New
Hindi Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 21st Sept. 2026, 11:30 AM Hindi Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 22nd Sept. 2026, 8:00 AM English Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 6th Aug 2026 English Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 19th Aug 2026, 11:00 AM Hindi Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 21st Sept. 2026, 11:30 AM Hindi Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 22nd Sept. 2026, 8:00 AM English Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 6th Aug 2026 English Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 19th Aug 2026, 11:00 AM

स्वच्छ भारत मिशन: शौचालयों से आगे बढ़कर सामुदायिक स्वच्छता की नई तस्वीर

संदर्भ 

  • कई दशकों तक ग्रामीण स्वच्छता भारत के विकास की राह में एक बड़ी चुनौती बनी रही। 2014 में जब स्वच्छ भारत मिशन-ग्रामीण (SBM-G) शुरू हुआ, तब ग्रामीण स्वच्छता कवरेज करीब 39 प्रतिशत था। 2014 से 2019 के बीच देश के 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 10.28 करोड़ से अधिक शौचालयों का निर्माण हुआ और 2019 तक ग्रामीण भारत को खुले में शौच से मुक्त (ODF) घोषित किया गया। 
  • यह उपलब्धि केवल शौचालयों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं रही। इसके बाद स्वच्छता का फोकस बुनियादी ढांचे से आगे बढ़कर उसके इस्तेमाल, रखरखाव, कचरा प्रबंधन और लंबे समय तक व्यवहार में बदलाव पर केंद्रित हुआ। इसी सोच के तहत एसबीएम-जी के दूसरे चरण में ओडीएफ स्थिति को बनाए रखने के साथ-साथ ठोस और तरल कचरा प्रबंधन को मजबूत करने पर जोर दिया गया।   

ओडीएफ से ओडीएफ प्लस तक  

  • आज एक ओडीएफ प्लस गांव वह है जो खुले में शौच से मुक्त स्थिति बनाए रखने के साथ ठोस और तरल कचरे का प्रभावी प्रबंधन करता है और अपने आसपास स्वच्छता भी बनाए रखता है। ओडीएफ प्लस गांवों को उनकी प्रगति के आधार पर तीन श्रेणियों - एस्पायरिंग, राइजिंग और मॉडल में बांटा गया है।  
  • एस्पायरिंग गांव ठोस या तरल कचरे में से कम से कम एक का प्रबंधन करते हैं। राइजिंग गांव दोनों प्रकार के कचरे का प्रबंधन करते हैं, जबकि मॉडल गांव कचरा प्रबंधन के साथ स्वच्छ सार्वजनिक स्थानों और ओडीएफ प्लस से जुड़े जागरूकता संदेशों को भी सुनिश्चित करते हैं।  
  • 17 सितंबर 2026 तक देश में 5.69 लाख ओडीएफ प्लस गांव दर्ज किए गए हैं, जिनमें 5.25 लाख गांव मॉडल श्रेणी तक पहुंच चुके हैं। 5.38 लाख गांवों में ठोस कचरा प्रबंधन और 5.65 लाख गांवों में तरल कचरा प्रबंधन की व्यवस्था है। वहीं, 582 जिलों में 1,314 गोबर्धन (GOBARdhan) बायोगैस प्लांट संचालित हैं।  

बदलाव की शुरुआत व्यवहार से 

  • स्वच्छता का स्थायी असर केवल सुविधा उपलब्ध कराने से नहीं आता। शौचालय तभी प्रभावी है जब परिवार उसका नियमित इस्तेमाल करें, उसकी देखभाल करें और उसे साफ रखें। इसी तरह, कचरा प्रबंधन तभी सफल हो सकता है जब घरों से ही कचरे को अलग करने और उचित निपटान की आदत विकसित हो। 
  • इसीलिए एसबीएम-जी ने व्यवहार परिवर्तन संचार (BCC) को स्वच्छता के परिणामों को बनाए रखने का महत्वपूर्ण आधार बनाया है। इसमें शौचालय का सुरक्षित इस्तेमाल, हाथ धोना, पानी को सुरक्षित रखना, स्वच्छता सुविधाओं का रखरखाव, गीले कचरे की कंपोस्टिंग या बायोगैस के जरिए उसका उपयोग और सार्वजनिक स्थानों पर कचरा न फेंकने जैसी आदतों को बढ़ावा दिया जाता है।  
  • इस बदलाव में महिलाएं महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। स्वच्छाग्रही और स्वयं सहायता समूह (SHG) घर-घर संपर्क, जागरूकता और स्वच्छता गतिविधियों के जरिए समुदायों को जोड़ रहे हैं। पश्चिम बंगाल के हावड़ा में एसएचजी समूहों ने गंगा किनारे की 18 ग्राम पंचायतों में 18 दिनों के दौरान 9.32 टन प्लास्टिक कचरा एकत्र किया। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में एसएचजी महिलाएं रिसोर्स रिकवरी सेंटर संचालित कर घरों से कचरा एकत्र करती हैं, उसे अलग करती हैं और गीले कचरे को वर्मीकम्पोस्ट में बदलती हैं।  

