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आंध्र प्रदेश में मिले अनेक पुरातात्विक साक्ष्य

प्रारंभिक परीक्षा- समसामयिकी, अय्यमबोटलापल्ली, बोयलापल्ली, देवराय द्वितीय, बोपनपल्ली, वुतलु, कलुजुरत्तनम, गोलाविदीपी का स्तंभ शिलालेख, त्रिपुरांतकम का नायक पत्थर
मुख्य परीक्षा- सामान्य अध्ययन, पेपर-1

संदर्भ:

हाल ही भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को आंध्र प्रदेश के प्रकाशम जिले में कुछ शिलालेख मिले हैं, जिनसे इस क्षेत्र के इतिहास के बारे में जानकारी मिलती है।

archaeological-evidences

मुख्य बिंदु:

  • प्रकाशम जिले में प्राप्त शिलालेखों से अनेक राजवंशों की जानकारी मिलती है।
    • 1262 ई. के एक शिलालेख से कायस्थ राजवंश के गंगाया साहिनी के अंतिम दिनों की। 
    • विजयनगर एवं तेलुगु सभ्यता के शुरुआत की। 
  • गोलाविदीपी के साधारण बस्तियों से लेकर वेंकटाद्रिपलेम के पवित्र परिसर तक, प्रत्येक शिलालेख एक ऐसे युग की झलक देता है।
    • जहां राजा कठोर शक्ति के साथ शासन करते थे और नश्वर मामलों पर देवताओं का नियंत्रण होता था। 
  • बोयालापल्ली से प्राप्त एक अन्य शिलालेख से एक शासक की उदारता की जानकारी मिलती है। 
    • इसने देवताओं और सामंतों को समान रूप से भूमि प्रदान की थी। 
    • यह कार्य इस शासक की अपने शासनकाल के दौरान विश्वास और शासन को संतुलित करने की प्रतिभाशाली क्षमता का प्रमाण है। 

अय्यमबोटलापल्ली:

Ayyambotlapalli

  • अय्यमबोटलापल्ली गांव में प्राप्त यह शिलालेख तेलुगु भाषा में लिखा गया है। 
  • इस पर अंकित तिथि के अनुसार, यह 31 अगस्त 1262 ई. (शक सं. 1184) का है।
  • इसे कायस्थ राजवंश के गंगाया साहिनी ने लिखवाया था।
  • इससे पता चलता है कि गंगाया साहिनी की मृत्यु 1262 ई. में हुई थी।
  • गंगाया साहिनी का संबंध काकतीय राजवंश के राजा गणपति देव के साथ था। 
  • नेलातुरी वेंकटरमणैया द्वारा लिखित पुस्तक के अनुसार, कायस्थ राज्य का विस्तार तेलंगाना से कर्नाटक तक था;
    • तेलंगाना के नलगोंडा जिले में स्थित पनुगल्लू से लेकर कर्नाटक में कोलार के पास चिंतामणि तक।
  • शिलालेख से पता चलता है कि सत्रय्या ने भगवान श्रीगिरि (श्रीशैलम के मल्लिकार्जुन देव) को सदा-सनकम और गुडुरु गांव (सभी करों से छूट सहित) दान में दिया था।
    • सत्रय्या ने यह दान गंगाया साहिनी (1239-1257 ई.) के कहने पर चंद्रग्रहण के दिन किया था।
  • इस दान की सुरक्षा की जिम्मेदारी हॉलिसेट्टी को सौंपी गई थी।

बोयलापल्ली:

  • बोयालापल्ली गांव में 12वीं शताब्दी का एक और शिलालेख मिला है।
  • इसमें गंगाया साहिनी द्वारा त्रिपुरांतकम के देवता मूलस्थान देव ( Mulasthana Deva) के सम्मान में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम 'अंगारंगभोग' (angaarangabhogas) का उल्लेख है। 
    • इस कार्यक्रम के दौरान गंगाया साहिनी ने रेडलापल्ली और बोयालापल्ली गांवों को दान में दिया। 
  • बोयालापल्ली गांव के पास टैंक में पाए गए शिलालेख से मिले संकेतों के अनुसार, 
    • गंगाया साहिनी ने मकर संक्रांति के अवसर पर काकतीय राजा गणपति देव, उनके माता-पिता, उनकी दादी और स्वयं की उत्कृष्टता हेतु भूमि दान की थी।
    • यह शिलालेख तेलुगु भाषा में लिखा गया है।
    • इस पर अंकित तिथि के अनुसार, यह 29 दिसंबर 1250 ई. (शक सं. 1172) का है।  
    • यह शिलालेख गंगाया साहिनी के इतिहास की जानकारी का एक प्राथमिक स्रोत है।

