New
Hindi Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 10th Aug 2026, 3:00 PM Hindi Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 18th Aug 2026, 8:00 AM English Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 6th Aug 2026 English Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 19th Aug 2026, 8:00 AM Hindi Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 10th Aug 2026, 3:00 PM Hindi Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 18th Aug 2026, 8:00 AM English Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 6th Aug 2026 English Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 19th Aug 2026, 8:00 AM

अगस्त्यमलाई बायोस्फीयर रिजर्व: पर्यावरण संरक्षण और वनाधिकारों के बीच संतुलन की चुनौती

संदर्भ 

अगस्त्यमलाई बायोस्फीयर रिजर्व (ABR) पश्चिमी घाट की जैव-विविधता की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण पारिस्थितिकीय क्षेत्र है। तमिलनाडु और केरल में विस्तृत यह क्षेत्र अनेक संरक्षित क्षेत्रों, वन्यजीवों, वनस्पतियों तथा आदिवासी और पारंपरिक वन समुदायों का आश्रय है। हाल में तमिलनाडु के थेनी सहित विभिन्न क्षेत्रों में वन भूमि पर कथित अतिक्रमण के विरुद्ध बेदखली नोटिस जारी किए जाने तथा सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों ने पर्यावरण संरक्षण और वन समुदायों के वैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन के प्रश्न को पुनः चर्चा के केंद्र में ला दिया है।   

न्यायालय के निर्देश और अतिक्रमण का मुद्दा 

  • केंद्रीय अधिकारप्राप्त समिति (CEC) की रिपोर्टों के आधार पर सर्वोच्च न्यायालय ने अगस्त्यमलाई क्षेत्र में अतिक्रमण हटाने के लिए समयबद्ध कार्ययोजना बनाने, पात्र लोगों के पुनर्वास, जानबूझकर अतिक्रमण करने वालों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई तथा अतिक्रमण हटाने के बाद पारिस्थितिकीय पुनर्स्थापन का निर्देश दिया है। अतिक्रमण करने वाले पाए गए 118 सरकारी कर्मचारियों के विरुद्ध अतिरिक्त कार्रवाई तथा अतिक्रमित वन क्षेत्रों में स्थित संरचनाओं और अन्य सुविधाओं को हटाने का भी आदेश दिया गया है। 
  • न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया है कि सभी अतिक्रमण हटाए जाने तक अगस्त्यमलाई बायोस्फीयर रिजर्व में वन भूमि का नया गैर-वानिकी उपयोग या नई गैर-वानिकी गतिविधि प्रारंभ न की जाए। सर्वेक्षण, सीमांकन और अतिक्रमण हटाने में लगे अधिकारियों को दुर्भावनापूर्ण अथवा मनमानी कार्रवाई को छोड़कर अभियोजन से संरक्षण दिया गया है। राज्य द्वारा न्यायालय के निर्देशों का पालन न करने की स्थिति में अर्द्धसैनिक बलों की तैनाती की सिफारिश का प्रावधान भी किया गया है। 
  • केंद्रीय अधिकारप्राप्त समिति के अनुसार, श्रीविल्लिपुत्तूर-मेगमलाई टाइगर रिजर्व में लगभग 4,595 व्यक्तियों द्वारा 5,071.2 हेक्टेयर भूमि पर अतिक्रमण की जानकारी सामने आई। वहीं, कन्याकुमारी वन प्रभाग में 553 व्यक्तियों द्वारा लगभग 427.4 हेक्टेयर भूमि पर अतिक्रमण बताया गया है। ये आंकड़े क्षेत्र में संरक्षण संबंधी चुनौतियों की गंभीरता को दर्शाते हैं। 

