संदर्भ
- सुप्रीम कोर्ट ने 18 सितंबर 2026 को मेथनॉल की बिक्री और उपयोग से जुड़े महाराष्ट्र सरकार के महत्वपूर्ण नियमों पर फैसला सुनाया। अदालत ने महाराष्ट्र पॉइजन्स रूल्स, 1972 के नियम 18A और 18B के उन प्रावधानों को असंवैधानिक करार दिया, जिनके तहत मेथनॉल की बिक्री और कब्जे पर अतिरिक्त प्रतिबंध लगाए गए थे।
- न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने मेथनॉल आधारित उत्पाद बनाने वाली कंपनियों की रिट याचिकाओं को स्वीकार करते हुए कहा कि संबंधित नियम वैध औद्योगिक गतिविधियों पर अनुपातहीन बोझ डालते हैं। अदालत के अनुसार, इन नियमों और जहरीली शराब में मेथनॉल के दुरुपयोग को रोकने के उद्देश्य के बीच पर्याप्त और तर्कसंगत संबंध स्थापित नहीं हो पाया।
क्या है पूरा मामला?
- मेथनॉल यानी मिथाइल अल्कोहल एक अत्यंत जहरीला रसायन है। हालांकि, इसका इस्तेमाल कई वैध औद्योगिक क्षेत्रों में भी होता है। फॉर्मल्डिहाइड, पैराफॉर्मल्डिहाइड, पेंट, रेजिन और विभिन्न रासायनिक उत्पादों के निर्माण में यह महत्वपूर्ण कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
- महाराष्ट्र सरकार ने 1991 में मुंबई में हुई जहरीली शराब त्रासदी के बाद मेथनॉल की बिक्री और उपयोग पर नियंत्रण कड़ा किया था। इस घटना में मेथनॉल युक्त नकली शराब पीने से करीब 93 लोगों की मौत हुई थी।
- इसके बाद मामले की जांच और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के उपाय सुझाने के लिए तत्कालीन अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक पी.आर. पार्थसारथी की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गई। बाद में वर्ष 2011 में महाराष्ट्र पॉइजन्स रूल्स, 1972 में संशोधन करते हुए नियम 18A और 18B जोड़े गए।
नियमों में क्या प्रावधान था?
- नियम 18A के तहत मेथनॉल की खरीद को नियंत्रित किया गया था। इसके अलावा गैर-दवा निर्माताओं को मेथनॉल बेचने से पहले उसमें रंग और कड़वा पदार्थ यानी बिटरेंट मिलाना अनिवार्य किया गया था।
- वहीं, नियम 18B के तहत फॉर्म A लाइसेंस के बिना मेथनॉल रखने पर उसकी जब्ती का प्रावधान था।
- याचिकाकर्ता कंपनियों का कहना था कि मेथनॉल में रंग और बिटरेंट मिलाने से उनके उत्पादों की गुणवत्ता और उपयोगिता प्रभावित होती है। रंग की मौजूदगी से पेंट और फार्मास्यूटिकल उद्योगों के लिए उत्पाद अनुपयोगी हो सकते हैं, जबकि कुछ औद्योगिक, प्रयोगशाला और फार्मास्यूटिकल प्रक्रियाओं में बिटरेंट भी समस्या पैदा कर सकता है।
- राज्य सरकार ने इन नियमों का बचाव करते हुए कहा कि मेथनॉल का इस्तेमाल नकली या जहरीली शराब बनाने में किया जा सकता है। इसे रंगीन और कड़वा बनाने से इसकी पहचान आसान होगी और इसके दुरुपयोग को रोकने में मदद मिलेगी।
सुप्रीम कोर्ट का बयान
- सुप्रीम कोर्ट ने माना कि राज्य सरकार को मेथनॉल जैसे जहरीले पदार्थों की बिक्री और कब्जे को नियंत्रित करने का अधिकार है। पॉइजन्स एक्ट, 1919 भी राज्य सरकारों को जहरीले पदार्थों के नियमन के लिए नियम बनाने की शक्ति देता है।
- लेकिन अदालत ने कहा कि केवल नियमन की शक्ति होना पर्याप्त नहीं है। नियमों को संविधान के अनुरूप और अनुपातिक भी होना चाहिए।
- अदालत ने विशेष रूप से संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 19(1)(g) पर विचार किया। अनुच्छेद 14 मनमानी से सुरक्षा और समानता के सिद्धांत से जुड़ा है, जबकि अनुच्छेद 19(1)(g) नागरिकों को पेशा, व्यापार या व्यवसाय करने की स्वतंत्रता देता है।
नियम 18A के प्रावधान क्यों रद्द हुए?
