भारत में एलपीजी आपूर्ति संकट : ऊर्जा सुरक्षा के लिए उभरती चुनौती
संदर्भ
भारत वर्तमान समय में एलपीजी (Liquefied Petroleum Gas) की आपूर्ति से संबंधित एक महत्वपूर्ण चुनौती का सामना कर रहा है। बीते वर्षों में विशेषकर गरीब और ग्रामीण परिवारों में एलपीजी की खपत में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। किंतु इसके अनुरूप दीर्घकालिक भंडारण अवसंरचना का पर्याप्त विस्तार नहीं हो पाया है, जिसके कारण आपूर्ति प्रणाली अपेक्षाकृत संवेदनशील बनी हुई है।
भारत के कुल एलपीजी आयात का 85 प्रतिशत से अधिक हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के मार्ग से होकर आता है। इसलिए यदि इस समुद्री मार्ग में किसी प्रकार का भू-राजनीतिक तनाव या व्यवधान उत्पन्न होता है, तो देश की एलपीजी आपूर्ति तुरंत प्रभावित हो सकती है। समस्या को और गंभीर बनाने वाली बात यह है कि भारत के पास एलपीजी के लिए पर्याप्त बैकअप भंडारण क्षमता उपलब्ध नहीं है। हालाँकि कच्चे तेल के संदर्भ में भारत ने लगभग दो महीने की खपत के बराबर रणनीतिक भंडार विकसित कर रखे हैं, लेकिन एलपीजी प्रणाली अभी भी मुख्यतः निरंतर आपूर्ति व्यवस्था (continuous operational flow) पर आधारित है किया है।
भारत में एलपीजी आयात में वृद्धि
पिछले एक दशक में भारत में एलपीजी आयात में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। वर्ष 2011–12 से 2024–25 के बीच एलपीजी आयात लगभग तीन गुना बढ़कर करीब 20 मिलियन टन तक पहुँच गया है।
वर्तमान में भारत की कुल घरेलू मांग का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा किया जा रहा है। जहाँ वर्ष 2015 में आयात निर्भरता लगभग 47 प्रतिशत थी, वहीं अब यह बढ़कर लगभग 60 प्रतिशत हो चुकी है।
भारत हर महीने लगभग 3 मिलियन टन एलपीजी की खपत करता है, जिसके कारण यह विश्व का दूसरा सबसे बड़ा एलपीजी उपभोक्ता बन गया है।
इसके विपरीत, देश की मौजूदा भंडारण क्षमता मासिक आवश्यकता के आधे से भी कम है। अधिकांश भंडारण सुविधाएँ आयात टर्मिनलों के टैंकों तक ही सीमित हैं, जैसे कि एन्नोर (Ennore)।
अपर्याप्त रणनीतिक भंडार
भारत में एलपीजी के लिए रणनीतिक भंडारण की स्थिति अभी भी सीमित है। वर्तमान में देश में केवल दो भूमिगत एलपीजी भंडारण मौजूद हैं—
मंगलुरु
विशाखापत्तनम
इन दोनों की कुल भंडारण क्षमता लगभग 1.4 लाख टन है, जो राष्ट्रीय स्तर पर दो दिनों से भी कम खपत के बराबर है।
विशेष रूप से मंगलुरु की गुफा की क्षमता लगभग 80,000 टन है, जो लगभग एक दिन की राष्ट्रीय खपत के बराबर मानी जाती है। इससे स्पष्ट होता है कि देश में दीर्घकालिक आपूर्ति सुरक्षा के लिए भंडारण व्यवस्था अभी भी अपर्याप्त है।
घरेलू एलपीजी खपत में तेजी
भारत में प्रतिदिन लगभग 80,000 टन एलपीजी की खपत होती है, जिसमें से 85 प्रतिशत से अधिक उपयोग घरेलू क्षेत्र में होता है।
देश में वर्तमान में लगभग 33 करोड़ घरेलू एलपीजी कनेक्शन उपलब्ध हैं। इनमें से लगभग 10 करोड़ कनेक्शन वर्ष 2017 के बाद जोड़े गए, जिनका बड़ा हिस्सा प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (PMUY) के अंतर्गत प्रदान किया गया।
उज्ज्वला योजना का योगदान
प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना का उद्देश्य गरीब परिवारों को स्वच्छ ईंधन उपलब्ध कराना था। इस योजना के अंतर्गत पात्र परिवारों को डिपॉजिट-फ्री एलपीजी कनेक्शन तथा सब्सिडी प्रदान की गई।
इस पहल के परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में परिवारों ने पारंपरिक ईंधनों जैसे—
लकड़ी
मिट्टी का तेल (केरोसिन) का उपयोग छोड़कर एलपीजी जैसे स्वच्छ ईंधन को अपनाया।
हालाँकि, इस योजना ने सामाजिक और पर्यावरणीय दृष्टि से सकारात्मक प्रभाव डाला, लेकिन इसके साथ ही एलपीजी की मांग और आयात निर्भरता में भी तीव्र वृद्धि देखने को मिली।
