चर्चा में क्यों?
- उत्तराखंड में ग्लेशियल झील विस्फोट बाढ़ (Glacial Lake Outburst Flood—GLOF) के खतरे को कम करने के लिए राज्य की पहली ग्लेशियल झील अर्ली-वॉर्निंग सिस्टम स्थापित की जा रही है।
- यह प्रणाली चमोली जिले की वासुंधरा ताल (Vasundhara Tal) में स्थापित की जा रही है। इसका उद्देश्य ग्लेशियल झील और उसके आसपास होने वाले जलस्तर, मौसम, बर्फ तथा जल प्रवाह में बदलाव की रियल-टाइम निगरानी करना है।
- यह पहल महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तराखंड सहित पूरे हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियल झीलों के विस्तार और उनसे जुड़ी बाढ़ का जोखिम बढ़ रहा है।
ग्लेशियल झील क्या है?
- ग्लेशियर के पीछे हटने या पिघलने से उसके आसपास जमा पानी से बनने वाली झील को ग्लेशियल झील कहा जाता है।
- इन झीलों के किनारे अक्सर बर्फ, मलबे और चट्टानों से बने प्राकृतिक बांध होते हैं। यदि यह बांध अचानक टूट जाता है, तो बड़ी मात्रा में पानी नीचे की ओर तेजी से बहता है। इसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) कहा जाता है।
- GLOF से नदियों का जलस्तर अचानक बढ़ सकता है और इससे निचले क्षेत्रों में बसे गांवों, सड़कों, पुलों, जलविद्युत परियोजनाओं तथा अन्य बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंच सकता है।
उत्तराखंड में ग्लेशियल झीलों की स्थिति
- राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग सेंटर (NRSC) के अनुसार, वर्ष 2023 में उत्तराखंड में 344 ग्लेशियल झीलों की पहचान की गई थी।
- राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने इनमें से 13 ग्लेशियल झीलों को उच्च जोखिम वाली झीलों के रूप में चिन्हित किया है।
- इन 13 झीलों में:
- 5 झीलें Category-A में हैं, जो सबसे उच्च जोखिम वाली श्रेणी है।
- 6 उच्च जोखिम वाली झीलें पिथौरागढ़ में हैं।
- 4 चमोली में हैं।
- 1-1 झील बागेश्वर, टिहरी गढ़वाल और उत्तरकाशी में है।
- वासुंधरा ताल भी इन उच्च जोखिम वाली झीलों में शामिल है।
सर्वेक्षण से रियल-टाइम मॉनिटरिंग तक
- उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (USDMA) ने ग्लेशियल झीलों के अध्ययन और नियमित निगरानी के लिए व्यापक योजना तैयार की है।
- इस प्रक्रिया के दो प्रमुख चरण हैं:
- पहला चरण - वैज्ञानिक सर्वेक्षण: झील की लंबाई, चौड़ाई, गहराई, भू-आकृति तथा जल धारण क्षमता का अध्ययन करना और झील से निकलने वाले संभावित जल प्रवाह का आकलन करना।
- दूसरा चरण - रियल-टाइम निगरानी: झील में सेंसर और अन्य उपकरण स्थापित करके जलस्तर, मौसम, बर्फ तथा जल प्रवाह में होने वाले बदलावों की लगातार निगरानी करना।अब उत्तराखंड इसी दूसरे चरण की ओर बढ़ रहा है।
वासुंधरा ताल में कौन-कौन से सेंसर लगाए जाएंगे?

- वासुंधरा ताल में स्थापित की जा रही प्रणाली विभिन्न पर्यावरणीय और जलवैज्ञानिक मानकों की निगरानी करेगी।
- जलस्तर सेंसर: -झील के जलस्तर में होने वाले सामान्य और असामान्य बदलावों को रिकॉर्ड करेगा।
- ऑटोमेटिक वेदर स्टेशन:-तापमान, आर्द्रता, वर्षा, हवा की गति एवं दिशा, वायुमंडलीय दबाव और प्रकाश की तीव्रता जैसे मौसम संबंधी आंकड़े दर्ज करेगा।
- स्नो-डेप्थ और सब-सर्फेस टेम्परेचर सेंसर: बर्फ की मोटाई तथा सतह के नीचे तापमान में होने वाले बदलावों की निगरानी करेंगे।
- टिल्ट और एक्सेलेरोमीटर सेंसर: चयनित स्थानों पर जमीन या अन्य संरचनाओं की हलचल और कंपन का पता लगाएंगे।
- वाटर-फ्लो सेंसर: - झील से निकलने वाले पानी के प्रवाह में होने वाले बदलावों को रिकॉर्ड करेगा।
प्रणाली कैसे काम करेगी?