स्कूलों से घर और समुदाय तक 

  • स्वच्छता की आदतों को बचपन से विकसित करने में स्कूलों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। एसबीएम-जी चरण II में स्कूलों को स्वच्छता और कचरा प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण संस्थान माना गया है। झारखंड के चंदिल में एक स्कूल ने सिंगल-यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाने के साथ ग्रेवॉटर के प्रबंधन के लिए सोख गड्ढा बनाया।  
  • बच्चे इन आदतों को स्कूल से अपने घरों और समुदायों तक ले जाते हैं। यही वजह है कि स्वच्छता अभियान में युवाओं और छात्रों की भागीदारी लगातार बढ़ रही है। 'स्वच्छता ही सेवा 2026' में स्कूलों और शिक्षण संस्थानों के जरिए स्वच्छता ज्ञान यात्राओं, संवादों और स्रोत पर कचरा अलग करने जैसी गतिविधियों पर जोर दिया जा रहा है।  
  • स्वच्छता का दायरा अब मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन जैसे विषयों तक भी पहुंच चुका है। झारखंड में चाइल्ड कैबिनेट के सदस्यों ने स्कूलों में सैनिटरी पैड की उपलब्धता सुनिश्चित करने और एमएचएम प्रयोगशाला की स्थापना जैसी पहलों में भूमिका निभाई है।

जब गांव खुद बनाते हैं स्वच्छता की व्यवस्था 

  • व्यक्तिगत आदतों को स्थायी सामुदायिक परिणामों में बदलने के लिए मजबूत स्थानीय संस्थाओं की जरूरत होती है। ग्राम पंचायतें कचरा संग्रहण, जल निकासी, ग्रेवॉटर प्रबंधन और सार्वजनिक स्थानों की देखभाल जैसी गतिविधियों की योजना और क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ग्राम जल एवं स्वच्छता समितियां (VWSC) भी योजना, निगरानी और समुदाय की भागीदारी को मजबूत करती हैं। 
  • हरियाणा की गाडली ग्राम पंचायत इसका एक उदाहरण है। पंचायत ने सामुदायिक और घरेलू शौचालयों, जल निकासी व्यवस्था, तालाबों के जरिए ग्रेवॉटर प्रबंधन और GOBARdhan बायोगैस प्लांट जैसी व्यवस्थाएं विकसित कीं। जन-रैलियों और बैठकों के जरिए लोगों को इन व्यवस्थाओं से जोड़ा गया। 
  • कर्नाटक का 'स्वच्छ शनिवार' भी जनभागीदारी का उदाहरण है, जहां हर महीने के पहले शनिवार को पंचायत प्रतिनिधि, युवा, एसएचजी और स्थानीय समुदाय मिलकर स्कूलों, आंगनवाड़ियों, स्वास्थ्य केंद्रों, जल स्रोतों और अन्य सार्वजनिक स्थानों की सफाई करते हैं। 

स्वच्छता से रोजगार और संसाधन निर्माण 

  • स्वच्छता व्यवस्था का विस्तार ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर भी पैदा कर रहा है। मध्य प्रदेश के बैतूल में बबीता धुर्वे ने ग्राम पंचायत से जुड़कर ई-रिक्शा के जरिए घर-घर कचरा संग्रहण का काम शुरू किया और जिले की पहली महिला ई-रिक्शा कचरा संग्रहकर्ता बनीं। पश्चिम बंगाल के नदिया में शौचालय निर्माण की बढ़ती मांग के कारण लगभग 2,400 पुरुषों और महिलाओं को राजमिस्त्री का प्रशिक्षण दिया गया। 
  • गुजरात के वेदांचा गांव में ग्रेवॉटर ट्रीटमेंट सिस्टम रोजाना करीब 200 किलोलीटर पानी का उपचार करता है। उपचारित पानी का उपयोग सिंचाई और भूजल रिचार्ज के लिए किया जाता है, जबकि पंचायत खाद और उपचारित पानी के पुन: उपयोग से सालाना करीब ₹2.5 लाख की आय अर्जित करती है। 

सुविधाओं से आदतों और सामूहिक जिम्मेदारी तक 

  • ग्रामीण स्वच्छता की यात्रा अब केवल शौचालय निर्माण की कहानी नहीं है। यह सुविधाओं की पहुंच से उपयोग, उपयोग से व्यवहार और व्यवहार से सामुदायिक जिम्मेदारी तक पहुंच चुकी है। 
  • 'स्वच्छता ही सेवा 2026' जैसे अभियान इसी सोच को जनभागीदारी से जोड़ते हैं। 17 सितंबर से शुरू होने वाले अभियान के तहत 1 अक्टूबर को 'एक दिन, एक घंटा, एक साथ' के माध्यम से सामूहिक श्रमदान और 2 अक्टूबर को विशेष ग्राम सभाओं व स्वच्छता जागरूकता कार्यक्रमों की योजना है। 
  • आखिरकार, स्वच्छ भारत की सफलता का पैमाना केवल बनाए गए शौचालयों या स्थापित कचरा प्रबंधन प्रणालियों की संख्या नहीं है। असली बदलाव तब दिखाई देता है जब स्वच्छता रोजमर्रा की आदत बनती है, समुदाय उसे अपनी जिम्मेदारी मानता है और स्थानीय संस्थाएं उसे लगातार बनाए रखने में सक्षम होती हैं। 
« »
  • SUN
  • MON
  • TUE
  • WED
  • THU
  • FRI
  • SAT
Have any Query?

Our support team will be happy to assist you!

OR