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भारत की जैव-विविधता प्रतिबद्धताएँ और उपलब्धियाँ

संदर्भ 

  • जैव-विविधता भारत की पर्यावरणीय और विकासात्मक प्राथमिकताओं के केंद्र में है, जो खाद्य सुरक्षा, आजीविका, जलवायु लचीलापन (Climate Resilience) और पारिस्थितिक संतुलन का आधार है। वन, आर्द्रभूमि, पर्वत और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र जैसी विविध प्रणालियों से समृद्ध भारत, वैश्विक जैव-विविधता लक्ष्यों (जैसे- कुन्मिंग-मोंट्रियल वैश्विक जैव-विविधता ढांचा - KMGBF) के अनुरूप अपनी प्राकृतिक पूंजी को सुरक्षित करने के लिए प्रतिबद्ध है। भारत का यह दृष्टिकोण संपूर्ण सरकार (Whole-of-Government) और संपूर्ण समाज (Whole-of-Society) के सिद्धांत पर आधारित है। 

भारत का जैव-विविधता ढांचा और संस्थागत वास्तुकला 

भारत ने संरक्षण, स्थायी उपयोग और न्यायसंगत लाभ साझाकरण के लिए एक सुदृढ़ त्रि-स्तरीय वैधानिक और संस्थागत ढांचा स्थापित किया है: 

विधिक आधार (जैव-विविधता अधिनियम, 2002 व 2023 का संशोधन): 

  • यह अधिनियम देश में जैविक संसाधनों के संरक्षण का प्राथमिक विधिक स्रोत है। वर्ष 2023 के संशोधन ने अनुपालन को सरल बनाकर अनुसंधान, नवाचार और पारंपरिक ज्ञान-आधारित पद्धतियों को मजबूत किया है, जिससे शासन की कुशलता में सुधार हुआ है।

त्रि-स्तरीय शासन संरचना (Three-Tier Governance Structure):

  • राष्ट्रीय स्तर : राष्ट्रीय जैव-विविधता प्राधिकरण (NBA) - नीतिगत और नियामक दिशा-निर्देश देता है।
  • राज्य स्तर : राज्य जैव-विविधता बोर्ड (SBBs) और केंद्र शासित प्रदेश जैव-विविधता परिषदें (UTBCs) - क्षेत्रीय आवश्यकताओं के अनुसार नीतियों का अनुकूलन करती हैं।
  • स्थानीय स्तर : जैव-विविधता प्रबंधन समितियां (BMCs) - जमीनी स्तर पर संरक्षण और दस्तावेजीकरण का नेतृत्व करती हैं।

वैज्ञानिक एवं तकनीकी सहयोग 

  • भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (ZSI) और भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण (BSI) जैसी संस्थाएं प्रजातियों का दस्तावेजीकरण करती हैं। भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) वन आवरण का मानचित्रण करता है, जबकि राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) विशिष्ट आवासों की निगरानी करता है। 
  • वर्तमान में, जैविक संसाधनों की सुरक्षित निगरानी के लिए देश भर में 22 संस्थानों को राष्ट्रीय भंडारण (National Repositories) के रूप में अधिसूचित किया जा चुका है। 

                          जैव-विविधता वित्त पहल

  • जैव-विविधता वित्त भारत (Biodiversity Finance India) को 2015 में एक वित्त योजना पहल के रूप में लॉन्च किया गया था, जिसका उद्देश्य जैव-विविधता वित्तपोषण की जरूरतों की पहचान करना और संरक्षण के लिए संसाधनों को जुटाना है। 
  • यह पहल यूएनडीपी के व्यापक बायोफिन ढांचे से जुड़ी है और भारत के प्रयास को दर्शाती है कि संरक्षण को वित्तीय रूप से स्थायी बनाया जाए।

विकेंद्रीकृत शासन: सामुदायिक स्तरीय उपकरण 

जैव-विविधता संरक्षण में स्थानीय समुदायों की भूमिका को निम्नलिखित माध्यमों से संस्थागत रूप दिया गया है: 

जनता का जैव-विविधता रजिस्टर (PBR): 

  • यह स्थानीय स्तर पर उपलब्ध जैविक संसाधनों, पारंपरिक ज्ञान और खेती/पालतू नस्लों का एक व्यापक डेटाबेस है। देश भर में लगभग 2,72,648 पीबीआर तैयार किए जा चुके हैं। 

