संदर्भ
पिछले कुछ वर्षों में देश के विभिन्न हिस्सों, विशेषकर हिमालयी राज्यों में, भारी बारिश के बाद आई बाढ़ और भूस्खलन की घटनाओं के साथ क्लाउडबर्स्ट शब्द बार-बार सुनने को मिला है। किसी भी भीषण वर्षा की घटना को अक्सर क्लाउडबर्स्ट कह दिया जाता है, जबकि मौसम विज्ञान की दृष्टि से इसकी एक स्पष्ट और वैज्ञानिक परिभाषा है।
क्लाउडबर्स्ट क्या है?
- भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, जब लगभग 20 से 30 वर्ग किलोमीटर के सीमित क्षेत्र में एक घंटे के भीतर 100 मिलीमीटर (10 सेंटीमीटर) या उससे अधिक वर्षा होती है, तो उसे क्लाउडबर्स्ट कहा जाता है। इतनी कम अवधि में इतनी अधिक वर्षा होने से जमीन पानी को अवशोषित नहीं कर पाती और परिणामस्वरूप अचानक बाढ़ जैसी स्थिति पैदा हो जाती है।
- सामान्य मानसूनी बारिश और क्लाउडबर्स्ट में यही सबसे बड़ा अंतर है कि क्लाउडबर्स्ट अत्यंत सीमित क्षेत्र में बहुत कम समय के भीतर अत्यधिक वर्षा कराता है। कुछ मौसम वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि यदि किसी क्षेत्र में एक घंटे में लगभग 50 मिलीमीटर वर्षा होती है, तो स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों के आधार पर वह भी गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है। इसे वे मिनी क्लाउडबर्स्ट जैसी श्रेणी में रखने का सुझाव देते हैं।
क्या जलवायु परिवर्तन बढ़ा रहा है जोखिम?
- क्लाउडबर्स्ट पहले भी होते थे, लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि बढ़ते वैश्विक तापमान के कारण ऐसी चरम मौसम घटनाओं की संभावना बढ़ रही है। गर्म वातावरण अधिक मात्रा में जलवाष्प धारण कर सकता है, जिससे अचानक अत्यधिक वर्षा होने की परिस्थितियां बन सकती हैं।
- हालांकि आधिकारिक रिकॉर्ड में क्लाउडबर्स्ट की घटनाओं की संख्या सीमित दिखाई देती है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि वास्तविक घटनाएं इससे कहीं अधिक हो सकती हैं। इसका एक प्रमुख कारण यह है कि अधिकांश क्लाउडबर्स्ट दुर्गम पर्वतीय इलाकों में होते हैं, जहां मौसम मापने वाले उपकरण और निगरानी केंद्र पर्याप्त संख्या में मौजूद नहीं हैं। यदि घटना किसी मौसम केंद्र से दूर होती है, तो वह आधिकारिक आंकड़ों में दर्ज नहीं हो पाती, भले ही उससे व्यापक तबाही हुई हो।
क्लाउडबर्स्ट बनने की प्रक्रिया
- क्लाउडबर्स्ट का अर्थ यह नहीं है कि बादल वास्तव में फट जाता है। यह पूरी तरह एक मौसम संबंधी प्रक्रिया का परिणाम होता है।
- जब गर्म और नमी से भरपूर हवा तेजी से ऊपर उठती है, तो ऊंचाई पर पहुंचकर वह ठंडी होती है और विशाल वर्षा वाले बादलों का निर्माण करती है। पर्वतीय क्षेत्रों में मानसूनी हवाएं पहाड़ों से टकराकर ऊपर उठती हैं, जिससे यह प्रक्रिया और अधिक प्रभावी हो जाती है।
- इन बादलों के भीतर बनने वाली जल बूंदें सामान्यतः वर्षा के रूप में नीचे गिर जाती हैं। लेकिन यदि ऊपर उठती हवा का वेग बहुत अधिक हो, तो वह बूंदों को कुछ समय तक हवा में रोके रखता है। जैसे-जैसे बूंदों का आकार और वजन बढ़ता जाता है, अंततः वे एक साथ बड़ी मात्रा में नीचे गिरती हैं। यही स्थिति अत्यधिक तीव्र वर्षा का रूप लेती है, जिसे क्लाउडबर्स्ट कहा जाता है।
क्या हर भारी बारिश क्लाउडबर्स्ट होती है?