वन अधिकार अधिनियम: ऐतिहासिक अन्याय का सुधार 

  • हालांकि, अतिक्रमण की पहचान और उसे हटाने की प्रक्रिया में वन अधिकार अधिनियम, 2006 (FRA) को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इस अधिनियम का मूल उद्देश्य वनवासी अनुसूचित जनजातियों तथा अन्य परंपरागत वनवासियों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय को दूर करना है। कानून ने 13 दिसंबर 2005 से पहले वन भूमि पर निवास अथवा निर्भरता रखने वाले पात्र समुदायों के व्यक्तिगत और सामुदायिक वनाधिकारों को मान्यता देने की व्यवस्था की है। 
  • वन अधिकार अधिनियम के तहत अधिकारों की मान्यता की प्रक्रिया में ग्राम सभा की केंद्रीय भूमिका है। इसके बाद उप-मंडल और जिला स्तरीय समितियां दावों की जांच करती हैं। इस व्यवस्था का उद्देश्य प्रशासनिक मनमानी को रोकते हुए स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करना है।  
  • महत्वपूर्ण रूप से, वन अधिकार अधिनियम के तहत अधिकारों की पहचान और सत्यापन की प्रक्रिया पूरी होने तक संबंधित व्यक्तियों को बेदखल करने पर रोक है। इसलिए वन भूमि पर प्रत्येक कब्जे को स्वतः ‘अतिक्रमण’ मानना कानूनी दृष्टि से उचित नहीं होगा। पहले यह निर्धारित करना आवश्यक है कि संबंधित व्यक्ति वन अधिकार अधिनियम के तहत वैध वनाधिकार का दावेदार है या नहीं।   

गलत धारणाओं से जटिल हुआ विवाद  

  • वनाधिकारों के संबंध में कुछ ऐसी धारणाएं भी प्रचलित रही हैं, जो अधिनियम की वास्तविक भावना से मेल नहीं खातीं। उदाहरण के लिए, अन्य परंपरागत वनवासियों के लिए 2005 से पहले तीन पीढ़ियों या 75 वर्षों तक उसी भूमि पर निवास की शर्त को अनिवार्य मानना कानून की स्पष्ट आवश्यकता नहीं है। 
  • इसी प्रकार, वन अधिकार अधिनियम आजीविका की आवश्यकताओं के लिए वन उपज के उपयोग और अधिशेष उपज की बिक्री को मान्यता देता है तथा चराई जैसे अधिकारों का भी प्रावधान करता है। अतः वन संरक्षण और स्थानीय समुदायों की आजीविका को परस्पर विरोधी मानने के बजाय दोनों के बीच संतुलन स्थापित करना आवश्यक है। 

मंजोलाई चाय बागान का उदाहरण:

  • कलक्कड़-मुंडनथुरई टाइगर रिजर्व में बॉम्बे बर्मा ट्रेडिंग कॉर्पोरेशन लिमिटेड (बीबीटीसीएल) को दी गई लगभग 3,388.7 हेक्टेयर भूमि का मामला इस चुनौती को और स्पष्ट करता है। पट्टा 2028 में समाप्त होना था। राज्य सरकार ने इस क्षेत्र को महत्वपूर्ण बाघ आवास का हिस्सा घोषित कर बाद में इसे आरक्षित वन के रूप में अधिसूचित किया और बेदखली की कार्रवाई शुरू की। 
  • बागान श्रमिकों ने वीआरएस तथा बेदखली के विरुद्ध न्यायालय का रुख किया। उनका तर्क था कि लंबे समय से क्षेत्र में निवास के कारण उन्हें एफआरए के तहत ‘अन्य परंपरागत वनवासी’ माना जाना चाहिए। हालांकि, उच्च न्यायालय ने उन्हें मुख्यतः बागान श्रमिक मानते हुए एफआरए के दायरे से बाहर माना। यह प्रकरण दर्शाता है कि ‘वनवासी’ और ‘वन पर निर्भर श्रमिक’ की कानूनी पहचान कई मामलों में जटिल हो सकती है। 

