ग्रीनलैंड पर अमेरिका-डेनमार्क-ग्रीनलैंड सुरक्षा समझौता
संदर्भ
आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती सामरिक प्रतिस्पर्धा के बीच अमेरिका, डेनमार्क और ग्रीनलैंड ने एक महत्वपूर्ण त्रिपक्षीय सुरक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। 22 सितंबर 2026 को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान हुए इस समझौते का उद्देश्य वर्ष 1951 के अमेरिका-डेनमार्क रक्षा समझौते को आधुनिक बनाना और ग्रीनलैंड की सुरक्षा व्यवस्था को मौजूदा रणनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप मजबूत करना है।
इस समझौते पर अमेरिका, डेनमार्क और ग्रीनलैंड के प्रतिनिधियों ने हस्ताक्षर किए। इसके तहत अमेरिका को ग्रीनलैंड में अपनी सैन्य गतिविधियों और रणनीतिक पहुंच का विस्तार करने का अधिकार मिलेगा। हालांकि, ग्रीनलैंड की संप्रभुता डेनमार्क के पास ही रहेगी और उसके लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार को भी मान्यता दी गई है।
1951 के समझौते में हुआ बदलाव
नया समझौता 27 अप्रैल 1951 को हुए अमेरिका-डेनमार्क रक्षा समझौते का संशोधित और विस्तारित रूप है। उस समय शीत युद्ध के शुरुआती दौर में आर्कटिक क्षेत्र की सैन्य अहमियत तेजी से बढ़ रही थी।
1951 के समझौते के तहत अमेरिका को ग्रीनलैंड में रक्षा सुविधाएं स्थापित करने और सैन्य गतिविधियां संचालित करने का अधिकार मिला था। नया समझौता इसी व्यवस्था को वर्तमान सुरक्षा चुनौतियों के अनुरूप विस्तारित करता है और ग्रीनलैंड की सरकार को भी औपचारिक रूप से इस सुरक्षा ढांचे में शामिल करता है।
ग्रीनलैंड में बढ़ेगी अमेरिकी सैन्य मौजूदगी
समझौते के तहत अमेरिका ग्रीनलैंड में अपनी मौजूदा सैन्य मौजूदगी का विस्तार कर सकेगा। वर्तमान में अमेरिका के पास ग्रीनलैंड के उत्तर-पश्चिम में पिटुफिक स्पेस बेस मौजूद है।
नए ढांचे में इस बेस के विस्तार और आधुनिकीकरण के साथ-साथ नार्सार्सुआक और मेस्टर्सविग जैसे क्षेत्रों में अतिरिक्त रक्षा सुविधाएं विकसित करने की संभावना है। भविष्य में जरूरत के अनुसार अन्य रक्षा क्षेत्रों का भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
अमेरिकी सैन्य विमानों और जहाजों को ग्रीनलैंड के विभिन्न हिस्सों में व्यापक पहुंच मिलने से निगरानी, सैन्य परिवहन और आपात स्थिति में त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता मजबूत हो सकती है।
मिसाइल रक्षा में ग्रीनलैंड की भूमिका
ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति उसे मिसाइल चेतावनी और वायु रक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण बनाती है। नए समझौते में ग्रीनलैंड को अमेरिकी मिसाइल चेतावनी और रक्षा नेटवर्क से जोड़ने की दिशा में सहयोग का ढांचा तैयार किया गया है।
प्रस्तावित गोल्डन डोम मिसाइल रक्षा प्रणाली के संदर्भ में भी ग्रीनलैंड महत्वपूर्ण हो सकता है। उत्तरी अटलांटिक और आर्कटिक के बीच स्थित होने के कारण यहां स्थापित निगरानी और रक्षा प्रणालियां अमेरिका की शुरुआती चेतावनी क्षमता को मजबूत कर सकती हैं।
गैर-नाटो देशों की सैन्य मौजूदगी पर रोक
समझौते में ग्रीनलैंड में गैर-नाटो देशों की सैन्य मौजूदगी को सीमित करने की व्यवस्था भी की गई है। किसी गैर-नाटो देश को वहां सैन्य प्रतिष्ठान या स्थायी सैन्य मौजूदगी स्थापित करने के लिए संबंधित पक्षों की सहमति की आवश्यकता होगी।
