
मध्यस्थता की परिभाषा:

- इसमें मुकदमा-पूर्व मध्यस्थता, ऑनलाइन मध्यस्थता, सामुदायिक मध्यस्थता और सुलह जैसी प्रक्रियाएँ शामिल हैं।
- विवाद के समाधान के लिए एक तीसरे पक्ष (मध्यस्थ) की सहायता ली जाती है।
मुकदमेबाजी से पहले स्वैच्छिक मध्यस्थता:
- सिविल या वाणिज्यिक विवादों को अदालत में ले जाने से पहले मध्यस्थता के माध्यम से हल करने का प्रयास करना होगा।
मध्यस्थता के लिए अनुपयुक्त विवाद:
- नाबालिगों या मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्तियों से जुड़े विवाद।
- आपराधिक मामलों से संबंधित विवाद।
- तीसरे पक्ष के अधिकारों को प्रभावित करने वाले विवाद।
- केंद्र सरकार समय-समय पर इस सूची में संशोधन कर सकती है।
प्रादेशिक क्षेत्राधिकार:
- यदि पक्षों ने कोई विशेष व्यवस्था न की हो, तो मध्यस्थता उसी क्षेत्र में होगी जहां संबंधित न्यायालय या अधिकरण स्थित है।
मध्यस्थता की समय-सीमा:
- 120 दिनों के भीतर मध्यस्थता प्रक्रिया पूरी होनी चाहिए।
- पक्षों की सहमति से इसे 60 दिनों तक बढ़ाया जा सकता है।
- कोई भी पक्ष दो सत्रों के बाद मध्यस्थता से हट सकता है।
भारतीय मध्यस्थता परिषद (MCI):
- इसमें एक अध्यक्ष, दो पूर्णकालिक सदस्य (ADR विशेषज्ञ), एक अंशकालिक सदस्य (विधि या व्यय सचिव) और तीन पदेन सदस्य होंगे।
मध्यस्थता सेवा प्रदाताओं की परिभाषा:
- MCI द्वारा अधिकृत निकाय या संगठन मध्यस्थता कर सकते हैं।
- विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के तहत गठित प्राधिकरण भी मध्यस्थता करने के लिए अधिकृत होगा।
मध्यस्थता के निर्णय की वैधता (Enforceability):
- मध्यस्थता से हुआ समझौता न्यायालय के निर्णय के समान बाध्यकारी होगा।
- 90 दिनों के भीतर इसे सक्षम न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।
- धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार, छद्मरूपण (Impersonation) या अनुपयुक्त विवाद के आधार पर इसे चुनौती दी जा सकती है।
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