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वन संरक्षण पर सर्वोच्च न्यायालय का मत

संदर्भ

अपने एक हालियाँ फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि “भारत में वन एक राष्ट्रीय संपत्ति हैं और यह देश की वित्तीय संपदा में प्रमुख योगदानकर्ता हैं”

क्या है मामला

  • एक निजी व्यक्ति को वन भूमि "विनम्रतापूर्वक उपहार में देने" (graciously gifting) के मामले में उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए फैसले के खिलाफ तेलंगाना राज्य द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में एक अपील दायर की गई थी।
  • इस अपील पर फैसला सुनाते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि “यह जंगल की आत्मा है जो पृथ्वी को संचालित करती है” (It is the spirit of the forest that moves the earth)
    • साथ ही शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार और निजी व्यक्तियों, दोनों से 5 लाख का हर्जाना वसूलने का आदेश दिया।
    • इसके अलावा राज्य को अपने ही वन अधिकारियों के खिलाफ जांच शुरू करने का भी आदेश दिया।
  • यह निर्णय ऐसे महत्वपूर्ण समय पर आया है जब वन संरक्षण (संशोधन) अधिनियम (FCAA), 2023 को व्यापक आलोचना का सामना करना पड़ रहा है।
    • FCAA पर राज्यों को संरक्षित वनों में अतिक्रमण को नियमित करने और वनभूमि के विचलन का निर्धारण करने की खुली छूट देने का आरोप है।
    • इसके अलावा ढांचागत परियोजनाओं को पर्यावरणीय मंजूरी से छूट देने के अलावा, वनों के व्यावसायिक दोहन का मार्ग प्रशस्त करने के लिए इस अधिनियम की आलोचना की गई है।

शीर्ष न्यायालय ने और क्या कहा?

  • उच्चतम न्यायालय ने जलवायु परिवर्तन के संबंध में जंगल के महत्व का भी हवाला दिया और कहा कि जंगलों की कमी होने पर बड़े पैमाने पर जीव- जन्तु विलुप्त हो जाएंगे। साथ ही जंगल कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) को सिंक करने के एक प्रमुख स्रोत हैं।
  • शीर्ष अदालत ने कहा कि, “किसी देश की संपत्ति का मूल्यांकन करने के लिए कार्बन क्रेडिट और हरित लेखांकन की अवधारणाएं एक वास्तविकता बन गई हैं”।
    • इस प्रकार, अधिक वन क्षेत्र वाला देश अपने अतिरिक्त कार्बन क्रेडिट को घाटे वाले देश को बेचने की स्थिति में होगा। यह किसी देश की वित्तीय संपदा में वनों के योगदान के महत्व को रेखांकित करता है। 
  • न्यायालय ने जलवायु परिवर्तन के व्यापक आर्थिक प्रभाव और वर्षा के बदलते पैटर्न पर भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की वर्ष 2022-2023 रिपोर्ट के हवाले से कहा कि “जलवायु परिवर्तन के कारण अर्थव्यवस्था को सकल घरेलू उत्पाद का 2.8% नुकसान हो सकता है और वर्ष 2050 तक भारत की लगभग आधी आबादी के जीवन स्तर पर इसका असर पड़ सकता है”।
  • RBI रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण भारत को वर्ष 2100 तक सालाना अपने सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 3% से 10% तक का नुकसान हो सकता है।
  • अंत में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि, “एक प्रबुद्ध प्रजाति होने के नाते मनुष्य से पृथ्वी के ट्रस्टी के रूप में कार्य करने की अपेक्षा की जाती है।  मनुष्यों को अन्य प्रजातियों के आवास को नष्ट करने का अधिकार नहीं है, बल्कि प्रजातियों को आगे के संकट से बचाना उनका कर्तव्य है”।
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