- अदालत ने नियम 18A(1) के तहत फॉर्म A लाइसेंस के सत्यापन की अनिवार्यता को भी चुनौती के संदर्भ में अनुपातहीन माना। अदालत के अनुसार, केवल लाइसेंस की जांच से यह सुनिश्चित नहीं होता कि मेथनॉल का इस्तेमाल किस उद्देश्य के लिए किया जाएगा।
- इसके अलावा, गैर-दवा निर्माताओं को बेचे जाने वाले मेथनॉल में रंग और बिटरेंट मिलाने की अनिवार्यता को भी सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया।
- अदालत ने पाया कि इन पदार्थों को मिलाने और अवैध शराब में मेथनॉल के दुरुपयोग को रोकने के बीच पर्याप्त और निकट संबंध स्थापित नहीं हुआ। राज्य यह साबित नहीं कर पाया कि इससे मेथनॉल की अवैध आपूर्ति या जहरीली शराब का निर्माण प्रभावी रूप से रुक जाएगा।
- इसके विपरीत, यह शर्त वैध औद्योगिक इकाइयों पर लगातार बोझ डालती है और उनके उत्पादों की उपयोगिता प्रभावित कर सकती है।
नियम 18B पर भी अदालत की आपत्ति
- सुप्रीम कोर्ट ने नियम 18B के तहत बिना फॉर्म A लाइसेंस के रखे गए मेथनॉल की जब्ती के प्रावधान को भी असंवैधानिक करार दिया।
- अदालत के अनुसार, यह प्रावधान फॉर्म B परमिट के तहत मेथनॉल के वैध कब्जे के साथ टकराव पैदा कर सकता है और व्यवहार में फॉर्म B परमिट को अप्रासंगिक बना सकता है।
- अदालत ने के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ (2017) में स्थापित अनुपातिकता के सिद्धांत को लागू करते हुए कहा कि मेथनॉल युक्त जहरीली शराब से होने वाली मौतों को रोकना एक वैध सरकारी उद्देश्य है। हालांकि, उस उद्देश्य को हासिल करने के लिए लगाए गए संबंधित प्रतिबंध उपयुक्त और आवश्यक नहीं पाए गए।
जहरीली शराब रोकने के लिए राज्यों को क्या करना होगा?
मेथनॉल से जुड़े नियमों को रद्द करने के साथ सुप्रीम कोर्ट ने जहरीली शराब की घटनाओं को रोकने के लिए कई दिशा-निर्देश भी दिए।
विभागों के बीच बेहतर समन्वय:
- अदालत ने राज्यों को निषेध, आबकारी, पुलिस, परिवहन, उद्योग और स्वास्थ्य विभागों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने को कहा। गैर-सरकारी संगठनों को भी इन प्रयासों में शामिल किया जा सकता है।
- राज्यों को अपनी सीमाओं की निगरानी, अवैध शराब के परिवहन पर रोक, अवैध शराब बनाने या रखने वाले स्थानों की पहचान और ऐसे औद्योगिक प्रतिष्ठानों की निगरानी करनी चाहिए, जहां से जहरीली शराब बनाने में इस्तेमाल होने वाले रसायनों की अवैध आपूर्ति की आशंका हो।
मेथनॉल के लाइसेंस और रिकॉर्ड की निगरानी:
- अदालत ने कहा कि मेथनॉल के लिए लाइसेंस उचित सत्यापन के बाद जारी किए जाएं और उनकी नियमित समीक्षा हो।
- औद्योगिक उपयोगकर्ताओं को बचे हुए या अतिरिक्त मेथनॉल को वापस करने तथा स्टॉक और खपत का रिकॉर्ड रखने की व्यवस्था होनी चाहिए। नियमों के उल्लंघन पर लाइसेंस निलंबित या रद्द करने की कार्रवाई की जा सकती है।
- मेथनॉल का परिवहन समर्पित टैंकरों के जरिए और आबकारी विभाग की निगरानी में किया जाना चाहिए। कंटेनरों को इस तरह सील करने की व्यवस्था होनी चाहिए, जिससे चोरी, अवैध स्थानांतरण या छेड़छाड़ की संभावना कम हो।
स्वास्थ्य व्यवस्था और जागरूकता पर जोर:
- सुप्रीम कोर्ट ने जहरीली शराब की घटनाओं से निपटने के लिए राज्यों को बेहतर स्वास्थ्य और आपदा प्रबंधन व्यवस्था तैयार करने को कहा।
- इसके तहत पर्याप्त सुविधाओं वाले अस्पताल, नशामुक्ति केंद्र, प्रभावित परिवारों के लिए सहायता और स्थानीय स्तर पर परामर्श केंद्रों की व्यवस्था पर जोर दिया गया।
- सरकारों और गैर-सरकारी संगठनों को जागरूकता अभियान चलाने तथा लोगों को शराब संबंधी कानूनों के उल्लंघन की जानकारी संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाने के लिए प्रोत्साहित करने को भी कहा गया।
उच्चतम न्यायालय के निर्णय का महत्त्व
- सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले में एक तरफ जहरीली शराब से होने वाली मौतों को रोकने के लिए राज्य के नियामक अधिकार को स्वीकार किया गया है, वहीं दूसरी तरफ यह भी स्पष्ट किया गया है कि ऐसे नियमन को अनुपातिक, तर्कसंगत और संवैधानिक अधिकारों के अनुरूप होना चाहिए।
- अदालत ने स्पष्ट किया कि जहरीली शराब पर रोक लगाने के लिए प्रभावी निगरानी और प्रवर्तन जरूरी है, लेकिन ऐसे उपाय वैध औद्योगिक गतिविधियों पर ऐसा लगातार बोझ नहीं डाल सकते, जिसका संबंधित समस्या से पर्याप्त और तर्कसंगत संबंध साबित न हो।
- सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि उसके दिशा-निर्देशों का प्रभावी क्रियान्वयन अंततः पुलिस, आबकारी विभाग और अन्य संबंधित प्रवर्तन एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर निर्भर करेगा।