हिम तेंदुआ सफारी

चर्चा में क्यों?  

हाल ही में भारत की पहली उच्च-ऊंचाई वाली स्नो लेपर्ड सफारी लद्दाख में शुरू की गई है। इस पहल का उद्देश्य नियंत्रित वन्यजीव पर्यटन, जैव-विविधता संरक्षण और स्थानीय आजीविका को बढ़ावा देना है। 

लद्दाख स्नो लेपर्ड सफारी के बारे में 

  • यह भारत की पहली समर्पित उच्च-ऊंचाई वाली वन्यजीव सफारी पहल है। 
  • इसके तहत जिम्मेदार इको-टूरिज्म के माध्यम से स्नो लेपर्ड को देखने और लद्दाख के अनोखे ठंडे मरुस्थलीय जैव-विविधता क्षेत्र को समझने का अवसर मिलेगा। 
  • शुरुआत में यह सफारी लद्दाख के रुमबक, शांग और उले क्षेत्रों में संचालित होगी। इसके अलावा हेमिस राष्ट्रीय उद्यान, चांगथांग और काराकोरम वन्यजीव अभयारण्य सहित अन्य क्षेत्रों में भी मार्ग विकसित करने का प्रस्ताव है।

प्रमुख विशेषताएं: 

  • नियंत्रित वन्यजीव सफारी: शुरुआत में छह विशेष रूप से डिजाइन किए गए खुले वाहनों का उपयोग किया जाएगा। प्रशिक्षित स्थानीय चालक और गाइड स्वीकृत मार्गों पर सफारी संचालित करेंगे, ताकि वन्यजीवों को कम से कम परेशानी हो। 
  • उच्च-ऊंचाई वाली जैव-विविधता की खोज: पर्यटकों को स्नो लेपर्ड और अन्य वन्यजीवों को देखने का अवसर मिलेगा। भारत में अनुमानित 718 स्नो लेपर्ड में से 477 लद्दाख में पाए जाते हैं।
  • समुदाय आधारित इको-टूरिज्म: 20 स्थानीय युवाओं को पक्षी-दर्शन और वन्यजीवों की जानकारी देने का प्रशिक्षण दिया गया है। इससे गाइड और इको-टूरिज्म उद्यमी के रूप में रोजगार के अवसर पैदा होंगे।
  • संरक्षण केंद्रित पर्यटन: अवैध ऑफ-रोडिंग और अनियंत्रित पर्यटन पर रोक लगाई जाएगी। निर्धारित मार्गों और नियंत्रित पर्यटक आवागमन के जरिए नाजुक पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा की जाएगी।  

महत्व: 

  • यह पहल लद्दाख के संवेदनशील ठंडे मरुस्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र में जिम्मेदार इको-टूरिज्म और आवास संरक्षण को बढ़ावा देगी तथा मानवीय गतिविधियों से होने वाले व्यवधान को कम करेगी। 
  • साथ ही, वन्यजीव गाइडिंग, पक्षी-दर्शन और अन्य इको-टूरिज्म गतिविधियों के माध्यम से स्थानीय रोजगार और आय के अवसर बढ़ेंगे। इससे लद्दाख की पर्यटन अर्थव्यवस्था में विविधता लाने और स्थानीय समुदायों की भागीदारी बढ़ाने में मदद मिलेगी।   
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