चर्चा में क्यों ?
हाल ही में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा खजुराहो के जवारी मंदिर में भगवान विष्णु की बलुआ पत्थर से बनी बिना सिर वाली ऐतिहासिक प्रतिमा को पुनः स्थापित करने की योजना पर काम शुरू किया गया है।

खजुराहो के मंदिर
- मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में स्थित खजुराहो के मंदिर भारतीय कला, वास्तुकला और संस्कृति के सबसे उत्कृष्ट और समृद्ध प्रतीकों में से एक हैं।
- 10वीं और 12वीं शताब्दी के बीच चंदेल शासकों के संरक्षण में निर्मित यह मंदिर समूह उत्तर भारतीय नागर शैली की वास्तुकला का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है।
- यह स्थल न केवल अपनी बारीक मूर्तिकला और नक्काशी के लिए जाना जाता है, बल्कि धार्मिक सहिष्णुता और दार्शनिक गहराई का भी अद्भुत संगम है।
खजुराहो का ऐतिहासिक उद्भव और चंदेल राजवंश
- खजुराहो का ऐतिहासिक संबंध प्रागैतिहासिक काल से रहा है, जहाँ मध्य-पाषाण और नव-पाषाण काल के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
- इस क्षेत्र में किसी संगठित नगर या स्थापत्य निर्माण का स्पष्ट प्रमाण 900 ईस्वी के बाद ही दिखाई देता है।
- 900 ईस्वी के आसपास जब चंदेल वंश के स्थानीय सरदारों ने अपनी राजनीतिक शक्ति और समृद्धि का विस्तार किया, तब उन्होंने खजुराहो में विशाल मंदिरों का निर्माण शुरू करवाया।
- चंदेल शासकों ने इन मंदिरों को अपनी धार्मिक भक्ति, राजकीय प्रभुत्व, राजनीतिक मान्यता और सांस्कृतिक उपलब्धियों को प्रदर्शित करने के उद्देश्य से बनवाया था।
- ऐतिहासिक साक्ष्यों और जनश्रुतियों के अनुसार, यह परिसर लगभग 13 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ था और यहाँ कुल 85 मंदिर निर्मित किए गए थे।
- चंदेलों की राजनीतिक शक्ति कमजोर होने के बाद भी 14वीं शताब्दी तक खजुराहो एक प्रमुख और पवित्र धार्मिक केंद्र के रूप में बना रहा।
स्थापत्य कला और वास्तुकला की मुख्य विशेषताएँ
- खजुराहो के मंदिर उत्तर भारतीय नागर शैली की वास्तुकला के विकास के उच्चतम चरण का प्रतिनिधित्व करते हैं।
- इन मंदिरों का निर्माण ऊंचे चबूतरों पर किया गया है, जिन्हें स्थापत्य की भाषा में 'जगती' कहा जाता है।
- मंदिरों की मुख्य विशेषता उनके ऊंचे शिखर और उनके चारों ओर बने छोटे सहायक शिखर हैं, जिन्हें 'उरुश्रृंग' कहा जाता है। ये शिखर कैलाश पर्वत की श्रंखलाओं का आभास कराते हैं।
- लक्ष्मण मंदिर और विश्वनाथ मंदिर जैसे प्रमुख मंदिर 'पंचायतन शैली' में बने हैं, जिसमें एक मुख्य मंदिर के चारों कोनों पर चार सहायक मंदिर स्थित होते हैं।
- इन मंदिरों के निर्माण में मुख्य रूप से पास की विंध्य पहाड़ियों से प्राप्त रीवा, कैमूर और भांडेर श्रेणी के महीन बलुआ पत्थरों का उपयोग किया गया है।
- पत्थरों को आपस में जोड़ने के लिए किसी प्रकार के गारे या सीमेंट का प्रयोग नहीं किया गया है, बल्कि उन्हें इंटरलॉकिंग तकनीक से जोड़ा गया है।
- बलुआ पत्थर के नरम और लचीले स्वभाव के कारण ही शिल्पकार गहनों, बालों की लटों और सूक्ष्म शारीरिक भावों को पत्थरों पर इतनी बारीकी से उकेर पाए।
मंदिरों का भौगोलिक विभाजन
- अलेक्जेंडर कनिंघम के सर्वेक्षण और आधुनिक वर्गीकरण के अनुसार खजुराहो के मंदिरों को तीन मुख्य समूहों में बांटा गया है।
पश्चिमी समूह
- यह खजुराहो का सबसे प्रसिद्ध और समृद्ध समूह है, जो शिव-सागर तालाब के किनारे स्थित है।
- इसमें कंदरिया महादेव, लक्ष्मण मंदिर, वराह मंदिर, देवी जगदंबी और विश्वनाथ मंदिर शामिल हैं।
