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UPSC Prelims 2024 Answer Key with Detailed Solution

शहरी बाढ़

सन्दर्भ

बेंगलुरु के एक अंडरपास में महिला की मृत्यु डूब कर हो गई जिसने शहरी क्षेत्रों में बाढ़ प्रबन्धन को लेकर चिंताएं बढ़ा दी है।

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शहरी बाढ़ क्या है? 

  • शहरी बाढ़ से अभिप्राय घनी आबादी वाले क्षेत्रों में, भूमि या संपत्ति के जलमग्न होने की स्थिति से है जो सामान्यतः उस समय उत्पन्न होती है जब वर्षा के कारण हुए जलजमाव को उस क्षेत्र के जल निकासी प्रणालियों द्वारा तीव्रता से नहीं निकाला जा पाता है। 
  • इसका मुख्य कारण अनियोजित शहरीकरण है जो बाढ़ की तुंगता को 1.8 से 8 गुणा और बाढ़ की मात्रा को 6 गुणा बढ़ा देती है। 
  • भारत में शहरीकरण की दर बहत तीव्र गति से बढ़ रही है, जिसके कारण सीमित भूमि पर जनसंख्या का दबाव बढ़ता जा रहा है। एक अनुमान के अनुसार वर्ष 2030 तक देश की लगभग 41% आबादी शहरी क्षेत्रों में निवास कर रही होगी। 
  • हालाँकि, जिस तेजी जनसंख्या का दबाव बढ़ रहा है शहरी नियोजन तंत्र भी उसी गति से विकसित नहीं हुआ है। जिसके कारण अनियोजित विकास और जलवायु परिवर्तन शहरी बाढ़ जैसे आपदाओं का कारण बन रहे हैं, जिन पर गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है।

वर्ष 2000 के बाद कुछ शहरों में आई बाढ़

  • 2015 और 2022 में बेंगलुरु, 2000 और 2020 में हैदराबाद, 2001 और 2020 में अहमदाबाद, 2002, 2003, 2009 और 2010 में दिल्ली, 2004 और 2015 में चेन्नई, 2005 में मुंबई, 2006 में सूरत, 2007 में कोलकाता और 2014 में श्रीनगर और इन जैसी तमाम शहरों में इसकी बारम्बारता बढ़ती जा रही है।
  • नीति आयोग द्वारा शहरी नियोजन क्षमता पर एक विश्लेषण के अनुसार, 7933 शहरी बस्तियों में से सिर्फ 63% के पास मास्टर प्लान है, जो दर्शाता है कि शहरी नियोजन पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है।
  • जलवायु परिवर्तन के कारण भारत में शहरी बाढ़ हर वर्ष होने वाली घटना बन गई है। 
  • ऐसा बारिश के दिनों में कमी के कारण भी है।

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भारत में शहरी बाढ़ के प्रमुख कारण

  • प्राकृतिक निकासों का अतिक्रमण: जनसंख्या के अत्यधिक दबाव के कारण शहरों की मुख्य भूमि पर दबाव बढ़ता जा रहा है जिसकी पूर्ति के लिए जल के प्राकृतिक निकास जैसे झीलों, आर्द्रभूमि तथा नदी के तटवर्ती क्षेत्रों आदि का अतिक्रमण बड़े पैमाने पर किया जा रहा है।
  • जलवायु परिवर्तन: वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन ने भी वर्षा के पैटर्न को बदल दिया है जिसके कारण सीमित अवधि में अत्यधिक वर्षण ने भी बाढ़ की बारम्बारता बढ़ा दी है। 
  • शहरी ऊष्मा द्वीप या ‘अर्बन हीट आइलैंड’ प्रभाव:एक सीमित क्षेत्र में अत्यधिक मानवीय गतिविधियों के कारण शहर में तापमान तुलनात्मक रूप से काफी बढ़ जाता है जो अचानक और तीव्र वर्षा का कारण बनती है।  
  • अपशिष्ट प्रबंधन की कमी: भारत में अभी अपशिष्ट प्रबन्धन उचित रूप से संचालित नहीं की जाती है जिसके कारण बिना उचित संग्रह और उपचार के इनका निस्तारण किया जाता है जो कहीं न कहीं जल निकास के कारकों को प्रभावित करता है। 
  • वनों की कटाई के साथ खुली भूमि का न होना: शहरी क्षेत्रों में भूमि के लिए अंधाधुंध वन काटे गये हैं और साथ ही मिट्टी युक्त भूमि जो वर्षा जल सोखने में सहायक होते हैं को भी कंक्रीट से ढंक दिया गया है। 
  • अन्य कारण: उपरोक्त कारणों के आलावा भी अवैध खनन, अत्यधिक पर्यटन, जागरूकता की कमी, सामुदायिक सहयोग का आभाव और राजनीतिक और प्रशासनिक उदासीनता आदि भी इसके कारणों में रखे जा सकते हैं। 

