BioE3 क्या है? PLA आधारित जैव-अवक्रमणीय प्लास्टिक की विशेषताएं और भारत के लिए महत्व
चर्चा में क्यों?
केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी ने BioE3 (Biotechnology for Economy, Environment & Employment) के तहत Polylactic Acid (PLA) आधारित जैव-आधारित जैव-अवक्रमणीय प्लास्टिक के व्यावसायिक उपयोग की शुरुआत की।
यह पहल भारत में जैव-आधारित सामग्री, टिकाऊ विनिर्माण और जैव-अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
इस परियोजना को बलरामपुर चीनी मिल्स लिमिटेड [Balrampur Chini Mills Limited (BCML) ]द्वारा आगे बढ़ाया जा रहा है। इसके लिए Biotechnology Industry Research Assistance Council (BIRAC) द्वारा ₹75 करोड़ का अनुदान दिया गया है।
क्या है BioE3 पहल?
BioE3 का पूरा नाम Biotechnology for Economy, Environment & Employment है।
इसका उद्देश्य जैव-प्रौद्योगिकी को प्रयोगशाला अनुसंधान तक सीमित रखने के बजाय उसे उद्योग, टिकाऊ विनिर्माण, रोजगार और आर्थिक विकास से जोड़ना है।
इस पहल के माध्यम से भारत में जैव-विनिर्माण को बढ़ावा देने, नवीन जैव-आधारित उत्पाद विकसित करने और अनुसंधान से व्यावसायिक उत्पादन तक की प्रक्रिया को तेज करने पर जोर दिया जा रहा है।
पॉलीलैक्टिक एसिड (PLA) आधारित जैव-अवक्रमणीय प्लास्टिक क्या है?
पॉलीलैक्टिक एसिड (PLA (Polylactic Acid)) एक जैव-आधारित पॉलिमर है, जिसे नवीकरणीय जैविक स्रोतों से प्राप्त शर्करा को संसाधित करके बनाया जा सकता है।
इस परियोजना में गन्ने जैसे कृषि संसाधनों से प्राप्त शर्करा को टिकाऊ सामग्री में परिवर्तित करने पर जोर दिया गया है।
PLA का उपयोग विभिन्न प्रकार के जैव-आधारित प्लास्टिक और उच्च-मूल्य वाले उत्पादों के निर्माण में किया जा सकता है।
परियोजना की प्रमुख विशेषताएं
इस परियोजना के तहत उत्तर प्रदेश के कुंभि स्थित Balrampur Chini Mills के एकीकृत विनिर्माण परिसर में 100 टन प्रति वर्ष (TPA) क्षमता वाली पायलट-स्तरीय अनुसंधान एवं विकास सुविधा स्थापित की जाएगी।
इस सुविधा का उद्देश्य-
विशेष प्रकार के PLA ग्रेड विकसित करना।
उन्नत PLA सह-पॉलिमर (Co-polymers) विकसित करना।
तकनीकी और आर्थिक व्यवहार्यता से संबंधित आंकड़े तैयार करना।
उत्पादन प्रक्रियाओं का व्यावहारिक ज्ञान विकसित करना।
उत्पादों का परीक्षण और ग्राहक सत्यापन करना।
स्वदेशी तकनीक के विकास को बढ़ावा देना।
बड़े पैमाने पर व्यावसायिक उत्पादन के लिए तकनीक को तैयार करना।
उद्योग, अकादमिक संस्थानों और अनुसंधान संस्थानों के बीच सहयोग बढ़ाना।
बायोटेक्नोलॉजी इंडस्ट्री रिसर्च असिस्टेंस काउंसिल
BIRAC, जो Department of Biotechnology (DBT) के अंतर्गत कार्य करता है, इस परियोजना के लिए ₹75 करोड़ का अनुदान प्रदान कर रहा है।
यह वित्तीय सहायता पायलट स्तर पर PLA और सह-पॉलिमर तकनीकों के अनुसंधान, विकास और विस्तार में मदद करेगी।
इसका उद्देश्य प्रयोगशाला में विकसित तकनीक को औद्योगिक एवं व्यावसायिक उपयोग के लिए तैयार करना है।
