी कि 2023 का कानून संवैधानिक है या असंवैधानिक। अंतिम स्थिति बड़ी पीठ के फैसले के बाद ही स्पष्ट होगी।
- मामले का मूल सवाल यह है कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की मौजूदा व्यवस्था क्या चुनाव आयोग की संवैधानिक स्वतंत्रता, निष्पक्षता और जनता के विश्वास से जुड़े सिद्धांतों के अनुरूप है। इसका उत्तर अब बड़ी पीठ की सुनवाई और उसके निर्णय से सामने आएगा।