संदर्भ
- बच्चों की आँखों का स्वास्थ्य उनके शारीरिक, मानसिक और शैक्षणिक विकास से सीधे जुड़ा हुआ है। स्पष्ट दिखाई देना केवल पढ़ने-लिखने के लिए ही नहीं, बल्कि आसपास की दुनिया को समझने, आत्मविश्वास विकसित करने और स्वतंत्र जीवन की नींव तैयार करने के लिए भी आवश्यक है। इसके बावजूद, अनेक बच्चों में दृष्टि संबंधी समस्याओं की पहचान समय पर नहीं हो पाती। चिंताजनक बात यह है कि कई मामलों में बच्चा स्वास्थ्य सेवाओं के संपर्क में होने के बावजूद उचित जाँच और उपचार से वंचित रह जाता है।
- विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, दुनिया भर में लाखों बच्चे दृष्टिबाधिता से प्रभावित हैं। प्रस्तुत आँकड़ों के मुताबिक, लगभग 1.9 करोड़ बच्चों को किसी न किसी स्तर की दृष्टि संबंधी समस्या है, जिनमें करीब 14 लाख बच्चे दृष्टिहीन हैं। भारत में भी लगभग तीन लाख बच्चों के दृष्टिहीन होने का अनुमान व्यक्त किया गया है। इनमें से अनेक मामलों में समय पर पहचान और उचित उपचार से दृष्टिबाधिता को रोका जा सकता है या उसके प्रभाव को कम किया जा सकता है।
समय पर पहचान क्यों है जरूरी?
- जन्म के समय शिशु की दृष्टि प्रणाली पूरी तरह विकसित नहीं होती। जीवन के शुरुआती वर्षों में आँखों और मस्तिष्क के बीच समन्वय से दृष्टि का विकास होता है। इस दौरान यदि मस्तिष्क तक स्पष्ट दृश्य संकेत नहीं पहुँचते, तो एम्ब्लायोपिया (Amblyopia), जिसे सामान्य भाषा में लेजी आई या कमजोर दृष्टि कहा जाता है, विकसित हो सकता है। यदि इसका उपचार समय पर नहीं किया जाए, तो दृष्टि की क्षमता स्थायी रूप से प्रभावित हो सकती है।
- बचपन में मोतियाबिंद, भेंगापन, रेटिनोब्लास्टोमा (आँख का कैंसर) और अपवर्तन संबंधी दोष जैसी समस्याओं की शीघ्र पहचान विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। छोटे बच्चे अक्सर यह बता नहीं पाते कि उन्हें स्पष्ट दिखाई नहीं दे रहा है। कई बार माता-पिता भी बच्चे के व्यवहार को सामान्य विकासात्मक अंतर मान लेते हैं या सोचते हैं कि उम्र बढ़ने के साथ समस्या अपने आप ठीक हो जाएगी। इसलिए बच्चों की आँखों की जाँच केवल शिकायत होने पर नहीं, बल्कि नियमित स्वास्थ्य परीक्षण का हिस्सा होनी चाहिए।
स्वास्थ्य व्यवस्था में मौजूद कमियाँ
- भारत में बच्चों के स्वास्थ्य की देखभाल के लिए टीकाकरण सेवाओं, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, आशा कार्यकर्ताओं, स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रमों और राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (RBSK) का व्यापक नेटवर्क मौजूद है। आरबीएसके का उद्देश्य जन्म से 18 वर्ष तक के बच्चों में जन्मजात विकारों, बीमारियों, पोषण संबंधी कमियों और विकासात्मक देरी सहित विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं की पहचान तथा प्रबंधन करना है।
- इसके बावजूद, बच्चों की आँखों की जाँच और उपचार के बीच अंतर बना हुआ है। कई बार प्रारंभिक जाँच में समस्या सामने आने के बाद भी बच्चा विशेषज्ञ चिकित्सक तक नहीं पहुँच पाता। इसके पीछे अस्पताल की दूरी, आर्थिक कठिनाइयाँ, माता-पिता में जागरूकता की कमी, चश्मों की उपलब्धता में देरी और रेफरल व्यवस्था की जटिलताएँ हो सकती हैं।
- कर्नाटक के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग की वार्षिक रिपोर्ट 2023–24 के अनुसार, सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में 6 से 16 वर्ष की आयु के 62,45,424 बच्चों की जाँच की गई। उपलब्ध विवरण के अनुसार, लगभग 1.2 लाख बच्चों को चश्मे प्रदान किए गए। यह उदाहरण दर्शाता है कि बड़े स्तर पर जाँच होने के बावजूद बच्चों की आवश्यकताओं के अनुरूप उपचार और सहायता सुनिश्चित करना एक अलग चुनौती है।
- यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि जाँच किए गए बच्चों और चश्मा प्राप्त करने वाले बच्चों की संख्या के बीच अंतर अपने आप में यह साबित नहीं करता कि बाकी सभी बच्चों को उपचार नहीं मिला। फिर भी, ऐसे आँकड़े जाँच, निदान, रेफरल और उपचार के बीच की पूरी प्रक्रिया का नियमित मूल्यांकन करने की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं।
प्रारंभिक जाँच को स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ना होगा
- बच्चों में दृष्टि संबंधी समस्याओं की पहचान के लिए हर बार महँगे उपकरणों या जटिल परीक्षणों की आवश्यकता नहीं होती। प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी कुछ सरल परीक्षणों और व्यवहार संबंधी संकेतों के माध्यम से भी संभावित समस्याओं का पता लगा सकते हैं।
- रेड रिफ्लेक्स टेस्ट इसका एक उदाहरण है। डायरेक्ट ऑप्थैल्मोस्कोप की मदद से किए जाने वाले इस परीक्षण से मोतियाबिंद और आँख के कुछ गंभीर रोगों के संकेत मिल सकते हैं। इसे नवजात शिशुओं और छोटे बच्चों की नियमित स्वास्थ्य जाँच में शामिल करने से कई समस्याओं की पहचान पहले की जा सकती है। हालाँकि, असामान्य परिणाम आने पर विशेषज्ञ द्वारा विस्तृत जाँच आवश्यक होती है।
- इसी प्रकार, आशा कार्यकर्ताओं, नर्सों और आरबीएसके की मोबाइल स्वास्थ्य टीमों को यह प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए कि वे बच्चे की दृष्टि संबंधी प्रतिक्रियाओं पर ध्यान दें। उदाहरण के लिए,
- क्या बच्चा रोशनी या चलती वस्तु को अपनी आँखों से देखता और उसका पीछा करता है?
