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कलसा-बंडूरी परियोजना

(प्रारंभिक परीक्षा : भारतीय राज्यतंत्र और शासन- संविधान)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 2 : संसद और राज्य विधायिका- संरचना, कार्य, कार्य-संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार एवं इनसे उत्पन्न होने वाले विषय)

संदर्भ

  • महादायी नदी केंद्रीय प्राधिकरण के रूप में ‘जल एवं सद्भाव के लिए प्रगतिशील नदी प्राधिकरण (Progressive River Authority for Water and Harmony : PRAWAH) की टीम ने कलसा-बंडूरी (Kalasa-Banduri) परियोजना के लिए बेलगावी जिले का दौरा किया है।
  • गोवा एवं कर्नाटक अपनी जल आवश्यकताओं के लिए एक-दूसरे पर निर्भर हैं। हालांकि, विगत कुछ वर्षों से दोनों राज्यों के बीच महादायी नदी के जल बंटवारे (कलसा-बंडूरी परियोजना) को लेकर गतिरोध जारी है।

कलसा-बंडूरी परियोजना के बारे में 

  • इस परियोजना को पहली बार 1980 के दशक में प्रस्तावित किया गया था किंतु कर्नाटक, गोवा एवं महाराष्ट्र के बीच विवादित स्थिति के कारण इसे क्रियान्वित नहीं किया जा रहा है।
  • इस योजना के अनुसार, महादायी की सहायक कलसा एवं बंडूरी जल धाराओं पर 11 बैराज बनाए जाने हैं जिसके माध्यम से इस जल को कर्नाटक के सूखा प्रभावित जिलों की ओर मोड़ा जाना है ताकि कर्नाटक के शुष्क उत्तरी मैदानों के शहरों को पीने का पानी उपलब्ध करवाया जा सके।
  • इसका सर्वाधिक लाभ बेलगावी, गडग एवं बागलकोट जिलों के कस्बों के साथ-साथ हुबली व धारवाड़ के जुड़वां शहरों को होगा।

महादायी नदी

  • उद्भव : पश्चिमी घाट में कर्नाटक के बेलगावी जिले के खानपुर तालुक में भीमगढ़ वन्यजीव अभयारण्य से
    • वर्षा आधारित यह नदी गोवा से प्रवाहित होते हुए अरब सागर में मिल जाती है।
  • अन्य नाम : गोवा में मंडोवी 
  • प्रमुख अभयारण्य : सलीम अली पक्षी अभयारण्य मंडोवी नदी में चोराओ द्वीप पर स्थित 
  • प्रमुख सहायक नदियाँ (जलधाराएँ) : कलसा नाला, बंडूरी नाला, सुरला नाला, हल्टर नाला, पोटी नाला, महादायी नाला, पंशीर नाला, बैल नाला, अंधेर नाला।

