संदर्भ
कावेरी नदी के जल बंटवारे को लेकर एक बार फिर कर्नाटक और तमिलनाडु आमने-सामने हैं। नई दिल्ली में आयोजित कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) की बैठक में कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC) के उस आदेश को मंजूरी दे दी गई, जिसमें कर्नाटक को 29 जुलाई से लगातार 15 दिनों तक प्रतिदिन 3,500 क्यूसेक पानी तमिलनाडु को उपलब्ध कराने के लिए कहा गया है। यदि निर्धारित मात्रा पूरे पंद्रह दिनों तक छोड़ी जाती है, तो तमिलनाडु को लगभग 4.5 टीएमसी (हजार मिलियन घन फुट) पानी प्राप्त होगा।
कावेरी जल विवाद में कावेरी जल विनियमन समिति की भूमिका
- कावेरी जल विनियमन समिति, कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण के अधीन कार्य करने वाली संस्था है। इसका गठन कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण के वर्ष 2007 के अंतिम निर्णय तथा वर्ष 2018 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उसमें किए गए संशोधनों को लागू करने के उद्देश्य से किया गया था।
- समिति की अध्यक्षता कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण के सदस्य (जल संसाधन) विनीत गुप्ता करते हैं। इसके सदस्य कावेरी बेसिन से जुड़े राज्यों के मुख्य अभियंता हैं। इसके अतिरिक्त भारतीय मौसम विभाग (IMD), केंद्रीय जल आयोग (CWC) तथा केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के प्रतिनिधि भी समिति का हिस्सा हैं।
कावेरी नदी
- कावेरी नदी दक्षिण भारत की एक अंतरराज्यीय नदी है। यह प्रायद्वीप की प्रमुख नदियों में से एक है जो पूर्व की ओर बहती हुई बंगाल की खाड़ी में गिरती है।
- कावेरी नदी पश्चिमी घाट की ब्रह्मगिरि पर्वत श्रृंखला पर स्थित तलकावेरी से निकलती है, जो वर्तमान में कर्नाटक राज्य के कूर्ग जिले में समुद्र तल से 1,341 मीटर (4,400 फीट) की ऊंचाई पर स्थित है।
- संपूर्ण कावेरी बेसिन का जलग्रहण क्षेत्र 81,155 वर्ग किलोमीटर है।
- कर्नाटक – 34,273 वर्ग किलोमीटर
- केरल – 2,866 वर्ग किलोमीटर
- तमिलनाडु – 43,868 वर्ग किलोमीटर
- पुडुचेरी (कराईकल क्षेत्र) – 14 वर्ग किलोमीटर
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समिति की जिम्मेदारियां क्या हैं?
- केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय द्वारा जून 2018 में जारी अधिसूचना के अनुसार, समिति कर्नाटक के हेमावती, हरंगी, कृष्णराज सागर (KRS) और काबिनी, तमिलनाडु के मेट्टूर, भवानीसागर और अमरावती तथा केरल के बनासुरसागर जलाशय की नियमित निगरानी करती है। जलाशयों के जल स्तर, जल की आवक और भंडारण की प्रतिदिन समीक्षा करना भी इसकी जिम्मेदारी है।
- इसके साथ ही समिति यह सुनिश्चित करती है कि कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण के निर्देशानुसार प्रत्येक महीने निर्धारित अंतराल पर जलाशयों से पानी छोड़ा जाए। दक्षिण-पश्चिम मानसून, उत्तर-पूर्व मानसून और गर्मी के मौसम के लिए अलग-अलग जल लेखा तैयार करना तथा वार्षिक रिपोर्ट बनाना भी इसके कार्यों में शामिल है।
- सामान्य परिस्थितियों में मानसून के दौरान समिति हर पंद्रह दिन में बैठक करती है। इस वर्ष कावेरी जलग्रहण क्षेत्र में सामान्य से कम वर्षा और तमिलनाडु की बढ़ती जल मांग को देखते हुए 28 जुलाई को विशेष समीक्षा बैठक आयोजित की गई। अगली बैठक 11 अगस्त को प्रस्तावित है।
संकट की स्थिति में कैसे लिया जाता है निर्णय?
- जल संकट के दौरान समिति कई तकनीकी और मौसम संबंधी पहलुओं का गहन विश्लेषण करती है। इसमें कावेरी बेसिन में हुई वास्तविक वर्षा, आगामी पंद्रह दिनों के मौसम का पूर्वानुमान, प्रमुख जलाशयों में उपलब्ध जल भंडारण, जल की आवक और निकासी तथा बिलीगुंडलु में नदी के वास्तविक प्रवाह का आकलन शामिल होता है।
- समिति अपनी प्रत्येक बैठक में पिछली बैठक में दिए गए निर्देशों के अनुपालन की भी समीक्षा करती है, ताकि जल वितरण की स्थिति का समग्र मूल्यांकन किया जा सके।
3,500 क्यूसेक पानी छोड़ने का आधार क्या रहा?
