मानव–वन्यजीव संघर्ष का अर्थ (Meaning of Human–Wildlife Conflict)
मानव–वन्यजीव संघर्ष उस स्थिति को दर्शाता है जब वन्यजीवों की उपस्थिति, गतिविधियाँ या व्यवहार मानवीय जीवन, आजीविका, संपत्ति अथवा सुरक्षा के लिए खतरा बन जाते हैं, जिसके परिणामस्वरूप मनुष्यों और/या वन्यजीवों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
यह संघर्ष जीवन की हानि, फसल और पशुधन के नुकसान, तथा वन्यजीवों के प्रतिशोधात्मक शिकार के रूप में प्रकट होता है।
मानव–वन्यजीव संघर्ष के प्रमुख कारक (Major Causes of Human–Wildlife Conflict)
पारिस्थितिकीय कारक (Ecological Factors)
मौसमी परिवर्तन, प्राकृतिक आपदाएँ और चरम मौसमी घटनाएँ वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास और भोजन स्रोतों को प्रभावित करती हैं।
इसके परिणामस्वरूप वन्यजीव मानव बस्तियों की ओर आने लगते हैं। उदाहरण के लिए, आर्कटिक क्षेत्र में समुद्री बर्फ के पिघलने से ध्रुवीय भालुओं और मानव आबादी के बीच नकारात्मक संपर्क की संभावना बढ़ गई है।
मानवजनित कारक (Anthropogenic Factors)
भूमि उपयोग में परिवर्तन मानव–वन्यजीव संघर्ष का सबसे महत्वपूर्ण कारण है।
कृषि विस्तार, वनों की कटाई, शहरीकरण, रैखिक अवसंरचना (सड़कें, रेलमार्ग, नहरें), खनन और अन्य निष्कर्षण उद्योगों के कारण वन्यजीवों का पर्यावास नष्ट या खंडित हो जाता है, जिससे उनका मानव क्षेत्रों में प्रवेश बढ़ जाता है।
वन्यजीव संबंधी कारक (Wildlife-related Factors)
वन्यजीवों के जीवन चक्र, व्यवहार और गतिशीलता में परिवर्तन, प्राकृतिक शिकारी की कमी, तथा आक्रामक विदेशी प्रजातियों की उपस्थिति भी संघर्ष को बढ़ाती है।
कुछ प्रजातियाँ मानव-प्रधान परिदृश्य के अनुकूल हो जाती हैं, जिससे टकराव की संभावना और बढ़ जाती है।
मानव–वन्यजीव संघर्ष के प्रभाव (Impacts of Human–Wildlife Conflict)
वन्यजीवों पर प्रभाव
मानव–वन्यजीव संघर्ष के परिणामस्वरूप प्रतिशोधात्मक हत्या, अवैध शिकार और पकड़ जैसी घटनाएँ बढ़ती हैं, जिससे कई स्थलीय और समुद्री प्रजातियों के अस्तित्व पर संकट उत्पन्न हो जाता है और विलुप्ति का खतरा बढ़ता है।
पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव
इस संघर्ष के कारण फसलों और पशुधन को नुकसान पहुँचता है तथा शिकारी–शिकार संबंधों में असंतुलन उत्पन्न होता है, जिससे संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिरता प्रभावित होती है।
सामाजिक गतिशीलता पर प्रभाव
मानव–वन्यजीव संघर्ष सामाजिक तनाव को जन्म देता है।
किसान और स्थानीय समुदाय प्रजातियों के संरक्षण के लिए सरकार को दोषी ठहराते हैं, जबकि संरक्षणवादी कृषि विस्तार, औद्योगिक गतिविधियों और पर्यावास विनाश के लिए किसानों तथा उद्योगों को जिम्मेदार मानते हैं।
स्थानीय समुदायों पर प्रभाव
इस संघर्ष का सबसे गंभीर प्रभाव कमजोर, गरीब और हाशिए पर रहने वाले समुदायों पर पड़ता है।
जीवन, फसलों, पशुधन और संपत्ति की हानि उनकी आजीविका और सामाजिक सुरक्षा को गहराई से प्रभावित करती है।
मानव–वन्यजीव संघर्ष के समाधान हेतु उठाए गए कदम (Measures to Mitigate Human–Wildlife Conflict)
संरक्षित क्षेत्र नेटवर्क का गठन
वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के अंतर्गत देशभर में राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभयारण्य, संरक्षण रिजर्व और सामुदायिक रिजर्व स्थापित किए गए हैं, ताकि वन्यजीवों और उनके प्राकृतिक पर्यावासों का संरक्षण सुनिश्चित किया जा सके।
विशिष्ट प्रजातियों के संरक्षण हेतु दिशा-निर्देश
पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा मानव–वन्यजीव संघर्ष से जुड़ी प्रमुख प्रजातियों के लिए दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं।
इनमें हाथी, तेंदुआ, गौर, मगरमच्छ सहित लगभग 10 संघर्ष-प्रवण प्रजातियाँ शामिल हैं।
केंद्र प्रायोजित संरक्षण योजनाएँ
‘वन्यजीव पर्यावासों का विकास’, ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ और ‘प्रोजेक्ट एलीफेंट’ जैसी योजनाओं के अंतर्गत राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है, ताकि संरक्षण और संघर्ष शमन उपायों को प्रभावी ढंग से लागू किया जा सके।
राष्ट्रीय वन्यजीव कार्य योजना (2017–2035)
राष्ट्रीय वन्यजीव कार्य योजना में मानव–वन्यजीव संघर्ष प्रबंधन पर एक समर्पित अध्याय शामिल किया गया है, जिसमें वैज्ञानिक, सामाजिक और संस्थागत उपायों पर बल दिया गया है।
राष्ट्रीय मानव-वन्यजीव संघर्ष शमन रणनीति एवं कार्य-योजना (2021–26)
यह रणनीति सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व को बढ़ावा देने पर केंद्रित है तथा मनुष्यों और वन्यजीवों के समग्र कल्याण को सुनिश्चित करने के लिए रोकथाम, त्वरित प्रतिक्रिया और दीर्घकालिक समाधान पर बल देती है।