Kalasa-Banduri-Project

परियोजना के विरोध का कारण एवं नदी बेसिन पर प्रभाव

  • भूमि क्षेत्र का जलमग्न होना : गोवा सरकार के अनुसार, कलसा-बंडूरी जल मोड़ (वाटर डायवर्सन) योजना से लगभग 700 हेक्टेयर वन क्षेत्र जलमग्न हो जाएगा।
    • यदि कर्नाटक जलविद्युत एवं डायवर्सन परियोजना पर आगे बढ़ता है तो डायवर्सन योजना के तहत बनाए जाने वाले बांधों से वन क्षेत्र, सड़क, बांध, बिजली घर, टाउनशिप एवं क्षेत्रीय कार्यालयों आदि के लिए अत्यधिक वन भूमि जलमग्न हो जाएगी।
  • वन क्षेत्र को क्षति : इस परियोजना से कर्नाटक में जलमग्न होने वाली भूमि में से अधिकांश घने जंगल वाले क्षेत्र हैं। गोवा के अनुसार महादायी डायवर्सन एवं पनबिजली परियोजना के लिए वन भूमि को छोड़े जाने के बाद बेलगावी जिले का वन क्षेत्र 13% से 8% रह जाएगा।
  • जैव-विविधता पर प्रभाव : पश्चिमी घाट एक विशाल जैव-विविधता हॉटस्पॉट है, जिसका बड़ा हिस्सा संरक्षित क्षेत्र घोषित है। पूरा पश्चिमी घाट गोवा में वन्यजीवों की सुरक्षित आवाजाही के लिए एक गलियारा प्रदान करता है। कर्नाटक द्वारा महादायी नदी के पानी की दिशा बदलने से वृहद पोषक तत्वों का प्रवाह रुक जाएगा, जिससे महादायी वन्यजीव अभयारण्य के निचले क्षेत्र में विविध वनस्पतियों व जीवों पर नकारात्मक प्रभाव होगा।
  • पेयजल की समस्या : प्रस्तावित जल मोड़ से ज्वारीय आधार जल में वृद्धि होगी। इससे सुरला नदी के किनारे रहने वाले निवासियों पर नदी के पानी के कम होने का असर पड़ेगा और भूमिगत जल का स्रोत भी समाप्त हो जाएगा।
  • पारिस्थितिकीय आपदा का जोखिम : इस परियोजना के परिणामस्वरूप पारिस्थितिकीय आपदा की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी, जिसमें वनस्पति, जीव-जंतु, पहाड़ियां, घाट, मैदान एवं प्रमुख समुद्री जीवन (मैंग्रोव व अन्य प्रजातियां) नष्ट हो जाएंगे।
  • अधिकारों पर प्रभाव : कर्नाटक की ओर से की गई कार्रवाई और प्रयासों के परिणामस्वरूप पारिस्थितिकी एवं पर्यावरण के अधिकार के रूप में आजीविका पर प्रभाव होगा, जो कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 का एक अभिन्न भाग है।
  • आर्थिक क्षति : गोवा भारत के सबसे समृद्ध राज्यों में से एक है। यह प्रति व्यक्ति सबसे अधिक कर देता है और खनन, पर्यटन, कॉर्पोरेट कर, आयकर, उत्पाद शुल्क आदि के साथ-साथ प्रति व्यक्ति सर्वाधिक विदेशी मुद्रा अर्जित करता है। इस परियोजना से गोवा को आर्थिक रूप से नुकसान का सामना करना पड़ सकता है। 

नदी जल से संबंधित विवाद समाधान प्रक्रिया

  • अनुच्छेद 262 : नदियों के जल को लेकर राज्यों में जारी विवाद के समाधान के लिये संसद में दो कानून पारित हुए हैं। संविधान का अनुच्छेद 262 अंतर-राज्यीय जल विवादों के न्याय एवं निर्णय से संबंधित है।
    • इस अनुच्छेद के अंतर्गत संसद ने दो कानून पारित किये हैं- नदी बोर्ड अधिनयम, 1956 तथा अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनयम, 1956। 
  • अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनयम : इसमें केंद्र सरकार को अंतर-राज्यीय नदियों एवं नदी घाटियों के जल के प्रयोग, बंटवारे तथा नियंत्रण से संबंधित दो अथवा दो से अधिक राज्यों के मध्य किसी विवाद के न्याय निर्णय के लिये एक अस्थायी न्यायाधिकरण के गठन की शक्ति प्रदान की गयी है। 
    • इसके तहत गठित न्यायाधिकरण का निर्णय अंतिम होगा जो सभी पक्षों के लिये मान्य होगा।
  • नियत समयावधि : नियमानुसार न्यायाधिकरण को विवाद समाधान के लिये तीन वर्षों का समय दिया जाता है, यद्यपि इस अवधि को अधिकतम दो वर्षों तक बढाया जा सकता है।
    • उल्लेखनीय है कि अब तक न्यायाधिकरणों ने नदी जल विवाद पर अपना निर्णय देने में काफी अधिक समय लिया है।