पूर्वी समूह
- इस समूह में हिंदू और जैन धर्म के मंदिरों का सुंदर सह-अस्तित्व देखने को मिलता है।
- इसमें जवारी मंदिर, वामन मंदिर और पार्श्वनाथ व आदिनाथ जैसे प्रमुख जैन मंदिर शामिल हैं।
दक्षिणी समूह
- इसमें दुलादेव मंदिर तथा चतुर्भुज मंदिर शामिल हैं, जो कालानुक्रम के अनुसार बाद की रचनाएँ हैं।
प्रतीकवाद और दार्शनिक महत्व
- खजुराहो की मूर्तिकला केवल धार्मिक आकृतियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह तत्कालीन मानव जीवन के हर पहलू को दर्शाती है।
- यहाँ देवी-देवताओं के अलावा नर्तक, संगीतकार, योद्धा, दरबारी जीवन, दैनिक कार्य और श्रृंगार करती सुंदरियों की मूर्तियाँ उकेरी गई हैं।
- इन मंदिरों की दीवारों पर उकेरी गई कामुक या मिथुन मूर्तियाँ कुल मूर्तिकला का केवल 10 प्रतिशत हिस्सा हैं।
- ये कामुक मूर्तियाँ जीवन के चार प्रमुख पुरुषार्थों - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के संतुलन को दर्शाती हैं।
- इन आकृतियों पर तत्कालीन तांत्रिक परंपराओं और कौल-कापालिक संप्रदायों का प्रभाव माना जाता है, जो काम को सृष्टि के सृजन और उर्वरता का प्रतीक मानते थे।
पतन और गुमनामी
- 11वीं शताब्दी में महमूद गजनवी के आक्रमणों और उसके बाद के राजनीतिक उथल-पुथल के कारण चंदेल शासकों को अपनी राजधानी महोबा और कालिंजर स्थानांतरित करनी पड़ी।
- राजनीतिक संरक्षण समाप्त होने और भौगोलिक रूप से घने जंगलों से घिरे होने के कारण यह स्थान धीरे-धीरे जनस्मृति से गायब हो गया।
- 16वीं शताब्दी तक खजुराहो पूरी तरह से गुमनामी के अंधेरे में खो चुका था और यहाँ तक कि तत्कालीन मुगल अभिलेखों में भी इसका कोई उल्लेख नहीं मिलता।
- देख-रेख के अभाव में 85 मंदिरों में से अधिकांश मंदिर नष्ट हो गए और वर्तमान में केवल 20 से 23 मंदिर ही सुरक्षित स्थिति में बचे हैं।
खजुराहो की पुनः खोज
- 19वीं शताब्दी की शुरुआत में ब्रिटिश इंजीनियर कैप्टन टी. एस. बर्ट ने स्थानीय लोगों से इन छिपे हुए मंदिरों के बारे में सुना।
- फरवरी 1838 में कैप्टन बर्ट खजुराहो पहुंचे और उन्होंने पश्चिमी समूह के मंदिरों की खोज कर उनका दस्तावेजीकरण किया।
- 1839 में बंगाल की एशियाटिक सोसाइटी के जर्नल में प्रकाशित बर्ट की रिपोर्ट के माध्यम से खजुराहो की जानकारी पहली बार यूरोपीय दुनिया के सामने आई।
- 1843 से 1847 के बीच छतरपुर के महाराजा प्रताप सिंह ने इन मंदिरों का बड़े पैमाने पर जीर्णोद्धार करवाया और वे इनके संरक्षण में रुचि लेने वाले पहले स्थानीय शासक बने।
- 1852 और 1864 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक अलेक्जेंडर कनिंघम ने खजुराहो का दौरा किया और इसे उत्तर भारत में प्राचीन हिंदू मंदिरों का सबसे मूल्यवान समूह बताया।
- मेजर फ्रेडरिक चार्ल्स मैसी ने मंदिरों के शुरुआती रेखाचित्र बनाए और लाला दीन दयाल ने पहली बार इस पूरे क्षेत्र की ऐतिहासिक तस्वीरें लीं।
वर्तमान प्रासंगिकता और महत्व
- वर्ष 1986 में यूनेस्को ने खजुराहो के स्मारक समूह को उसकी अद्वितीय स्थापत्य कला और कलात्मक सर्वोत्कृष्टता के आधार पर 'विश्व धरोहर स्थल' घोषित किया।
- खजुराहो संग्रहालय में शैव, शाक्त, वैष्णव और जैन परंपराओं की लगभग 100 से अधिक दुर्लभ मूर्तियाँ और कलाकृतियाँ सुरक्षित रखी गई हैं।
- खजुराहो आज न केवल भारत के समृद्ध सांस्कृतिक इतिहास का गवाह है, बल्कि यह हर साल दुनिया भर के लाखों पर्यटकों और शोधकर्ताओं को आकर्षित करने वाला एक प्रमुख ऐतिहासिक केंद्र बना हुआ है।