आयात स्रोतों के विविधीकरण के प्रयास
भारत ने एलपीजी आयात के स्रोतों में विविधता लाने के उद्देश्य से संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ प्रति वर्ष लगभग 2.2 मिलियन टन एलपीजी आयात करने का समझौता किया है।
हालाँकि, अमेरिका से आने वाले जहाजों को भारत तक पहुँचने में लगभग 45 दिन का समय लगता है, जबकि पर्शियन गल्फ क्षेत्र से आपूर्ति अपेक्षाकृत कम समय में उपलब्ध हो जाती है। इस कारण अभी भी खाड़ी क्षेत्र भारत के लिए प्रमुख आपूर्ति स्रोत बना हुआ है।
भंडारण समाधान के रूप में भूमिगत गुफाएँ
भारत की एलपीजी आपूर्ति प्रणाली को अधिक सुरक्षित बनाने के लिए भूमिगत गैस भंडारण गुफाओं (Underground Storage Caverns) का विस्तार एक प्रभावी विकल्प माना जा रहा है।
इस प्रकार की संरचनाएँ देशों को बड़ी मात्रा में गैस संग्रहित करने की सुविधा प्रदान करती हैं और आपूर्ति में बाधा आने की स्थिति में ऊर्जा सुरक्षा बनाए रखने में सहायक होती हैं।
गैस भंडारण के वैश्विक अनुभव
यूरोप में भूमिगत गैस भंडारण को ऊर्जा सुरक्षा की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। वहाँ की भंडारण क्षमता वार्षिक गैस खपत के लगभग 25 प्रतिशत के बराबर है।
इसके अतिरिक्त, यूरोप की भूमिगत भंडारण क्षमता उसके वार्षिक एलएनजी आयात के लगभग 150 प्रतिशत तक पहुँचती है।
वर्ष 2022 में यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोपीय संघ ने यह अनिवार्य कर दिया कि सर्दियों के मौसम से पहले भंडारण सुविधाओं को कम से कम 90 प्रतिशत तक भरना होगा, ताकि संभावित आपूर्ति संकट से बचा जा सके।
भारत में संभावित भंडारण क्षेत्र
1. पेनिन्सुलर शील्ड
दक्षिण भारत में फैला पेनिन्सुलर शील्ड क्षेत्र भूमिगत गैस भंडारण के लिए अत्यंत उपयुक्त माना जाता है। यह क्षेत्र ग्रेनाइट और ग्नाइस जैसी स्थिर चट्टानों से निर्मित है। विशाखापत्तनम और मंगलुरु की मौजूदा भंडारण गुफाएँ इसी भू-वैज्ञानिक संरचना में स्थित हैं, जो इसकी उपयुक्तता को प्रमाणित करती हैं।
2. दक्कन ट्रैप्स
पश्चिमी और मध्य भारत में फैला दक्कन ट्रैप्स एक विशाल बेसाल्ट पठार है। हालांकि यहाँ भंडारण गुफाओं का निर्माण तकनीकी दृष्टि से अपेक्षाकृत जटिल है। Engineers India Limited (EIL) द्वारा प्रस्तावित परियोजनाओं को इस क्षेत्र की जटिल भू-वैज्ञानिक परिस्थितियों के कारण चुनौतियों का सामना करना पड़ा है।
3. राजस्थान की नमक संरचनाएँ
राजस्थान के बीकानेर–बाड़मेर क्षेत्र में स्थित नमक संरचनाएँ भी भूमिगत गैस भंडारण के लिए एक संभावित विकल्प प्रस्तुत करती हैं। नमक गुफाओं की कुछ प्रमुख विशेषताएँ हैं—
अपेक्षाकृत कम लागत
शीघ्र निर्माण
स्वाभाविक रूप से अभेद्य संरचना
गैस के त्वरित भंडारण और निकासी की सुविधा
इन संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए Engineers India Limited (EIL) ने जर्मनी की कंपनी DEEP के साथ तकनीकी सहयोग स्थापित किया है।
समाप्त गैस भंडार
इसके अतिरिक्त, समाप्त हो चुके गैस भंडारों को भंडारण के लिए उपयोग करने की संभावना का भी अध्ययन किया जा रहा है। संभावित क्षेत्रों में शामिल हैं-
कृष्णा–गोदावरी बेसिन
कैंबे बेसिन
मुंबई अपतटीय क्षेत्र
निष्कर्ष
भारत में एलपीजी की बढ़ती मांग और आयात निर्भरता को देखते हुए रणनीतिक भंडारण क्षमता का विस्तार अत्यंत आवश्यक हो गया है। विभिन्न उपयुक्त भू-वैज्ञानिक क्षेत्रों में भूमिगत गैस भंडारण गुफाओं का विकास इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम सिद्ध हो सकता है।
यदि इन परियोजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है, तो इससे—
एलपीजी भंडारण क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी,
आयात निर्भरता से जुड़े जोखिम कम होंगे, तथा
संभावित आपूर्ति व्यवधानों के दौरान भारत की ऊर्जा सुरक्षा अधिक मजबूत हो सकेगी।