भारत सरकार ने हाल ही में उन देशों से आने वाले निवेश के लिए FDI नीति में संशोधन किया है जो भारत के साथ भूमि सीमा (Land Border) साझा करते हैं, जैसे – चीन, नेपाल, भूटान, म्यांमार, बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान। इन संशोधनों का उद्देश्य राष्ट्रीय सुरक्षा को बनाए रखते हुए विनिर्माण क्षेत्र में निवेश बढ़ाना और निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता को मजबूत करना है।
यह परिवर्तन मुख्यतः 2020 के “प्रेस नोट-3 (PN3)” के प्रतिबंधों को आंशिक रूप से नरम करने से जुड़ा है।
भारत की FDI नीति में यह बदलाव अचानक नहीं आया है, बल्कि यह पिछले कुछ वर्षों की घटनाओं और आर्थिक परिस्थितियों से जुड़ा हुआ है।
FDI (Foreign Direct Investment) का अर्थ है जब कोई विदेशी कंपनी, व्यक्ति या संस्था किसी दूसरे देश की कंपनी या उद्योग में लंबे समय के लिए निवेश करती है और उस पर आंशिक या पूर्ण नियंत्रण प्राप्त करती है।
इस नीति के तहत:
इन देशों में प्रमुख रूप से शामिल हैं:
इस नीति का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक हितों की रक्षा करना था।
भारत और चीन के संबंध 2020 के बाद काफी तनावपूर्ण रहे। इसकी मुख्य वजह थी:
गलवान घाटी संघर्ष 15-16 जून, 2020 को लद्दाख क्षेत्र की गलवान घाटी में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच एक हिंसक और घातक झड़प थी
हालांकि हाल के समय में दोनों देशों के संबंधों में कुछ नरमी के संकेत मिले हैं:
इसी संदर्भ में निवेश नीति को थोड़ा उदार बनाने पर विचार किया गया।
NITI Aayog ने 2025 में सुझाव दिया था कि चीन के निवेश पर लगाए गए प्रतिबंधों को धीरे-धीरे कम किया जा सकता है।
प्रमुख सुझावों में शामिल थे:
नीति आयोग का मानना है कि चीन की कंपनियों के पास मैन्युफैक्चरिंग टेक्नोलॉजी, पूंजी और उत्पादन क्षमता है, जिसका उपयोग भारत के औद्योगिक विकास में किया जा सकता है।
आज विश्व अर्थव्यवस्था में सप्लाई चेन का पुनर्गठन (Supply Chain Diversification) हो रहा है। कई कंपनियाँ चीन से बाहर वैकल्पिक उत्पादन केंद्र तलाश रही हैं।
भारत इस अवसर का लाभ उठाना चाहता है।
यदि चीनी कंपनियाँ भारत में निवेश करती हैं तो:
इससे भारत को वैश्विक विनिर्माण केंद्र (Global Manufacturing Hub) बनने में मदद मिल सकती है।
इकोनॉमिक सर्वे 2024 में कहा गया था कि यदि चीन के निवेश को नियंत्रित तरीके से अनुमति दी जाए तो:
FDI बढ़ने से:
विशेषकर इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, और टेक्नोलॉजी सेक्टर में।
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