इसके अलावा संवेदनशील बुनियादी ढांचे और महत्वपूर्ण खनिजों से जुड़े निवेशों पर भी सुरक्षा के नजरिए से निगरानी रखी जाएगी। उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई बाहरी शक्ति ग्रीनलैंड में ऐसा आर्थिक या रणनीतिक प्रभाव हासिल न कर सके, जिससे सुरक्षा संबंधी चिंताएं पैदा हों।
संप्रभुता और आत्मनिर्णय का अधिकार बरकरार
समझौते की महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इससे ग्रीनलैंड का क्षेत्रीय स्वामित्व अमेरिका को हस्तांतरित नहीं होता। ग्रीनलैंड डेनमार्क के साम्राज्य का स्वायत्त हिस्सा बना रहेगा।
समझौते में डेनमार्क की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के साथ-साथ ग्रीनलैंड के लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार की पुष्टि की गई है। इसका अर्थ है कि अमेरिका को मिलने वाले सैन्य अधिकारों को क्षेत्रीय स्वामित्व से अलग रखा गया है।
ग्रीनलैंड की स्वतंत्रता का प्रभाव
ग्रीनलैंड में भविष्य में स्वतंत्रता को लेकर राजनीतिक प्रक्रिया आगे बढ़ती है तो नए समझौते में उसकी सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी प्रावधान मौजूद हैं।
समझौते का ढांचा इस तरह तैयार किया गया है कि यदि ग्रीनलैंड भविष्य में डेनमार्क से स्वतंत्र होता है, तो रक्षा और नाटो से जुड़े मौजूदा प्रावधानों को जारी रखने की व्यवस्था बनी रहे। इसका उद्देश्य क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था में निरंतरता बनाए रखना है।
आर्कटिक में बढ़ता ग्रीनलैंड का महत्व
ग्रीनलैंड का महत्व केवल उसके विशाल क्षेत्रफल तक सीमित नहीं है। यह उत्तरी अटलांटिक और आर्कटिक के बीच ऐसी रणनीतिक स्थिति में है, जहां से महत्वपूर्ण समुद्री और हवाई मार्गों पर नजर रखी जा सकती है।
ग्रीनलैंड-आइसलैंड-यूनाइटेड किंगडम गैप भी रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। यह क्षेत्र उत्तरी अटलांटिक में पनडुब्बियों और नौसैनिक गतिविधियों की निगरानी के लिहाज से अहम माना जाता है।
इसके अलावा आर्कटिक में बर्फ पिघलने के कारण नए समुद्री मार्गों की संभावनाएं बढ़ रही हैं। प्राकृतिक संसाधनों और महत्वपूर्ण खनिजों को लेकर भी अमेरिका, यूरोप, रूस और चीन समेत कई देशों की रुचि बढ़ी है।
भविष्य की राह
22 सितंबर 2026 को हस्ताक्षरित यह समझौता तत्काल सभी प्रावधानों के साथ लागू नहीं हुआ है। इसके लिए डेनमार्क और ग्रीनलैंड में आवश्यक संसदीय प्रक्रियाएं पूरी करनी होंगी। इसके बाद सैन्य सुविधाओं के विस्तार, रक्षा क्षेत्रों के प्रयोग, निगरानी व्यवस्था और संवेदनशील निवेशों से जुड़े प्रावधानों को लागू करने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।
कुल मिलाकर, यह समझौता ग्रीनलैंड की संप्रभुता में बदलाव किए बिना वहां अमेरिका की दीर्घकालिक सैन्य और रणनीतिक भूमिका को विस्तार देता है। साथ ही यह दर्शाता है कि आर्कटिक अब केवल पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों का क्षेत्र नहीं, बल्कि वैश्विक सुरक्षा, सैन्य रणनीति और बदलते शक्ति-संतुलन का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है।