देवराय द्वितीय:

  • गंगाया साहिनी के शासन के दो शताब्दियों बाद प्रकाशम जिले पर विजयनगर के राजा देवराय द्वितीय का शासन था। 
  • इसकी पुष्टि पोन्नलाबैलु गांव के बाहर नल्लामाला जंगल में मिले एक शिलालेख से होती है।
  • यह शिलालेख तेलुगु भाषा में लिखा गया था।
  • इस पर अंकित तिथि के अनुसार, यह 18 अक्टूबर 1436. (शक सं. 1358) का है।
  • इस शिलालेख में राजा द्वारा श्रीपर्वत के देवता मल्लिकार्जुन देव को भूमि दान करने का उल्लेख है।

प्रारंभिक तेलुगु शिलालेख – बोपनपल्ली:

  • प्रकाशम जिले में 8वीं और 9वीं शताब्दी के कुछ प्रारंभिक तेलुगु शिलालेख सुरक्षित हैं। 
  • ये लेख बोपनपल्ली गांव (रामचंद्रपुरम-अग्रहरम) के कृषि क्षेत्रों में मिले पत्थर के टुकड़ों पर लिखे गए हैं। 
  • इनकी भाषा तेलुगु है। 
  • इन लेखों के अनुसार, भगवान को भूमि और एक घर दान किया गया था।
  • शिलालेख पर एक शब्द 'पन्नासा' लिखा है, जिसका अर्थ आर्द्रभूमि है । 
  • शिलालेख के अनुसार, डांडियामा द्वारा आर्द्रभूमि का एक टुकड़ा और एक घर भगवान श्री उमरवैयिदिस्वर को दान में दिया गया था। 
    • भगवान की प्रशंसा कैलासभगवंता के रूप में की गई। 
    • यह दान उस समय हुआ, जब ‘मकरध्वज’ की उपाधि धारण करने वाले श्री त्रिपुरांतक भटालू इस क्षेत्र पर शासन कर रहे थे।
  • शिलालेख में आगे 'मंडुग्राम' का उल्लेख है।
  • एक अन्य शिलालेख में शासक की उपाधि ‘समेयारादित्य त्रिलोकादित्य’ बताई गई है। 
  • इन दोनों शिलालेखों के अतिरिक्त चार अन्य शिलालेख भी उसी गांव में पाए गए हैं। 

वुतलु:

  • 'वुतलु' का अर्थ है; भूमि का एक टुकड़ा। 
    • इस पर स्थानीय उपयोग के अनुसार 10 बोरी धान की खेती की जा सकती है। 
  • ASI ने एक ही गांव में कुल पांच शिलालेखों की पहचान की है और उन्होंने उन पर लिखी जानकारी को डिकोड किया है।
  • 8वीं और 9वीं शताब्दी के दो खंडित तेलुगु शिलालेख गोलाविदीपी गांव के कृषि क्षेत्रों में पाए गए हैं। 
    • ये शिलालेख अब तक खोजे गए सबसे प्राचीन शिलालेख हैं।
  • ये शिलालेख तेलुगु भाषा और लिपि की उत्पत्ति की पहचान करने में सहायक हो सकते हैं। 
  • 8वीं शताब्दी के एक शिलालेख के अनुसार, श्री कामुलकोली द्वारा कोटिपुरा के कुलभट्ट नामक ब्राह्मण को 6 वुटलू भूमि दान में दिया गया था। 
  • दूसरे शिलालेख में 9वीं शताब्दी के राजा श्री विजादी के शासनकाल का उल्लेख है।
  • वेंकटाद्रि पालेम गांव में सड़क के किनारे पाए गए एक स्लैब पर उत्कीर्ण एक और शिलालेख तेलुगु भाषा में लिखा गया है।
    • इस पर अंकित तिथि के अनुसार, यह 19 अप्रैल 1482 . (शक सं. 1404) का है। 
    • महामंडलेश्वर अनिवरनसिम्हारावु रामेरायदेव महाराजु द्वारा अपनी माता और पिता सिंगरय्या के उत्कृष्टता हेतु सिंगावरम गांव को दान में दिया गया था। 
    • इस गांव से प्राप्त 'कट्टनम', 'कनिके' और 'वेट्टी' जैसे करों को वसूलने का अधिकार भी दान प्राप्तकर्ता को दे दिया गया।