- इस बार समिति ने कर्नाटक के चार प्रमुख जलाशयों में मौजूदा मानसून के दौरान हुई शुद्ध जल आवक की तुलना पिछले 30 वर्षों के औसत आंकड़ों से की। समिति के अध्यक्ष विनीत गुप्ता के अनुसार, इन जलाशयों में सामान्य की तुलना में लगभग 60 प्रतिशत कम पानी आया है।
- इसके अतिरिक्त, बिलीगुंडलु तथा कृष्णराज सागर (KRS)-काबिनी और मेट्टूर के बीच के मध्यवर्ती जलग्रहण क्षेत्र में नदी के प्रवाह का भी अध्ययन किया गया। बिलीगुंडलु में जल प्रवाह सामान्य से लगभग 90 प्रतिशत कम दर्ज किया गया।
- भारतीय मौसम विभाग द्वारा आगामी सप्ताहों के लिए भी बेहतर वर्षा की संभावना नहीं जताए जाने के कारण समिति ने ऐसा निर्णय लिया, जिससे सीमित जल उपलब्धता के बावजूद कर्नाटक के लिए पानी छोड़ना व्यावहारिक बना रहे। 29 जुलाई तक कर्नाटक के चार प्रमुख जलाशयों में कुल 64.15 टीएमसी पानी उपलब्ध था, जबकि उनकी कुल भंडारण क्षमता 114.57 टीएमसी है।
दोनों राज्यों की प्रतिक्रिया
कर्नाटक की आपत्ति:
- कम वर्षा के कारण कर्नाटक ने अभी तक सिंचाई के लिए पानी नहीं छोड़ा है। ऐसे में राज्य सरकार ने समिति के निर्णय पर असहमति जताई है।
- राज्य के जल संसाधन मंत्री के. रामलिंगा रेड्डी ने कहा कि सरकार कावेरी जल विनियमन समिति के आदेश के विरुद्ध कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण में अपील करने की संभावना पर विचार करेगी।
- उधर, कर्नाटक किसान संगठनों के महासंघ ने भी राज्य सरकार से आग्रह किया है कि वह डिस्ट्रेस-शेयरिंग फॉर्मूला यानी संकट की स्थिति में जल बंटवारे के सिद्धांत के आधार पर आदेश की पुनर्समीक्षा कराने का प्रयास करे।
तमिलनाडु की नाराजगी:
- दूसरी ओर, तमिलनाडु भी इस फैसले से संतुष्ट नहीं है। राज्य का मानना है कि निर्धारित 3,500 क्यूसेक पानी उसकी वास्तविक जरूरत के मुकाबले पर्याप्त नहीं है।
- राज्य सरकार का मत है कि समिति को कर्नाटक को 9.8 टीएमसी पानी की पूरी कमी की भरपाई करने का निर्देश देना चाहिए था।
- अनुमान के अनुसार, यदि कुरुवई धान की खेती लगभग चार लाख एकड़ क्षेत्र में होती है, तो राज्य को कम से कम 100 टीएमसी पानी की आवश्यकता होगी। वर्तमान में मेट्टूर बांध में लगभग 36 टीएमसी पानी उपलब्ध है, जिसमें से लगभग 10 टीएमसी पेयजल आपूर्ति और डेड स्टोरेज के लिए सुरक्षित रखना अनिवार्य है।
आगे की संभावनाएं
- समिति के अध्यक्ष विनीत गुप्ता का मानना है कि भविष्य में ऐसे विवादों और जल संकट से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए कर्नाटक और तमिलनाडु को मिलकर एक स्थायी डिस्ट्रेस-शेयरिंग फॉर्मूला तैयार करना होगा।
- इसी संदर्भ में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय की प्रस्तावित बेंगलुरु यात्रा को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस दौरान वे कर्नाटक सरकार से तमिलनाडु के हिस्से का कावेरी जल उपलब्ध कराने का आग्रह कर सकते हैं।
- संभावना जताई जा रही है कि कावेरी जल विनियमन समिति की 11 अगस्त की बैठक से पहले कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण की भी बैठक आयोजित हो सकती है। यदि ऐसा होता है, तो दोनों राज्यों को जल बंटवारे के लिए दीर्घकालिक और सर्वमान्य व्यवस्था पर चर्चा करने का अवसर मिल सकता है।