- क्या उसकी आँखों में असामान्य गति दिखाई देती है?
- क्या दोनों आँखें एक दिशा में ठीक से काम करती हैं?
- वस्तुतः ऐसे संकेत आगे की जाँच की आवश्यकता पहचानने में मदद कर सकते हैं।
जाँच से उपचार तक मजबूत हो व्यवस्था
- केवल स्क्रीनिंग बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। यह भी सुनिश्चित करना होगा कि जाँच में समस्या सामने आने पर बच्चे को समय पर उचित उपचार मिले। इसके लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, जिला अस्पतालों और विशेषज्ञ नेत्र चिकित्सा संस्थानों के बीच स्पष्ट रेफरल व्यवस्था जरूरी है।
- डिजिटल स्वास्थ्य प्रणालियों के माध्यम से बच्चों की जाँच, विशेषज्ञ से मिलने की तारीख और उपचार की स्थिति का रिकॉर्ड रखा जा सकता है। इससे उन बच्चों की पहचान करना आसान होगा, जो रेफरल के बाद आगे की चिकित्सा प्रक्रिया से छूट जाते हैं। दूरस्थ नेत्र चिकित्सा सेवाएँ यानी टेली-ऑप्थैल्मोलॉजी भी दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले परिवारों को विशेषज्ञों से जोड़ने में सहायक हो सकती हैं।
- इसके साथ ही, माता-पिता को जागरूक करना आवश्यक है कि आँखों की जाँच के लिए बच्चे के स्कूल जाने या अपनी समस्या स्वयं बताने तक इंतजार नहीं करना चाहिए। नियमित स्वास्थ्य मुलाकातों के दौरान दृष्टि संबंधी जाँच के बारे में पूछना और चिकित्सक की सलाह के अनुसार परीक्षण कराना उपयोगी हो सकता है।
स्कूलों और समुदाय की भी अहम भूमिका
- स्कूलों में नियमित दृष्टि जाँच, जरूरतमंद बच्चों को समय पर चश्मे उपलब्ध कराना और शिक्षकों को दृष्टि संबंधी समस्याओं के सामान्य संकेतों की जानकारी देना महत्त्वपूर्ण कदम हैं।
- यदि कोई बच्चा बोर्ड देखने में कठिनाई महसूस करता है, किताब को बहुत पास रखकर पढ़ता है या पढ़ाई के दौरान बार-बार आँखें मलता है, तो उसे केवल पढ़ाई में कमजोर मानने के बजाय दृष्टि परीक्षण की सलाह दी जानी चाहिए।
- ग्रामीण और वंचित समुदायों में सामुदायिक स्वास्थ्य शिविर तथा जागरूकता अभियान भी मददगार हो सकते हैं। हालाँकि, शिविरों में जाँच के बाद उपचार और अनुवर्ती देखभाल की व्यवस्था सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है।
निष्कर्ष
- बच्चों में दृष्टिबाधिता की रोकथाम के लिए स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच बढ़ाने के साथ-साथ मौजूदा व्यवस्था की प्रभावशीलता सुधारना भी आवश्यक है। नियमित जाँच, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी, जागरूक अभिभावक, मजबूत रेफरल प्रणाली और समय पर उपचार आदि सभी मिलकर बच्चों की दृष्टि की रक्षा कर सकते हैं।
- वस्तुतः लक्ष्य केवल यह नहीं होना चाहिए कि कितने बच्चों की जाँच की गई, बल्कि यह भी होना चाहिए कि कितनी समस्याओं की समय पर पहचान हुई, कितने बच्चों को उपचार मिला और कितने बच्चों की दृष्टि सुरक्षित रखने में सफलता मिली।
यद्यपि किसी बच्चे की दृष्टि संबंधी समस्या की समय रहते पहचान उसके जीवन की दिशा बदल सकती है। दृष्टि की रक्षा करना केवल चिकित्सा का विषय नहीं, बल्कि बच्चों की शिक्षा, आत्मनिर्भरता, समान अवसर और बेहतर भविष्य सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है।