पहुंच और लाभ साझाकरण (ABS Mechanism): 

  • यह जैविक संसाधनों के वाणिज्यिक उपयोग से प्राप्त लाभ को स्थानीय प्रदाताओं/समुदायों के साथ न्यायसंगत रूप से साझा करना सुनिश्चित करता है। वर्ष 2017 से 2026 के बीच, भारत ने 12,830 लाभ हेतु अनुमोदन जारी किए हैं, जिसके तहत मई 2026 तक लगभग 11,000 बीएमसी को 145 करोड़ की राशि वितरित की जा चुकी है।  

रणनीतिक नीतियां और कार्ययोजनाएं (2024-2030) 

राष्ट्रीय जैव-विविधता रणनीति और कार्य योजना (2024-2030): 

  • राष्ट्रीय जैव-विविधता रणनीति और कार्ययोजना को वैश्विक कुन्मिंग-मोंट्रियल ढांचे (KMGBF) के साथ संरेखित किया गया है, जो दीर्घकालिक संरक्षण एजेंडा तय करती है।

राष्ट्रीय रेड लिस्ट रोडमैप (2025-2030): 

  • भारतीय वन्यजीव सर्वेक्षण (जेडएसआई) और भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण (बीएसआई) द्वारा, आईयूसीएन-भारत के सहयोग से यह रोडमैप देश में एक विज्ञान-आधारित संकटग्रस्त-प्रजाति मूल्यांकन प्रणाली स्थापित कर रहा है, ताकि वर्ष 2030 तक संकटग्रस्त प्रजातियों की सटीक स्थिति का पता लगाकर उनके संरक्षण को प्राथमिकता दी जा सके। 

प्रमुख उपलब्धियां 

मानक / संकेतक

वर्तमान स्थिति / उपलब्धि

वन और वृक्ष आवरण

कुल 8.27 लाख वर्ग किमी (देश के भौगोलिक क्षेत्र का 25.17%)

संरक्षित क्षेत्र (Protected Areas)

देश भर में 1,134 से अधिक संरक्षित क्षेत्र (कुल 1,87,592 वर्ग किमी)

प्रजाति पुनर्प्राप्ति (बाघ संरक्षण)

बाघों की संख्या वर्ष 2014 के 2,226 से बढ़कर वर्तमान अनुमानों में 3,682 हुई।

स्थानीय शासन नेटवर्क

देश भर के ग्रामीण व शहरी निकायों में 2,76,653 से अधिक बीएमसी कार्यरत।

डिजिटल परिवर्तन

पंचायत उन्नति सूचकांक (PAI 2.0) के तहत 2.6 लाख से अधिक ग्राम पंचायतों का 150 संकेतकों पर मूल्यांकन। (PAI 2.0 में रिकॉर्ड 97.3% पंचायतों की भागीदारी)।

मुख्य चुनौतियाँ (Key Challenges)

  • पर्यावरण बनाम विकास का द्वंद्व : बुनियादी ढांचा परियोजनाओं और औद्योगिक विस्तार के कारण जैव-विविधता से समृद्ध क्षेत्रों का विखंडन।
  • जलवायु परिवर्तन का प्रभाव : तापमान में वृद्धि और अप्रत्याशित मौसम के कारण संवेदनशील प्रजातियों के लुप्त होने का खतरा।
  • जमीनी स्तर पर क्षमता का अभाव : कई स्थानीय बीएमसी के पास अभी भी वित्तीय स्वायत्तता और तकनीकी विशेषज्ञता की कमी है। 

आगे की राह (Way Forward) 

  • भारत ने जैव-विविधता संरक्षण के क्षेत्र में कानून, संस्थागत ढांचे, वैज्ञानिक अनुसंधान और सामुदायिक सहभागिता का एक सशक्त मॉडल विकसित किया है। जैव-विविधता अधिनियम, एनबीएसएपी, एबीएस व्यवस्था तथा पीबीआर जैसे नवाचारों ने संरक्षण को जनभागीदारी से जोड़ने का कार्य किया है। 
  • भविष्य में 2030 के वैश्विक लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु संरक्षण, विकास और समुदाय आधारित प्रबंधन के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक होगा। स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र, सुरक्षित आजीविका और सतत विकास एक-दूसरे के पूरक हैं तथा भारत की जैव-विविधता नीति इसी समेकित दृष्टिकोण को प्रतिबिंबित करती है।
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