एकीकृत न्यायाधिकरण का प्रयास

  • वर्तमान में अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद (संशोधन) अधिनियम, 2019 संसद में लंबित है जिसमें सभी जल विवादों पर फैसले के लिये केवल एक अंतर-राज्यीय नदी विवाद न्यायाधिकरण की स्थापना का प्रावधान है। 
    • इस अधिकरण की अनेक खंडपीठ हो सकती हैं।
  • सभी मौजूदा न्यायाधिकरणों को भंग कर दिया जाएगा एवं उन न्यायाधिकरणों में निर्णय लेने के लिये जो मामले लंबित होंगे, उन्हें नए न्यायाधिकरण में स्थानांतरित कर दिया जाएगा। 
  • इस विधेयक में अंतर-राज्यीय जल विवादों को डेढ़ वर्ष की अधिकतम अवधि के भीतर हल करने के लिये केंद्र सरकार द्वारा एक विवाद समाधान समिति (DRC) की स्थापना का प्रावधान है।

भारत के प्रमुख नदी जल विवाद

नदी जल विवाद

संबंधित राज्य

गोदावरी नदी जल विवाद

आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तत्कालीन मध्य प्रदेश, ओडिशा एवं महाराष्ट्र 

कृष्णा नदी जल विवाद

आंध्र प्रदेश, कर्नाटक एवं महाराष्ट्र

नर्मदा नदी जल विवाद

मध्य प्रदेश, गुजरात एवं महाराष्ट्र, राजस्थान 

रावी-व्यास नदी जल विवाद

पंजाब, हरियाणा एवं राजस्थान

कावेरी जल विवाद

केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु एवं पुडुचेरी

कृष्णा नदी जल विवाद- II

कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र

वंसधारा नदी जल विवाद

आंध्र प्रदेश एवं ओडिशा

महानदी जल विवाद अधिकरण

ओडिशा एवं छतीसगढ़

महादाई नदी जल विवाद

गोवा, कर्नाटक एवं महाराष्ट्र

विवाद सुलझाने के अन्य उपाय 

अंतर-राज्यीय परिषद 

  • इसके कार्यान्वयन के लिये संघ सूची की प्रविष्टि- 56 के अनुसार निर्मित नदी बोर्ड अधिनियम, 1956 एक प्रभावी कानून है जिसमें संशोधन की आवश्यकता है।
  • इस अधिनियम के अंतर्गत अंतर-राज्यीय नदियों एवं इनके बेसिनों के विनियमन एवं विकास के लिये बेसिन संगठन स्थापित किया जा सकता है।

मध्यस्थता के लिये प्रयास

  • दक्षिण एशिया के संदर्भ में सिंधु बेसिन की नदियों से जुड़े विवाद के सफलतापूर्वक समाधान में विश्व बैंक ने भारत एवं पाकिस्तान के मध्य अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 
  • इसी तरह की किसी भूमिका का प्रयोग राज्यों के बीच मध्यस्थता के लिये किया जा सकता है।

जल को समवर्ती सूची में शामिल करना

  • वर्ष 2014 में तैयार की गई मिहिर शाह रिपोर्ट में जल प्रबंधन के लिये केंद्रीय जल प्राधिकरण की अनुशंसा की गई है। 
    • संसदीय स्थायी समिति ने भी इस अनुशंसा का समर्थन किया गया है।

संस्थागत मॉडल

  • राष्ट्रीय स्तर पर एक स्थायी तंत्र या संस्थागत मॉडल की आवश्यकता है जिससे न्यायपालिका की सहायता के बिना राज्यों के मध्य उत्पन्न जल विवाद का समाधान किया जा सके। 
  • इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय जल नीति का पालन करना एवं नदियों को जोड़ना भी एक बेहतर प्रयास हो सकता है।
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