अपशिष्ट से संपदा ‘Waste to Wealth’ की अवधारणा
भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग प्रकार के जैविक संसाधन और अपशिष्ट उपलब्ध हैं।
जैव-प्रौद्योगिकी के माध्यम से इन संसाधनों को उपयोगी उत्पादों में बदला जा सकता है।
इससे-
कृषि एवं जैविक अपशिष्ट का बेहतर उपयोग,
नए उद्योगों का विकास,
रोजगार सृजन,
क्षेत्रीय आर्थिक विकास और
पर्यावरणीय स्थिरता को बढ़ावा मिल सकता है।
गन्ने से प्लास्टिक तक नई मूल्य श्रृंखला
इस पहल की एक प्रमुख विशेषता कृषि संसाधनों को गैर-खाद्य एवं उच्च-मूल्य वाले उत्पादों में बदलना है।
गन्ने से प्राप्त शर्करा को केवल खाद्य या पारंपरिक औद्योगिक उपयोग तक सीमित रखने के बजाय उससे लैक्टिक एसिड और आगे PLA जैसे जैव-पॉलिमर तैयार किए जा सकते हैं।
इससे कृषि क्षेत्र और जैव-विनिर्माण उद्योग के बीच एक नई मूल्य श्रृंखला विकसित हो सकती है।
भारत की जैव-अर्थव्यवस्था के लिए महत्व
भारत की जैव-अर्थव्यवस्था वर्ष 2014 में लगभग 10 अरब अमेरिकी डॉलर से बढ़कर लगभग 195 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गई है।
PLA परियोजना जैसी पहल का उद्देश्य इस वृद्धि को अगले चरण तक ले जाना है, जहां अनुसंधान एवं वैज्ञानिक क्षमताओं को व्यावसायिक उत्पादों और बड़े पैमाने के विनिर्माण से जोड़ा जाए।
भारत के लिए इसका महत्व
टिकाऊ विनिर्माण को बढ़ावा:-जैव-आधारित सामग्रियों का विकास पारंपरिक जीवाश्म-आधारित सामग्रियों के विकल्पों को बढ़ाने में मदद कर सकता है।
स्वदेशी तकनीक का विकास :-परियोजना भारत में PLA और उन्नत जैव-पॉलिमर तकनीकों के स्वदेशी विकास को बढ़ावा देगी।
रोजगार के अवसर :-पायलट सुविधाओं, अनुसंधान, उत्पादन और कौशल विकास के माध्यम से रोजगार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं।
कृषि और उद्योग का जुड़ाव :-गन्ने जैसे कृषि संसाधनों को उच्च-मूल्य वाले जैव-आधारित उत्पादों में बदलने से कृषि एवं विनिर्माण क्षेत्र के बीच संबंध मजबूत हो सकते हैं।
जैव-अर्थव्यवस्था का विस्तार :-यह पहल भारत की जैवविनिर्माण (Biomanufacturing)क्षमता को मजबूत करने और नई जैव-आधारित मूल्य श्रृंखलाएं विकसित करने में योगदान दे सकती है।
वोकल फॉर लोकल एण्ड ग्लोबल (Vocal for Local and Global) से संबंध :- इसका उद्देश्य स्वदेशी तकनीकों और उत्पादन क्षमताओं को विकसित कर उन्हें घरेलू बाजार के साथ-साथ वैश्विक बाजारों तक पहुंचाना है।
आगे की राह
भारत में जैव-आधारित विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए अनुसंधान से व्यावसायीकरण तक की पूरी श्रृंखला को मजबूत करना आवश्यक है।
इसके लिए पायलट संयंत्रों, तकनीकी सत्यापन, कुशल मानव संसाधन, उद्योग-अकादमिक सहयोग और बड़े पैमाने पर उत्पादन की क्षमता विकसित करने पर ध्यान देना होगा।
PLA परियोजना इस दिशा में एक उदाहरण प्रस्तुत करती है कि किस प्रकार जैव-प्रौद्योगिकी + कृषि संसाधन + उद्योग + अनुसंधानको जोड़कर टिकाऊ सामग्री और नई आर्थिक मूल्य श्रृंखला विकसित की जा सकती है।