- विशेषज्ञों का कहना है कि प्रत्येक भारी वर्षा को क्लाउडबर्स्ट कहना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं है। कई बार किसी क्षेत्र में सामान्य भारी बारिश, कमजोर जल निकासी व्यवस्था, नदी तटों पर अतिक्रमण, अवैध निर्माण या वनों की कटाई जैसी परिस्थितियां मिलकर बड़े पैमाने पर बाढ़ और नुकसान का कारण बनती हैं।
- यदि बिना वैज्ञानिक पुष्टि के हर घटना को क्लाउडबर्स्ट बता दिया जाए, तो आपदा के पीछे मौजूद मानवीय कारणों और प्रशासनिक जिम्मेदारियों पर पर्याप्त चर्चा नहीं हो पाती। इसलिए किसी भी घटना का मूल्यांकन मौसम संबंधी आंकड़ों और तकनीकी विश्लेषण के आधार पर ही किया जाना चाहिए।
पूर्वानुमान लगाना क्यों है मुश्किल?
- क्लाउडबर्स्ट की सबसे बड़ी चुनौती इसकी सटीक भविष्यवाणी है। मौसम वैज्ञानिक किसी बड़े क्षेत्र में भारी वर्षा की संभावना का अनुमान तो लगा सकते हैं, लेकिन यह बताना बेहद कठिन होता है कि किस छोटे हिस्से में और किस समय क्लाउडबर्स्ट जैसी घटना घटित होगी।
- इसका एक कारण यह है कि मौसम पूर्वानुमान मॉडल बड़े-बड़े ग्रिडों के आधार पर काम करते हैं, जबकि क्लाउडबर्स्ट का प्रभाव क्षेत्र बहुत छोटा होता है। ऐसे सूक्ष्म स्तर पर पूर्वानुमान के लिए अत्यधिक उच्च क्षमता वाले कंप्यूटर और अत्याधुनिक मौसम मॉडल की आवश्यकता होती है।
- दूसरी ओर, क्लाउडबर्स्ट बहुत कम समय में विकसित होकर समाप्त भी हो जाता है। इसके विपरीत चक्रवात जैसी मौसम प्रणालियों को कई दिन पहले से ट्रैक किया जा सकता है।
- पर्वतीय क्षेत्रों में मौसम की निगरानी भी अपेक्षाकृत कठिन होती है। ऊंचे पर्वत डॉप्लर मौसम रडार की निगरानी में बाधा उत्पन्न करते हैं और कई स्थानों पर स्वचालित मौसम केंद्रों की संख्या भी सीमित है। ऐसे में वास्तविक समय के आंकड़ों का अभाव पूर्वानुमान को और चुनौतीपूर्ण बना देता है।
भविष्य की तैयारी
- मौसम पूर्वानुमान को अधिक सटीक बनाने के लिए भारतीय मौसम विज्ञान विभाग अल्पकालिक चेतावनी प्रणाली यानी नाउकास्टिंग को मजबूत कर रहा है। इसके माध्यम से कुछ घंटों पहले संभावित मौसम परिवर्तन की जानकारी दी जा सकती है।
- साथ ही, केंद्र सरकार की मिशन मौसम पहल के अंतर्गत देशभर में डॉप्लर मौसम रडारों की संख्या बढ़ाने और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित तकनीकों का उपयोग कर अत्यंत स्थानीय स्तर पर मौसम पूर्वानुमान की क्षमता विकसित करने की दिशा में कार्य किया जा रहा है।
- हालांकि इन प्रयासों से चेतावनी प्रणाली पहले की तुलना में अधिक प्रभावी हो सकती है, फिर भी विशेषज्ञ मानते हैं कि क्लाउडबर्स्ट जैसी अत्यंत स्थानीय और अचानक विकसित होने वाली घटनाओं की शत-प्रतिशत सटीक भविष्यवाणी करना अभी भी मौसम विज्ञान की सबसे कठिन चुनौतियों में से एक बना हुआ है।