- इस अर्ली-वॉर्निंग सिस्टम को सौर ऊर्जा से संचालित किया जाएगा।
- वासुंधरा ताल जैसे दुर्गम उच्च हिमालयी क्षेत्र में मोबाइल नेटवर्क उपलब्ध नहीं होने के कारण डेटा को सैटेलाइट के माध्यम से भेजा जाएगा।
- एक डेटा लॉगर और मॉनिटरिंग डैशबोर्ड सेंसरों से प्राप्त आंकड़ों को रिकॉर्ड करेगा। जब किसी निर्धारित सीमा या Threshold को पार करने वाला असामान्य बदलाव दर्ज होगा, तो सिस्टम अलर्ट उत्पन्न करेगा।
- इससे संभावित खतरे की पहचान पहले की जा सकेगी और संबंधित आपदा प्रबंधन एजेंसियों को समय पर कार्रवाई करने में मदद मिलेगी।
बाथिमेट्रिक सर्वे क्यों महत्वपूर्ण है?
- ग्लेशियल झीलों का बाथिमेट्रिक सर्वे (Bathymetric Survey) झील की गहराई और उसमें मौजूद जल की मात्रा का आकलन करने में मदद करता है।
- उत्तराखंड में छह झीलों का बाथिमेट्रिक सर्वे पूरा किया जा चुका है:
- सरस्वती ताल — चमोली
- वासुंधरा ताल — चमोली
- केदारताल — उत्तरकाशी
- माबांग — पिथौरागढ़
- प्यूंगरु — पिथौरागढ़
- स्युनकती यांकती — पिथौरागढ़
इन आंकड़ों के आधार पर संभावित GLOF की स्थिति में निकलने वाले पानी की मात्रा और बाढ़ के संभावित प्रभाव का आकलन किया जा सकता है।
GLOF का खतरा क्यों बढ़ रहा है?
- हिमालय में बढ़ते तापमान के कारण ग्लेशियरों के पिघलने और पीछे हटने की प्रक्रिया तेज हो सकती है। इससे नई ग्लेशियल झीलों का निर्माण और मौजूदा झीलों का विस्तार हो सकता है।
- ऐसी झीलों के प्राकृतिक बांध कमजोर होने पर अचानक टूटने का खतरा पैदा हो सकता है।
- हाल के वर्षों में हिमालयी क्षेत्र में बाढ़, भूस्खलन, हिमस्खलन और ग्लेशियर से जुड़ी घटनाओं ने इन जोखिमों की निगरानी की आवश्यकता को बढ़ाया है।
हाल की घटनाओं से मिली सीख
- नेपाल में हाल की बाढ़ की घटना के बाद ग्लेशियल झीलों और ग्लेशियर से जुड़ी प्रक्रियाओं की निगरानी पर विशेष ध्यान दिया गया।
- इसी तरह उत्तराखंड में धराली फ्लैश फ्लड के दौरान भी संभावित ग्लेशियल झील टूटने सहित कई संभावित कारणों पर विशेषज्ञों ने चर्चा की थी। हालांकि, उस घटना के सटीक ट्रिगर को लेकर विभिन्न संभावनाएं सामने आई थीं।
- इन घटनाओं ने यह स्पष्ट किया है कि केवल संवेदनशील झीलों की पहचान करना पर्याप्त नहीं है। उनके लगातार वैज्ञानिक और रियल-टाइम मॉनिटरिंग सिस्टम को विकसित करना भी आवश्यक है।
अर्ली-वॉर्निंग सिस्टम का महत्व
- आपदा की पूर्व चेतावनी: -जलस्तर, मौसम और जल प्रवाह में असामान्य बदलाव की पहले पहचान की जा सकती है।
- मानवीय क्षति को कम करना: -समय रहते निचले क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को चेतावनी देकर निकासी की तैयारी की जा सकती है।
- बुनियादी ढांचे की सुरक्षा:- सड़क, पुल, जलविद्युत परियोजनाओं और अन्य महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को संभावित खतरे के बारे में पहले जानकारी मिल सकती है।
- वैज्ञानिक आपदा प्रबंधन: -रियल-टाइम डेटा के आधार पर जोखिम का अधिक वैज्ञानिक आकलन किया जा सकता है।
- हिमालयी पारिस्थितिकी की निगरानी:- लंबे समय में तापमान, बर्फ, जलस्तर और ग्लेशियल झीलों में होने वाले बदलावों को समझने में मदद मिलेगी।
प्रमुख चुनौतियां