कलुजुरत्तनम:

  • बोयालापल्ली गांव में तेलुगु शिलालेख मिला है। 
    • इस पर अंकित तिथि के अनुसार, यह 15 सितंबर 1578 ई. (शक सं. 1500) का है।  
    • इसमें वोबप्पा के भाई और वेलिगोटी के पेद्दा तिम्मनयानी के बेटे कोंडाप्पनयनी द्वारा चंद्र ग्रहण के अवसर पर गांव में निम्नलिखित कार्य करवाने का उल्लेख है;
    • एक मंदिर का निर्माण
    • भगवान विरुपाक्षदेव की स्थापना
      • मंदिर की रंगाई
      • एक टैंक की खुदाई
      • एक बांध का निर्माण 
  • इसमें बोयालापल्ली, गोलादीपी, गणपरम जैसे गांवों में निरंतर दीपक जलाने और भगवान को प्रसाद चढ़ाने के लिए भूमि को दान में दिए जाने का उल्लेख है।

गोलाविदीपी का स्तंभ शिलालेख:

  • गोलाविदीपी (यारागोंडापलेम अंडाल) गांव के खेतों में तेलुगु भाषा में लिखा 16 वीं शताब्दी का एक स्तंभ लेख मिला है। 
  • इसमें त्रिपुरांतकम के एक बाग़ में गुडुरु के जंगम मल्लया द्वारा एक टैंक के निर्माण और एक कुएं की खुदाई का उल्लेख है। 
    • जंगम मल्लया के बारे में विस्तृत विवरण अभी तक ASI ने नहीं दिया है।
  • गोलाविदीपी में 9वीं शताब्दी का तेलुगु भाषा में लिखा एक और क्षतिग्रस्त प्रस्तर लेख मिला है।

त्रिपुरांतकम का नायक शिलालेख:

  • त्रिपुरांतकम का नायक शिलालेख एक स्लैब पर पर तेलुगु भाषा में लिखा गया है। 
    • इस पर अंकित तिथि के अनुसार, यह 20 अप्रैल 1449 . (शक सं. 1371) का है।
    • इसमें पुल्लालचेरुवु के युद्ध में पोगिरेड्डी के पुत्र तिमा की मृत्यु का उल्लेख है। 
    • इसमें पुलालाचेरुवु (नाम नहीं लिखा है) और मल्लिकार्जुन देव के राजाओं का भी उल्लेख है।

प्रारंभिक परीक्षा के लिए प्रश्न-

प्रश्न- बोयालापल्ली शिलालेख के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए।

  1. यह शिलालेख 12वीं शताब्दी का है।
  2. इसमें गंगाया साहिनी द्वारा त्रिपुरांतकम के देवता मूलस्थान देव के सम्मान में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम 'अंगारंगभोग' का उल्लेख है। 
  3. इस कार्यक्रम के दौरान गंगाया साहिनी ने रेडलापल्ली और बोयालापल्ली गांवों को दान में दिया। 

नीचे दिए गए कूट की सहायता से सही उत्तर का चयन कीजिए। 

(a) केवल 1 और 2

(b) केवल 2 और 3

(c) केवल 1 और 3

(d) 1, 2 और 3

उत्तर- (d)

मुख्य परीक्षा के लिए प्रश्न-

प्रश्न- हाल ही में पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा आंध्र प्रदेश में अनेक पुरातात्विक साक्ष्यों की खोज की गई है। ये साक्ष्य आंध्र प्रदेश के विस्तृत इतिहास की जानकारी देते हैं। विवरण प्रस्तुत कीजिए।

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