पर्यावरणीय शासन की व्यापक चुनौती  

  • एबीआर का विवाद भारत में पर्यावरणीय शासन की एक व्यापक समस्या को रेखांकित करता है। एक ओर पश्चिमी घाट जैसे पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में अतिक्रमण, अवैध निर्माण और गैर-वानिकी गतिविधियों पर कठोर नियंत्रण आवश्यक है। 
  • दूसरी ओर, संरक्षण के नाम पर सदियों से जंगलों पर निर्भर समुदायों के वैधानिक अधिकारों की अनदेखी सामाजिक न्याय और विधि के शासन के विरुद्ध होगी।
  • यहां सतत विकास, अंतर-पीढ़ीगत समानता और पर्यावरणीय न्याय के सिद्धांतों को साथ लेकर चलने की आवश्यकता है। वन संरक्षण केवल भौगोलिक सीमाओं और निषेधों से नहीं, बल्कि स्थानीय समुदायों की भागीदारी से अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।

आगे की राह  

अगस्त्यमलाई में अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया को निम्नलिखित उपायों पर आधारित किया जाना चाहिए - 

  • एफआरए के तहत लंबित दावों का समयबद्ध निपटारा तथा ग्राम सभाओं की वास्तविक भागीदारी सुनिश्चित की जाए। 
  • वैध वनाधिकार धारकों और वास्तविक अतिक्रमणकारियों के बीच स्पष्ट एवं पारदर्शी अंतर किया जाए।
  • आधुनिक जीआईएस, सैटेलाइट इमेजरी और भू-अभिलेखों के समेकन से सटीक सीमांकन और डिजिटल भूमि अभिलेख तैयार किए जाएं।
  • वास्तविक अतिक्रमणकारियों के विरुद्ध कार्रवाई के साथ पात्र एवं प्रभावित परिवारों के लिए न्यायसंगत पुनर्वास और आजीविका सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
  • स्थानीय समुदायों को संयुक्त वन प्रबंधन और संरक्षण गतिविधियों में भागीदार बनाया जाए। 
  • संरक्षण संबंधी निर्णयों में पर्यावरणीय प्रभाव के साथ-साथ सामाजिक प्रभाव आकलन को भी महत्व दिया जाए।
  • केंद्र, राज्य, वन विभाग, जनजातीय कार्य विभाग और स्थानीय निकायों के बीच संस्थागत समन्वय मजबूत किया जाए।

निष्कर्ष 

  • अगस्त्यमलाई बायोस्फीयर रिजर्व का प्रश्न केवल अतिक्रमण हटाने का प्रशासनिक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह पर्यावरणीय संरक्षण, सामाजिक न्याय, आजीविका और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन की परीक्षा है। भारत की संरक्षण नीति तभी टिकाऊ हो सकती है जब वह प्रकृति और स्थानीय समुदायों को परस्पर विरोधी न मानकर एक-दूसरे का सहयोगी बनाए। 
  • अतः ‘वन बनाम वनवासी’ के दृष्टिकोण से आगे बढ़कर ‘वन और वनवासी’ के समन्वित मॉडल को अपनाना समय की आवश्यकता है। वैज्ञानिक सीमांकन, एफआरए का निष्पक्ष क्रियान्वयन, सहभागी संरक्षण तथा न्यायसंगत पुनर्वास के माध्यम से अगस्त्यमलाई की जैव-विविधता और वहां रहने वाले समुदायों के हितों की रक्षा की जा सकती है। यही पर्यावरणीय न्याय और सतत विकास की वास्तविक दिशा होगी।  
  • अगस्त्यमलाई बायोस्फीयर रिजर्व (ABR) पश्चिमी घाट की जैव-विविधता की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण पारिस्थितिकीय क्षेत्र है। तमिलनाडु और केरल में विस्तृत यह क्षेत्र अनेक संरक्षित क्षेत्रों, वन्यजीवों, वनस्पतियों तथा आदिवासी और पारंपरिक वन समुदायों का आश्रय है। हाल में तमिलनाडु के थेनी सहित विभिन्न क्षेत्रों में वन भूमि पर कथित अतिक्रमण के विरुद्ध बेदखली नोटिस जारी किए जाने तथा सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों ने पर्यावरण संरक्षण और वन समुदायों के वैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन के प्रश्न को पुनः चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
« »
  • SUN
  • MON
  • TUE
  • WED
  • THU
  • FRI
  • SAT
Have any Query?

Our support team will be happy to assist you!

OR