- दुर्गम भौगोलिक स्थिति :-उच्च हिमालय में अत्यधिक ऊंचाई, कठिन भू-भाग और खराब मौसम के कारण उपकरणों की स्थापना एवं रखरखाव चुनौतीपूर्ण है।
- संचार व्यवस्था :-मोबाइल नेटवर्क की अनुपलब्धता के कारण सैटेलाइट आधारित संचार व्यवस्था पर निर्भरता रहती है।
- समय पर चेतावनी पहुंचाना :-केवल झील में बदलाव का पता लगाना पर्याप्त नहीं है। सबसे बड़ी चुनौती उस सूचना को समय रहते निचले क्षेत्रों में रहने वाले लोगों तक पहुंचाना है।
- बहु-आपदा जोखिम :-हिमालय में GLOF के साथ-साथ भूस्खलन, हिमस्खलन, अत्यधिक वर्षा और अचानक बाढ़ जैसे कई जोखिम मौजूद हैं। इसलिए एकीकृत आपदा निगरानी आवश्यक है।
आगे की राह
- उत्तराखंड को उच्च जोखिम वाली सभी ग्लेशियल झीलों के लिए चरणबद्ध तरीके से रियल-टाइम मॉनिटरिंग नेटवर्क विकसित करना चाहिए।
- इसके साथ ही सेंसर आधारित डेटा को मौसम पूर्वानुमान, उपग्रह इमेजरी और डिजिटल एलिवेशन मॉडल से जोड़कर बहु-जोखिम पूर्व चेतावनी प्रणाली विकसित की जानी चाहिए।
- स्थानीय समुदायों को चेतावनी मिलने के बाद की कार्रवाई, सुरक्षित निकासी मार्ग और आपदा प्रतिक्रिया के लिए नियमित रूप से प्रशिक्षित किया जाना चाहिए।
- साथ ही, केंद्र और राज्य की आपदा प्रबंधन एजेंसियों, वैज्ञानिक संस्थानों तथा सुरक्षा बलों के बीच डेटा और सूचना साझा करने की व्यवस्था को मजबूत करना आवश्यक है।
निष्कर्ष
- उत्तराखंड का वासुंधरा ताल अर्ली-वॉर्निंग सिस्टम ग्लेशियल झीलों के प्रबंधन में मैपिंग से रियल-टाइम मॉनिटरिंग की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
- हालांकि, प्रभावी आपदा प्रबंधन के लिए केवल सेंसर आधारित निगरानी पर्याप्त नहीं होगी। वैज्ञानिक डेटा, समयबद्ध चेतावनी, मजबूत संचार व्यवस्था, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और त्वरित बचाव तंत्र को एक साथ विकसित करना आवश्यक होगा।
MCQ
Q1 . GLOF के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- GLOF का पूरा नाम Glacial Lake Outburst Flood है।
- यह ग्लेशियल झील के प्राकृतिक बांध के अचानक टूटने से उत्पन्न हो सकता है।
- GLOF से निचले क्षेत्रों में बाढ़ का खतरा उत्पन्न हो सकता है।
उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
A. केवल 1 और 2 B. केवल 2 और 3 C. केवल 1 और 3 D. 1, 2 और 3
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FAQs
1. ग्लेशियल झील विस्फोट बाढ़ (GLOF) क्या है?
उत्तर - GLOF (Glacial Lake Outburst Flood) यानी हिमनदीय झील विस्फोट बाढ़। जब ग्लेशियल झील को रोकने वाला प्राकृतिक बांध अचानक टूट जाता है, तो बड़ी मात्रा में पानी तेजी से नीचे की ओर बहता है, जिससे अचानक बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
2. उत्तराखंड की पहली ग्लेशियल झील अर्ली-वॉर्निंग सिस्टम कहां स्थापित की जा रही है?
उत्तर - यह प्रणाली चमोली जिले की वासुंधरा ताल में स्थापित की जा रही है।
3. ग्लेशियल झील अर्ली-वॉर्निंग सिस्टम का मुख्य उद्देश्य क्या है?
उत्तर - इसका उद्देश्य ग्लेशियल झील के जलस्तर, मौसम, बर्फ, जल प्रवाह और आसपास की गतिविधियों की रियल-टाइम निगरानी करना तथा असामान्य बदलाव होने पर समय रहते अलर्ट जारी करना है।
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