संदर्भ
पर्यावरण संरक्षण और राष्ट्र की विकासात्मक आवश्यकताओं के बीच संतुलन साधना हमेशा से एक संवेदनशील और जटिल विषय रहा है। हाल ही में, सर्वोच्च न्यायालय ने पूर्वव्यापी या एक्स-पोस्ट फैक्टो (Ex-Post Facto) पर्यावरण स्वीकृतियों (ECs) से जुड़े एक अहम फैसले में केंद्र सरकार के 2021 के उस कार्यालय ज्ञापन (OM) को खारिज कर दिया है, जिसके तहत बिना पूर्व अनुमति के निर्माण या संचालन शुरू करने वाली परियोजनाओं को नियमित करने की अनुमति दी गई थी।
पृष्ठभूमि और विवाद
पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) अधिसूचना, 2006 के अनुसार, किसी भी विशिष्ट परियोजना को शुरू करने से पहले अनिवार्य रूप से पूर्व पर्यावरण स्वीकृति प्राप्त करनी होती है। हालांकि, धरातल पर कई ऐसी परियोजनाएं सामने आईं जिन्होंने पूर्व अनुमति के बिना ही अपना संचालन शुरू कर दिया था। इन पिछले उल्लंघनों से निपटने के लिए सरकार ने समय-समय पर कदम उठाए:
- मार्च 2017: एक वैधानिक अधिसूचना जारी कर छह महीने की एकमुश्त माफी दी गई, ताकि उल्लंघनकर्ता पर्यावरण मूल्यांकन के बाद ईसी प्राप्त कर सकें।
- जुलाई 2021: एक कार्यालय ज्ञापन (OM) के जरिए मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) लाई गई, जिसने उल्लंघन मामलों को पूर्वव्यापी ईसी देने के लिए एक निरंतर और स्थायी तंत्र स्थापित कर दिया।
अदालत का कड़ा रुख: कार्यकारी निर्देश बनाम वैधानिक नियम
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने इस ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट रूप से रेखांकित किया कि पर्यावरण विनियमन केवल कार्यकारी सुविधा या प्रशासनिक आदेशों पर आधारित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसके पीछे पुख्ता कानूनी अधिकार होना चाहिए। अदालत के प्रमुख निर्णय बिंदु इस प्रकार हैं:
- 2021 का ओएम अमान्य: अदालत ने माना कि 2021 का ओएम केवल एक प्रशासनिक निर्देश था, जिसमें वैधानिक अधिकार का अभाव था। यह किसी कानून के तहत बने प्रत्यायोजित विधान (Delegated Legislation) को ओवरराइड नहीं कर सकता। इसे पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के अधिकार क्षेत्र से बाहर (Ultra Vires) घोषित किया गया।
- सीमित वैधानिक छूट की गुंजाइश: अदालत ने अंधाधुंध और स्थायी नियमितीकरण पर रोक लगा दी है, लेकिन यह भी स्पष्ट किया कि यदि जनहित, स्पष्ट रूप से पहचानी गई परियोजना श्रेणियां, और औचित्य व आनुपातिकता के सिद्धांत पूरे होते हैं, तो पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 3 के तहत एक संकीर्ण और समयबद्ध वैधानिक अधिसूचना जारी की जा सकती है।
- भावी प्रभाव (Prospective Operation): पहले से प्रभावित परियोजनाओं या व्यवस्था में अचानक व्यवधान से बचने के लिए, इस ओएम के तहत पूर्व में दी जा चुकी स्वीकृतियों को वैध रखा गया है, और यह निर्णय भविष्य के लिए प्रभावी होगा।
न्यायशास्त्र का क्रमिक विकास और कानूनी सिद्धांत
- यह निर्णय अदालतों के पुराने और महत्वपूर्ण फैसलों की कड़ी को आगे बढ़ाता है। कॉमन कॉज (2017) मामले में जहाँ पूर्व अनुमोदन की अनिवार्यता पर जोर दिया गया, वहीं एलेम्बिक फार्मास्यूटिकल्स (2020) मामले में पूर्वव्यापी ईसी को एहतियाती सिद्धांत (Precautionary Principle) के विपरीत माना गया।
- अदालत ने इस मामले में संविधान के अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) और अनुच्छेद 21 (स्वस्थ पर्यावरण के साथ जीने का अधिकार) के महत्व को रेखांकित किया। साथ ही, यह स्पष्ट किया कि जन विश्वास अधिनियम, 2023 के तहत कई उल्लंघनों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने का उद्देश्य विनियामक अनुपालन को बढ़ावा देना है, न कि अनियंत्रित पश्च-घटना अनुमोदनों को खुला लाइसेंस देना।
भविष्य की दिशा
- इस निर्णय का प्रभाव देश भर की सैकड़ों महत्वपूर्ण परियोजनाओं—जैसे खदानें, ग्रीनफील्ड हवाई अड्डे, सीमेंट और स्टील संयंत्रों पर पड़ा है। जनवरी 2024 तक डेढ़ सौ से अधिक परियोजनाएं मूल्यांकन प्रक्रिया में थीं।
- यह फैसला इस बात का प्रतीक है कि देश में पर्यावरण शासन, सतत विकास और प्रशासनिक लचीलेपन के बीच संतुलन कैसे बिठाया जाए। यह निर्णय भविष्य के लिए स्पष्ट संदेश देता है कि पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी को अब एक स्थायी प्रशासनिक प्रक्रिया के रूप में बढ़ावा नहीं दिया जा सकता और हर नीतिगत छूट को संवैधानिक और जनहित की कसौटी पर खरा उतरना होगा।