चर्चा में क्यों ?
हाल ही में World Economic Forum ने अपनी Chief Economists Outlook Report (May 2026) जारी की है। रिपोर्ट में वैश्विक आर्थिक वृद्धि के कमजोर पड़ने की आशंका व्यक्त की गई है। हालांकि, भारत और अमेरिका को अपेक्षाकृत मजबूत अर्थव्यवस्थाओं के रूप में चिह्नित किया गया है। रिपोर्ट में पश्चिम एशिया संकट, होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकाबंदी, मुद्रास्फीति और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के प्रभावों पर भी प्रकाश डाला गया है।

रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष
1. वैश्विक आर्थिक वृद्धि को लेकर बढ़ी चिंता
- सर्वेक्षण में शामिल लगभग 90% अर्थशास्त्रियों का मानना है कि आने वाले वर्षों में वैश्विक आर्थिक विकास कमजोर रहेगा।
- भू-राजनीतिक तनाव, व्यापारिक बाधाएं और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान प्रमुख कारण बताए गए हैं।
2. होर्मुज जलडमरूमध्य संकट का प्रभाव
- पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यवधान से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हुई है।
- तेल एवं गैस की कीमतों में वृद्धि तथा वैश्विक बाजारों में अस्थिरता बढ़ी है।
- विशेषज्ञों के अनुसार इसका प्रभाव 2025 के टैरिफ संकट से भी अधिक गंभीर हो सकता है।
3. वैश्विक मंदी की संभावना फिलहाल कम
- 58% अर्थशास्त्रियों का मानना है कि निकट भविष्य में वैश्विक मंदी की आशंका नहीं है।
- हालांकि आर्थिक वृद्धि की गति धीमी रहने की संभावना है।
4. कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का बढ़ता प्रभाव
- 90% से अधिक अर्थशास्त्रियों ने 2026 में AI के उपयोग में वृद्धि की संभावना जताई है।
- AI को दीर्घकालिक उत्पादकता वृद्धि का प्रमुख स्रोत माना गया है।
भारत के लिए क्या कहती है रिपोर्ट ?
- रिपोर्ट के अनुसार, भारत विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे मजबूत विकास संभावनाओं वाले देशों में शामिल है। विश्व आर्थिक मंच का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की आर्थिक वृद्धि दर लगभग 6.5 प्रतिशत रह सकती है। देश में मजबूत घरेलू मांग, बढ़ते निवेश और उपभोग व्यय आर्थिक गतिविधियों को गति प्रदान कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त, अधिकांश अर्थशास्त्रियों को अगले 12 महीनों में रोजगार के अवसरों में मध्यम से उच्च वृद्धि की उम्मीद है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती को दर्शाता है।
- हालांकि, रिपोर्ट ने भारत के समक्ष कुछ महत्वपूर्ण चुनौतियों की ओर भी संकेत किया है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य में उत्पन्न अनिश्चितता के कारण ऊर्जा आयात पर दबाव बढ़ सकता है, जिससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा, रुपये में लगातार कमजोरी और विदेशी मुद्रा भंडार पर बढ़ता दबाव चिंता का विषय बना हुआ है। शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी दर में वृद्धि तथा श्रम-बल भागीदारी में कमी भी अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती प्रस्तुत करती है। साथ ही, मुद्रास्फीति का दबाव बना रहने से उपभोक्ताओं और नीति-निर्माताओं दोनों के समक्ष कठिनाइयाँ उत्पन्न हो सकती हैं।
- इन परिस्थितियों में भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करना, आयात स्रोतों एवं निर्यात बाजारों का विविधीकरण करना तथा घरेलू विनिर्माण और आपूर्ति श्रृंखलाओं को मजबूत बनाना आवश्यक होगा। साथ ही, रोजगार सृजन, कौशल विकास, मुद्रास्फीति नियंत्रण और वित्तीय स्थिरता बनाए रखने पर विशेष ध्यान देना होगा, ताकि वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद आर्थिक विकास की गति को बनाए रखा जा सके।
विश्व आर्थिक मंच (World Economic Forum - WEF)
- विश्व आर्थिक मंच (WEF) एक अंतरराष्ट्रीय गैर-लाभकारी संगठन है, जिसकी स्थापना वर्ष 1971 में जर्मन अर्थशास्त्री एवं इंजीनियर Klaus Schwab द्वारा की गई थी। इसका मुख्यालय Cologny में स्थित है। WEF का प्रमुख उद्देश्य सरकारों, उद्योग जगत, शिक्षाविदों, अंतरराष्ट्रीय संगठनों और नागरिक समाज के बीच सहयोग को बढ़ावा देकर वैश्विक, क्षेत्रीय एवं औद्योगिक चुनौतियों के समाधान हेतु एक साझा मंच उपलब्ध कराना है।
- विश्व आर्थिक मंच अपनी वार्षिक बैठक World Economic Forum Annual Meeting के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है, जिसका आयोजन प्रत्येक वर्ष Davos में किया जाता है। इस सम्मेलन में विश्व के राष्ट्राध्यक्ष, नीति-निर्माता, उद्योगपति, अर्थशास्त्री और विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ भाग लेते हैं तथा वैश्विक अर्थव्यवस्था, व्यापार, जलवायु परिवर्तन, प्रौद्योगिकी और सतत विकास जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर विचार-विमर्श करते हैं।
- WEF समय-समय पर Global Risks Report, Global Competitiveness Report और Chief Economists Outlook जैसी महत्वपूर्ण रिपोर्टें भी प्रकाशित करता है, जो वैश्विक नीति-निर्माण और आर्थिक विमर्श में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
निष्कर्ष
विश्व आर्थिक मंच (WEF) की Chief Economists Outlook Report 2026 यह संकेत देती है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, आपूर्ति श्रृंखला व्यवधानों, ऊर्जा असुरक्षा तथा मुद्रास्फीतिक दबावों के कारण अनिश्चितता के दौर से गुजर रही है। यद्यपि निकट भविष्य में वैश्विक मंदी की संभावना सीमित दिखाई देती है, फिर भी आर्थिक विकास की गति कमजोर पड़ने की आशंका बनी हुई है। ऐसे चुनौतीपूर्ण वैश्विक परिदृश्य में भारत अपनी मजबूत घरेलू मांग, निवेश-आधारित विकास, जनसांख्यिकीय लाभांश और नीतिगत सुधारों के कारण विश्व अर्थव्यवस्था के प्रमुख विकास केंद्र के रूप में उभर रहा है। हालांकि, इस गति को बनाए रखने के लिए भारत को ऊर्जा सुरक्षा, रोजगार सृजन, मुद्रास्फीति नियंत्रण तथा वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में अपनी भागीदारी को सुदृढ़ करने पर निरंतर ध्यान देना होगा। इस प्रकार, वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत के लिए अवसरों और चुनौतियों का संतुलित प्रबंधन ही सतत एवं समावेशी आर्थिक विकास की कुंजी होगा।