शहरी बाढ़ के प्रभाव:

  • शहरी बुनियादी ढांचे को नुकसान।
  • जान-माल की क्षति।
  • जलीय और वेक्टर जनित बीमारियों के संपर्क में आने से महामारी का खतरा ।
  • पानी की गुणवत्ता ख़राब होना।
  • आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान, औद्योगिक गतिविधि आदि से होने वाले आर्थिक नुकसान।
  • जनसंख्या विस्थापन।
  • शॉर्ट सर्किट से संबंधित दुर्घटनाएं जैसे आग लगना आदि।

शहरी बाढ़ पर राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के कार्य

NDMA

  • सभी शहरी केंद्रों में पूर्व चेतावनी देना और राष्ट्रीय जल-मौसम विज्ञान नेटवर्क स्थापित करना। 
  • रीयल-टाइम वर्षा डेटा एकत्र करने के लिए स्थानीय नेटवर्क बनाने के लिए आईएमडी मुख्यालय में “स्थानीय नेटवर्क सेल” स्थापित करना।
  • वाटरशेड के आधार पर शहरी क्षेत्रों के लिए वर्षा पूर्वानुमान के लिए एक ढांचा तैयार करें और वाटरशेड के अनुसार शहरों और कस्बों को उप-विभाजित करना।
  • वाटरशेड और वार्डों के आधार पर वर्तमान तूफानी जल निकासी प्रणाली की एक सूची विकसित करना।
  • प्रत्येक वर्ष 31 मार्च तक मानसून से पहले सभी प्रमुख नालों की सफाई कर दी जानी चाहिए।
  • वर्षा जल संचयन शहरी क्षेत्र में हर निर्माण की एक मानक विशेषता होनी चाहिए।
  • सार्वजनिक पार्कों की योजना में रेन गार्डन अवधारणा शामिल होगी।
  • जल और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन परस्पर क्रिया और एकीकृत योजना।

आगे की राह:

  • जल निकासी प्रबंधन : नीति और कानून में समुचित बदलाव लाकर आपातकालीन जल निकासी योजना और वाटरशेड प्रबंधन को अनिवार्य किया जाना चाहिए।
  • स्पंज सिटीज का निर्माण : ऐसे स्पंज शहरों का विकास किया जाना चाहिए जो वर्षा जल को अवशोषित करने और इसके उपयोग करने की क्षमता बढ़ाने के लिए डिज़ाइन किया गया हो। वर्षा जल को स्पंज शहरों द्वारा अवशोषित किया जाता है, जहां इसे महानगरीय जलभृतों में प्रवेश करने से पहले मिट्टी द्वारा व्यवस्थित रूप से फ़िल्टर कर दिया जाता हो।
  • आर्द्रभूमि प्रबंधन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, और स्थानीय समुदायों को इसके संरक्षण में शामिल करने की आवश्यकता है।
  • समग्र प्रबंधन: केवल नगर निगम के द्वारा शहरी बाढ़ को नियंत्रित कर पाना संभव नहीं है। इसके लिए समय, प्रयास और धन के समन्वित और लक्षित निवेश किया जाना चाहिए।
  • जल संवेदनशील शहरी डिजाइन: इन तकनीकों में भूगोल का अध्ययन, भूमि के प्रकार (पारगम्य या अभेद्य), प्राकृतिक जल निकास और बहुत कम पर्यावरणीय क्षति शामिल होते हैं।
  • सरकार की पहल: कायाकल्प और शहरी परिवर्तन के लिए अटल मिशन (अमृत- AMRUT),  राष्ट्रीय विरासत शहर विकास और विस्तार योजना (हृदय), और स्मार्ट शहर मिशन।
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